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किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत विधि विरोधी किशोर तथा किशोर न्याय बोर्ड

Shadab Salim
11 March 2021 4:15 AM GMT
किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत विधि विरोधी किशोर तथा किशोर न्याय बोर्ड
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किशोर न्याय अधिनियम से संबंधित पिछले आलेख में इस अधिनियम का सामान्य परिचय तथा इस अधिनियम में दिए गए विशेष शब्दों की परिभाषाओं का अध्ययन किया गया था। इस आलेख के अंतर्गत विधि विरोधी किशोर के संबंध में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया तथा किशोर न्याय बोर्ड के गठन पर चर्चा की जा रही है।

किशोर न्याय बोर्ड

इस अधिनियम की धारा 4 किशोर न्याय बोर्ड से संबंधित धारा है। इस धारा के अंतर्गत किशोर न्याय बोर्ड का गठन किया गया है। इस धारा में विधि-विरोधी कार्यों में लिप्त किशोरों के मामलों में जाँच एवं सुनवाई आदि हेतु 'किशोर न्याय बोर्ड' के गठन तथा इसके सदस्यों की नियुक्ति, उनकी अर्हताएँ एवं पद-च्युति के बारे में भी उपबंध है।

बोर्ड में तीन सदस्य होंगे जिनमें से एक महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट, और दो सामाजिक कार्यकर्ता होंगे। बोर्ड के दो सामाजिक कार्यकर्ता सदस्यों में से कम से कम एक महिला होना अनिवार्य है। बोर्ड को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अधीन महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट यथास्थिति की शक्तियाँ प्रदत्त की गयी हैं।

इस धारा की उपधारा (5) में यह उपबंधित है कि (i) राज्य द्वारा किशोर न्याय बोर्ड के किसी भी सदस्य की नियुक्ति को उचित जांच के पश्चात् समाप्त किया जा सकता है, यदि उसने अपनी किसी शक्ति का 4. दुरुपयोग किया हो; या (ii) उसे किसी नैतिक अधमता के लिए दोषसिद्ध ठहराया गया हो, और उसे अपराध के लिए क्षमा प्रदान न की गयी हो, या (iii) वह बिना किसी उचित कारण के निरन्तर तीन माह तक बोर्ड की कार्यवाही से अनुपस्थित रहा हो या उसने वर्ष में हुई बोर्ड की कुछ बैठकों के तीन-चौथाई से कम बैठकों में उपस्थिति दर्ज न कराई हो।

किशोर न्याय बोर्ड की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य विधि विरोधी किशोरों को सुधारने के प्रति यह सुनिश्चित करना भी है कि उनके आपराधिक कृत्यों के विधिक परिणामों का उनके भावी जीवन पर दुष्प्रभाव न पढ़े और उनके चरित्र पर लांछन या कलंक न लगने पाये।

यही कारण है कि किशोर को अपराधी कहा जाकर 'विधि विरोधी किशोर' कहा गया है। इसी प्रकार किसी विधि-विरोधी किशोर को दोषसिद्ध पाये जाने पर उसे 'दण्डादेश' दिये जाने के बजाय दोषसिद्धि पर पारित आदेश दिया जाता है, ताकि वह 'कैदी' कहलाये जाने के से बच सके।

कर्नाटक राज्य बनाम हर्षद के वाद में उच्च न्यायालय ने विनिश्चित किया कि जहां किशोर न्याय अधिनियम की धारा 4 के अन्तर्गत किशोर न्याय बोर्ड स्थापित किये गये हैं। यहां बोर्ड को विधि का उल्लंघन करने वाले किशोर/बालकों के विचारण की अनन्य अधिकारिता होगी तथा सेशन न्यायालय या फास्ट ट्रेक न्यायालयों को ऐसे किशोरों के मामलों में विचारण की अधिकारिकता नहीं होगी।

इस प्रकरण में चूंकि किशोर न्याय बोर्ड का गठन 27 जुलाई, 2003 की अधिसूचना के अधीन हो चुका था इसलिये सिद्धदोष किशोर को धारा 15 के अन्तर्गत उचित गृह में भेजे जाने का आदेश उचित था क्योंकि उसे दंडित किया जाना अधिनियम के उद्देश्य के विपरीत होगा ।

किशोर न्याय बोर्ड द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध अपील के अधिकार को अत्यधिक सीमित रखा गया है ताकि विधि-विरुद्ध किशोर को न्यायिक प्रक्रिया के अधीन कम-से-कम समय रहना हो। बोर्ड द्वारा किशोर को निर्दोष पाया जाने पर या यह पाया जाने पर कि वह लावारिश या उपेक्षित नहीं है।

इस आदेश के विस्द्ध अपील नहीं हो सकेगी, अर्थात् किशोर न्याय बोर्ड का निर्णय अन्तिम होगा परनु बोर्ड द्वारा किशोर को दोषसिद्ध या उपेक्षित घोषित किये जाने के विरुद्ध केवल एक अपील सत्र न्यायालय में हो सकती है, जिसका निर्णय अन्तिम होगा। दूसरे शब्दों में, किशोर के मामले में सत्र न्यायालय का फैसला अन्तिम होगा और इसके विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील का प्रावधान नहीं है।

विधि-विरोधी किशोर के मामले में उच्च न्यायालय को केवल पुनरीक्षण की शक्ति प्राप्त है न कि अपील की। किशोर न्याय नियम, 2007 के नियम 13 (6) (d) में यह उपबन्धित है कि बोर्ड द्वारा किशोर अपराधियों के प्रकरण को एक माह की अवधि में निपटा लिया जाना चाहिये, जो विशिष्ट दशा में दो माह तक हो सकती है।

संप्रेक्षण गृह

इस अधिनियम की धारा 8 में संप्रेक्षण गृह (Observation Home) के बारे में प्रावधान है। संप्रेक्षण गृह में ऐसे विधि विरोधी किशोरों को रखा जाता है जिनके विरुद्ध कोई जाँच लम्बित है। ऐसे संप्रेक्षण गृहों की स्थापना राज्य शासन द्वारा अथवा किसी करार के अन्तर्गत निजी संगठनों द्वारा की जा सकती है।

इनमें किशोर के लिए निवास की सुविधा, भरण-पोषण और चिकित्सा परीक्षण और उपचार की व्यवस्था के साथ-साथ उनके लिए उपयोगी उपजीविका की सुविधाएँ भी उपलब्ध कराई जाती हैं।

संजय प्रसाद यादव बनाम बिहार राज्य के वाद में उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रश्न था कि किसी ऐसे किशोर की जिसकी दोषसिद्धि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302/34 के अधीन हुई है और जिसे जाँच के दौरान संप्रेक्षण गृह में रखे जाने हेतु आदेशित किया गया था, किशोर-आयु पूर्ण कर लेने के परिणामस्वरूप उसे कारागार में अन्तरित किया जाना आवश्यक है।

इस पर उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि किशोर की किशोरावस्था की आयु पूर्ण हो जाने पर भी उसे कारागार या अन्यत्र स्थानान्तरित नहीं किया जाएगा और मामले के अन्तिम फैसले तक उसे संप्रेक्षण गृह में ही रखा जाएगा ।

विशेष गृह

धारा 8 में विचाराधीन किशोरों को अस्थायी रूप से रखे जाने हेतु संप्रेक्षण गृहों की व्यवस्था की गयी है जबकि प्रस्तुत धारा 9 में विधि विरोधी किशोरों के लिए विशेष गृह (Special Home) का प्रावधान है। इन विशेष गृहों में अपराध के लिए सिद्धदोष पाये गये किशोरों को उनके सुधार हेतु रखे जाने को व्यवस्था है।

इन गृहों में भी आयु, अपराध की प्रकृति और मानसिक तथा शारीरिक हैसियत के आधार पर किशोरों का वर्गीकरण करके उन्हें अलग अलग रखा जाता है जिससे उनकी देखरेख एवं पुनर्वास की व्यवस्था हो सके। यहाँ किशोरों को शिक्षा एवं तकनीकी प्रशिक्षण की सुविधा भी उपलब्ध करायी जाती है जिससे वह एक सामान्य नागरिक बन सकें।

शीला बरसे बनाम भारत संघ के वाद में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिये कि किशोर अपराधियों को किसी भी दशा में जेल नहीं भेजा जाना चाहिए तथा उन्हें किशोर न्याय अधिनियम के उपबन्धों का लाभ देकर विशेषगृह या किशोर गृह जैसी किसी अन्य सुधारक संस्था में रखा जाना चाहिए।

हवासिंह बनाम हरियाणा राज्य के वाद में विधि-विरोधी किशोर को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302/34 के अधीन सिद्धदोष पाया जाने के कारण आजीवन कारावास से दण्डित करके पंजाब बोस्टल अधिनियम, 1926 के अन्तर्गत बोस्टल संस्था में भेजा गया।

वहाँ 21 वर्ष की आयु पूरी होने के परिणाम स्वरूप उसे शेष सजा भोगने के लिए कारागार में अन्तरित कर दिया गया और उसने अगले सात वर्ष जेल में बिताए। उच्चतम न्यायालय ने अपीलार्थी को तत्काल रिहा किये जाने के आदेश देते हुए विनिश्चित किया कि अभियुक्त का विचारण सेशन न्यायालय द्वारा किया गया होने के कारण वह सात वर्ष की अधिकतम निरोध की अवधि पूरा कर चुका है। अत: उसे तत्काल रिहा किया जाए।

बाल अपराधियों पर प्रथम इत्तिला रिपोर्ट

धारा 11 के अनुसार पुलिस को ऐसे बाल-अपराधियों के विरुद्ध प्रथम इत्तिला रिपोर्ट रजिस्टर से संकोच करना चाहिये। जिन्होंने सात वर्ष से कम दण्ड से दण्डनीय अपराध किया है और जो गम्भीर प्रकृति का नहीं है। इसके बजाय पुलिस को चाहिये कि ऐसे विधि-विरोधी बालकों/किशोरों द्वारा कारित अपराध को अपनी सामान्य दैनिक डायरी में अभिलिखित करे।

इसी प्रकार किशोर न्याय नियम, 2007 के नियम 11 (9) के अन्तर्गत किशोर अपराधियों को गिरफ्तार करना वर्जित है जब तक कि ऐसा करना न्यायिक हित में अनिवार्य न हो। पर हत्या, गम्भीर उपहति, बलात्कार आदि जैसे संगीन अपराध करने वाले बाल या किशोर अपराधियों की गिरफ्तारी की जा सकती है परन्तु उन्हें भी यथाशीघ्र मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिये जिससे वह उनके विषय में उचित निर्णय ले सके तथा उनका प्रकरण किशोर न्याय बोर्ड को भेज दे।

इस अधिनियम की धारा 12 के प्रावधानों से स्पष्ट है कि विधि-विरोधी किशोरों के प्रति उदारता दर्शाते हुए उन्हें यथासंभव जमानत पर रिहा किये जाने की व्यवस्था की गयी। इस धारा के अधीन किशोर व्यक्तियों को छोड़ दिए जाने कीअनुशंसा की गयी है।

जब तक कि इस बात की संभावना न हो कि जमानत पर छोड़े जाने से किशोर व्यक्ति घोर अपराधी की कुसंगति में पड़ सकता है या उसके लिये नैतिक खतरा उत्पन्न हो सकता है या न्याय का उद्देश्य विफल होने की संभावना है।

सुनील तथा अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य' के वाद में सत्र न्यायालय ने किशोर अपराधी को जमानत की अर्जी इस आधार पर नामंजूर कर दी कि उसकी मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर वह किशोर आयु पूर्ण कर चुका था।

परन्तु उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि आयु सिद्ध करने का दायित्व अभियुक्त का नहीं था और न्यायालय को स्वप्रेरणा से इसका निर्धारण करके सुनिश्चित करना चाहिये था कि अभियुक्त को किशोर-नयाय अधिनियम 1956 का लाभ देते हुए जमानत पर छोड़ा जा सकता है अथवा नहीं।

आशय यह है कि सामान्यत: किशोर व्यक्ति को धारा 12 का लाभ देते हुए जमानत पर छोड़ा जाना चाहिए जब तक कि ऐसा न करने के लिए समुचित कारण न हो।

संदीप कुमार बनाम राज्य के वाद में किशोर को छह वर्षोय बालिका के साथ बलात्कार के अपराध के लिये दोषी पाया जाने के कारण उसकी जमानत नामंजूर कर दो गई। इससे यह स्पष्ट था कि किशोर आपराधिक प्रवृत्ति का था तथा उसको माता का उस पर कोई नियन्त्रण नहीं था।

बलात्कार के दुष्कृत्य को एकाएक या भावनावश स्थिति में कारित अपराध नहीं माना जा सकता। अत: अभियुक्त की जमानत नामंजूर की जाना उचित था।

जैक अहमद शेख बनाम राज्य के वाद में राजस्थान उच्च न्यायालय ने विनिश्चित किया कि धारा 12 में प्रयुक्त शब्द 'जमानत पर छोड़ा जायेगा' से यह अर्थ निकालना कि किशोर को जमानत पर छोड़ देने के सिवाय न्यायालय के पास कोई अन्य विकल्प उपलब्ध नहीं है, गलत होगा।

यदि अपराध का स्वरूप ऐसा है कि किशोर को जमानत पर छोड़े जाने से समाज को खतरा है, तो उसकी जमानत नामंजूर की जा सकती है।

इस मामले में अभियुक्त किशोर उम्र का था लेकिन वह तस्करी के अवैध व्यापार में लिप्त था तथा तस्करों के गिरोह में सक्रिय होने के उसके विरुद्ध साक्ष्य थे। अत: धारा 12 के अधीन उसकी जमानत को नामंजूर किया जाना उचित माना गया।

किशोर के सम्बन्ध में पारित किए जाने वाले आदेश

इस अधिनियम की धारा 15 इस संबंध में उल्लेख कर रही है। जहाँ किसी बोर्ड का जाँच करने पर यह समाधान किसी किशोर ने कोई अपराध किया है तब तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुये भी, बोर्ड यदि ठीक समझता है तो किशोर के विरुद्ध समुचित जाँच करके और उसको सलाह देने और भर्त्सना करने के बाद तथा माता-पिता अथवा संरक्षक को परामर्श देकर किशोर को घर जाने की अनुमति दे सकता है।

किसी अपराध के लिए आरोपित कोई किशोर जब किशोर-न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया जाता है, तो बोर्ड इस धारा के उपबंधों के अधीन जो आदेश पारित कर सकता है।

वह निम्नलिखित है-

किशोर को चेतावनी और सलाह देकर उसके माता-पिता या संरक्षक के साथ घर जाने दे यदि अपराध गम्भीर प्रकृति का न हो, किशोर न्याय बोर्ड विधि का उल्लंघन करने वाले को चेतावनी देकर छोड़ सकता है। इसी प्रकार के प्रावधान अपराधी परिवीक्षा अधिनियम 1958 की धारा 3 में भी है।

सामान्यत: निम्नलिखित अपराधों की दशा में किशोर को चेतावनी देकर छोड़ा जा सकता है-

भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 379, 380, 381, 404 या 420 के अपराध और ऐसे अपराध जो जुर्माने सहित या रहित दो वर्ष की कारावधि तक के लिये दण्डनीय है। परन्तु उक्त दोनों दशाओं में अभियुक्त इन अपराधों के लिये पूर्व दण्डादिष्ट नहीं होना चाहिये।

जयपाल सिंह तेजसिंह बनाम रामअवतार देवीलाल के वाद में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि विधि का उल्लंघन करने वाले किशोर को चेतावनी देकर छोड़ने के पूर्व बोर्ड मामले की परिस्थितियां, अपराध की प्रकृति, तथा किशोर के चरित्र या पूर्व वृतान्त पर विचार करेगा।

किशोर (अभियुक्त) को चेतावनी देकर छोड़ते समय बोर्ड उसे इस तथ्य से अवगत करा देगा कि यदि वह पुनः अपराध करता है, तो उसे दण्ड भोगना होगा ।

(1) उसे कोई सामूहिक सेवा या सामुदायिक सेवा करने का आदेश दे सकेगा।

(2) किशोर के माता-पिता को जुर्माना अदा करने हेतु आदेश दे सकेगा, और यदि किशोर की आयु

(3)14 वर्ष से अधिक हो और वह स्वयं धन-अर्जित करता हो, तो उसे जुर्माना अदा करने का आदेश दे सकेगा।

(4) उसे प्रतिभू सहित या रहित सदाचरण के बन्ध पत्र पर माता-पिता, संरक्षक या किसी योग्य व्यक्ति के संरक्षण में रखे जाने का आदेश दे सकेगा।

(5) किशोर को किसी विशेष गृह में उस अवधि तक रखे जाने का आदेश दे सकेगा जब तक कि वह किशोर किशोरावस्था की आयु पूर्ण नहीं कर लेता। परन्तु यदि किशोर की आयु सत्रह वर्षों से अधिक लेकिन अठारह वर्ष से कम हो, तो उसे दो वर्ष से अनधिक अवधि तक विशेष गृह में रखे जाने हेतु आदेशित कर सकेगा।

(vi) किशोर को सशर्त या बिना शर्त किसी योग्य संस्था या परिवीक्षा अधिकारों को देखरेख में परिवीक्षा पर छोड़ने का आदेश दे सकता है लेकिन परिवीक्षा को अवधि तीन वर्ष से अधिक नहीं हो सकेगी। धारा 15 के उपबंधों का मुख्य उद्देश्य यह है कि विधि का उल्लंघन करने वाले किशोर का अपराध सिद्ध होने पर उसे सामान्य वयस्क अपराधियों के साथ संयुक्त रूप से न रखा जाए क्योंकि इससे उनके कुसंगति में पड़कर आदतन अपराधी बन जाने की संभावना रहती है।

धारा 16 के अनुसार विधि विरोधी किशोर को दण्डित करते समय भी उसके प्रति उदारता किया जा अपेक्षित है। किसी भी दोषसिद्व किशोर को मृत्पुदण्ड या आजीवन कारावास से दण्डित नही किया जा सकेगा। इसी प्रकार जुर्माना अदा किया जाने या प्रतिभू देने में व्यतिक्रम किये जाने पर उसे इसके लिए कारावास से दण्डित नहीं किया जा सकगा।

उच्चतम न्यायालय ने मुन्ना लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के बाद में विनिशि्चित किया कि किशोर अपराधियों को कारावास का दण्डादेश दिये जाने का प्रमुख कारण यह है कि कारागार के दूषित वातावरण तथा अभ्यस्त अपराधियों की संगति से बचाया जा सके ताकि ये भावी जीवन में आपराधिकता की ओर जाने से बचे।

राजेश बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के वाद में भी कलकता उच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि किशोर अपराधियों को कारावासित नहीं किया जाना चाहिए तथा उन्हें समाज में ही रखकर उनका यथासंभव सुधार किया जाना चाहिए।

इस संदर्भ में उच्चतम न्यायालय द्वारा सन 1979 में रोहतास बनाम हरियाणा राज्य के बाद में दिया गया निर्णय उल्लेखनीय है। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि मृत्युदण्ड या आजीवन कारावास से दण्डनीय किसी अपराध के मामले में भी किशोर की सुनवाई किशोर न्यायालय में ही होनी चाहिए न कि सत्र न्यायालय में प्रस्तुत वाद में किशोर के विरुद्ध आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का आरोप था।

उच्चतम न्यायालय ने किशोर अपराधी के प्रति उदारता वरतते हुए निर्णय दिया कि किशोर का विचारण तत्समय प्रभावी हरियाणा बाल अधिनियम, 1974 के अन्तर्गत ही किया जाना चाहिए।

विशेष गृह में भेजा जाना उस किशोर के तथा विशेष गृह में रह रहे अन्य किशोरों के हित में नहीं होगा, तो ऐसी दशा में उस किशोर को सुरक्षा के किसी ऐसे स्थान में रखे जाने का आदेश देगा जो वह उचित समझे और मामले को समुचित आदेश के लिए राज्य सरकार को भेज देगा।

उत्तरांचल राज्य' के वाद में अभियुक्त (किशोर-वय) ने एक सात वर्ष की बालिका को प्रलोभन देकर उसके साथ बलात्संग किया। अभियुक्त के विरुद्ध आरोप सही पाया गया जिसकी पुष्टि चिकित्सीय एवं रासायनिक जांच से भी हो गयी।

यह साबित हुआ कि अपराध घटित होने की तारीख को अभियुक्त किशोर उम्र का था इसलिये उसकी दोषसिद्धि यथावत् रखते हुये उसके सात वर्ष के कारावास के दण्ड को अपास्त कर दिया गया।

एक अन्य वाद में अभियुक्त को हत्या के आरोप में मृत्युदण्ड से दण्डित किया गया था जिसे याचिका द्वारा इस आधार पर आजीवन कारावास में परिवर्तित किये जाने की प्रार्थना की गयी थी कि अपराध की घटना की तारीख को अभियुक्त किशोर-वय का था।

अभियुक्त का मृत्यु दण्डादेश के विरुद्ध अपील तथा पुनर्विलोकन न्यायालय द्वारा निरस्त किया जा चुका था। उसका तर्क था कि अपील के साथ उसने अपनी जन्म तारीख का स्कूल प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया था परन्तु उस पर खण्डपीठ ने विचार नहीं किया।

उच्चतम न्यायालय ने अपीलार्थी की अपील को नामंजूर करते हुये निर्णय दिया कि उसे रिट याचिका के माध्यम से उपचार उपलब्ध नहीं कराया जा सकता, अत: यदि वह चाहे, तो इस हेतु अन्य उपचारात्मक विकल्प चुन सकता है।

धारा 20 में किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 प्रभावी होने के दिनांक को किसी किशोर के विरुद्ध न्यायालय में लम्बित कार्यवाही के व्ययन के बारे में प्रावधान है। इसके अनुसार लम्बित कार्यवाही आगे जारी रखी जाएगी, मानो कि यह अधिनियम पारित न हुआ और यदि न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि किशोर ने अपराध कारित किया है, तो वह उसके विरुद्ध दण्डादेश पारित करने की बजाय उस किशोर को किशोर-न्याय बोर्ड को अग्रेषित कर देगा ।

यदि बोर्ड जाँच के पश्चात् यह पाता है कि किशोर ने अपराध किया है, तो वह उसके विरुद्ध इस अधिनियम के अधीन समुचित आदेश पारित करेगा।

हरीराम बनाम राजस्थान राज्य के वाद में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि किशोर न्याय अधिनियम, 2000 की धारा 20 को धारा 7-क के साथ पढ़ा जाना चाहिये जो दोनों ही सन् 2006 के संशोधन अधिनियम द्वारा संशोधित की गयी है। साथ ही सन 2007 के किशोर न्याय नियमों के नियम 98 को भी ध्यान में रखना होगा।

धारा 7-क में उस प्रक्रिया का वर्णन जब अभियुक्त के किशोर होने का अभिवाक् बोर्ड के समक्ष किया जाता है। धारा 20 भी इसी सन्दर्भ में है। धारा 64 में उस दशा का वर्णन है जबकि विधि का उल्लंघन करने वाला किशोर अधिनियम के लागू होने के समय कारावास की सजा भोग रहा था।

नियम 98 में विधि का उल्लंघन करने वाले किशोर के व्ययन के बारे में प्रावधान है। राज्य सरकार या बोर्ड, स्वप्रेरणा से या किशोर की ओर से आवेदन पर विधि का उल्लंघन करने वाले किशोर के मामले का पुनर्विलोकन कर सकते हैं। इस मामले में न्यायालय ने अपील मंजूर करते हुये अपीलार्थी को तत्काल रिहा किये जाने के आदेश दिये।

किशोर न्याय बोर्ड की कार्यवाही गोपनीय स्वरूप की होती है, अर्थात् इसमें बोर्ड के सदस्यों के अलावा विधि विरोधी किशोर, उसके माता-पिता या अभिभावक तथा प्रक्रिया से संबंधित पुलिस अधिकारी ही सम्मिलित रहते हैं ।

यदि बोर्ड आवश्यक समझे तो किशोर से पूछताछ के समय वह किसी भी व्यक्ति को कार्यवाही स्थल से बाहर जाने का आदेश दे सकता है। किशोर की पहचान अथवा फोटो आदि छापने पर पूर्ण प्रतिबंध है। जब तक कि इसके लिए जाँच करने वाले प्राधिकारी से लिखित अनुमति प्राप्त न कर ली गई हो और बोर्ड की राय में ऐसा प्रकाशन किशोर के हित में हो।

किसी विधि-विरोधी किशोर की पहचान या फोटो का प्रकाशन करने के लिए दोषी पाये जाने वाले व्यक्ति को एक हजार रुपये तक के जुर्माने से दण्डित किया जा सकेगा।

इस अधिनियम की धारा 24 के अनुसार भीख माँगने के लिये किशोर या बालक का नियोजन करना दंडनीय बनाया गया है। जो कोई किशोर या बालक को भीख माँगने के लिए नियोजित या प्रयुक्त करता है या किसी किशोर को भीख माँगना कारित कराता है वह ऐसी अवधि के कारावास से जो तीन वर्षों तक की हो सकती है दण्डनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

(2) जो कोई किसी किशोर या बालक का वास्तविक भार या उस पर नियंत्रण रखते हुए उपधारा (1) के अधीन दण्डनीय अपराध का किया जाना दुष्प्रेरित करता है वह ऐसी अवधि के कारावास से जो एक वर्ष तक हो सकती है दण्डनीय होगा और जुर्माने के लिये भी दायी होगा।

इस अधिनियम के अंतर्गत किशोरों के संबंध में सभी आपराधिक प्रावधानों पर स्पष्ट प्रावधान कर दिए गए है जिससे राष्ट्र के भविष्य निर्माता बच्चों को अपराध की दुनिया से बचाया जा सकें। इस अधिनियम के पारित होने के बाद किशोरों के संबंध में दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधान लागू नहीं होतें हैं।

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