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कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक शोषण से संरक्षण के लिए कानून

Shadab Salim
28 Feb 2021 6:14 AM GMT
कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक शोषण से संरक्षण के लिए कानून
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भारतीय महिलाओं के हितों की प्रतिरक्षा हेतु अनेक प्रयास भारत की संसद द्वारा किए गए हैं। भारत के संविधान निर्माताओं ने भी महिलाओं के अधिकारों को स्पष्ट करने हेतु भारत के संविधान में संपूर्ण प्रावधान किए हैं। किसी समय भारतीय महिलाएं घरेलू कार्य करती थी तथा घर की चारदीवारी के भीतर उनका संसार होता था।

समय ने प्रगति की भारत को स्वतंत्रता मिली तथा भारत ने अपने संविधान का निर्माण किया। भारत के संविधान में अवसर की समानता दी गई तथा गरिमा और प्रतिष्ठा से भरा हुआ जीवन दिया गया। इस गरिमा और प्रतिष्ठा में महिलाओं की गरिमा और प्रतिष्ठा का भी समावेश है। अवसर की समानताओं में किसी लिंग का विभेद नहीं किया गया है। महिलाओं को भी समान रूप से अवसर दिए गए हैं। भारत के संविधान में समान कार्य के लिए समान वेतन की अवधारणा को भी निर्धारित किया। जब महिलाएं घर से निकलकर कार्य स्थल पर पहुंची ऐसी महिलाओं को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।

शैक्षणिक, आर्थिक, सामाजिक, प्रशासनिक व्यवस्था के क्षेत्रों में भी महिलाएं अपनी पहचान बनाने में सफल हुई। कार्य स्थलों में अनेकों महिलाएं भी पुरुषों के साथ कार्यशील हो गई। आज महिलाएं पुरुषों से किसी भी मामले में कम नहीं है। जितने पुरुष कर्मी काम कर रहे हैं उतनी ही महिला कर्मी भी काम में है परंतु महिलाएं अभी भी पुरुष प्रधान समाज के दंश को झेल रही है। पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता का शिकार हो रही है। इसके परिणामस्वरूप कार्यस्थलों पर पुरुषों द्वारा महिला कर्मियों का लैंगिक उत्पीड़न जैसी मानसिकता का एक उदाहरण है।

कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न पर चिंता व्यक्त करते हुए उच्चतम न्यायालय ने समय समय पर अपना मत व्यक्त करते हुए कुछ दिशा निर्देश प्रदान किए हैं ताकि जब तक कोई विधान उपलब्ध नहीं है कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जा सकें। उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 32 के अंतर्गत और अनुच्छेद 141 द्वारा अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग करते हुए स्पष्ट किया है की दिशा निर्देश विधि की भांति ही प्रभावी होंगे। इनका जब तक प्रभाव माना जाएगा जब तक युक्तियुक्त विधि का निर्माण नहीं हो जाता। इन दिशा निर्देशों का वैसा ही कड़ाई से पालन होगा जैसा कि इस प्रकार के लैंगिक उत्पीड़न के मामलों में किया जाता है।

विशाखा बनाम राजस्थान राज्य नामक मामले में लैंगिक समानता के लिए कार्यरत एक गैर सरकारी संगठन द्वारा जनहित याचिका के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 14, 19 तथा 21 के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों को प्रभावी रूप से लागू कराने के उद्देश्य से एक प्रयास किया गया। इस वाद को निर्णय करते समय उच्चतम न्यायालय द्वारा लैंगिक समानता को सुनिश्चित करने वाले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की विषय वस्तु पर विश्वास किया गया और स्पष्ट किया गया है कि मूलभूत रूप से लैंगिक समानता की उपलब्धता निर्वाचित और सुनिश्चित करते समय मनोचित गरिमा सहित कार्य करने का अधिकार तथा लैंगिक उत्पीड़न के विरुद्ध सुरक्षा सुनिश्चित करना अंतर्निहित दायित्व होता है। इस निर्णय के माध्यम से उच्चतम न्यायालय ने कामकाजी महिलाओं के साथ हो रही यौन उत्पीड़न की घटनाओं की रोकथाम के लिए दिशा निर्देश जारी किए जो कि लेख में प्रस्तुत किए जा रहे हैं-

नियोक्ता और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों का कर्तव्य

जिस कार्य स्थल पर कामकाजी महिलाएं हैं वहां के नियोक्ता एवं अन्य जिम्मेदार अधिकारियों का यह कर्तव्य होगा कि कार्यशील महिलाओं के यौन शोषण का निवारण करें उन्हें रोकने का उपाय करें तथा दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध अभियोजन चलाने की कार्यवाही करें तथा अन्य ऐसे उपाय करें जो आवश्यक हो।

यौन उत्पीड़न के लिए अभियोजित व्यक्ति द्वारा सबूत और पीड़ित महिला को तंग और परेशान न किया जाना सुनिश्चित करना

यदि कोई व्यक्ति यौन उत्पीड़न के लिए अभियोजित किया गया है सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पीड़ित महिला के मामले में सबूत देने वाले व्यक्तियों को अभियोजित व्यक्ति के द्वारा परेशान न किया जाए। नियोक्ता को इस बात की जानकारी रखना है तथा जो लोग महिलाओं को परेशान करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध सबूत दे रहे हैं ऐसे व्यक्तियों को समुचित सुरक्षा प्रदान करना है।

उत्पीड़न के निवारण हेतु प्रचार

कामकाजी महिलाओं के यौन उत्पीड़न के निवारण संबंधी दिशा निर्देश प्रचार के उद्देश्य से सूचना पट्टी प्रकाशित की जाएं तथा यौन उत्पीड़न के दुष्परिणामों से भी जनसाधारण को अवगत कराया जाए। उत्तम न्यायालय द्वारा यह दिशानिर्देश सरकारों को दिया गया है जो इस बात पर ध्यान दें कि किसी भी कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संबंधित कानूनों और दिशानिर्देशों का स्पष्ट प्रचार किया जाए तथा जनता को इस बात की जानकारी होना चाहिए कि महिलाओं का यौन उत्पीड़न दंडनीय अपराध है।

यौन उत्पीड़न के दोषी व्यक्ति के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही

यदि कार्यस्थल पर कार्यरत महिला का यौन उत्पीड़न उस कार्यस्थल पर कार्यरत किसी व्यक्ति द्वारा किया जाता है तो उस उत्पीड़न करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए और इस प्रकार के उत्पीड़न करने वाले व्यक्ति को तत्काल निलंबित किया जाना चाहिए।

यौन उत्पीड़न संबंधी शिकायतों की सुनवाई हेतु समितियों का गठन

प्रत्येक कार्य स्थल पर कार्यरत महिलाओं के यौन उत्पीड़न संबंधित परेशानियों की सुनवाई हेतु शिकायत समितियों का गठन किया जाना चाहिए। जब भी कार्यस्थल पर कार्यरत महिलाओं के संबंध में यौन उत्पीड़न की घटनाएं देखने को मिलती है तब इस प्रकार से पीड़ित महिलाएं अपने कार्यस्थल की समिति को इस बात की जानकारी दें।

शिकायत समिति में महिला का अध्यक्ष होना तथा बहुमत सदस्य संख्या में भी महिलाएं होंगी

इस प्रकार के अपराध के विरुद्ध निवारण हेतु बनाई गई समिति की अध्यक्ष महिला होगी तथा समिति के सदस्यों में बहुमत भी महिलाओं का होगा।

यौन उत्पीड़न निवारण विषय पर साहित्य रचना इसका आधिकारिक प्रचार प्रसार

जनता को जागृत करने के उद्देश्य से तथा जनता को यथेष्ट जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से यौन उत्पीड़न निवारण विषय साहित्य की रचना पर जोर दिया जाना चाहिए। ऐसी साहित्यिक सामग्री का अधिक से अधिक वितरण कर जानकारी के प्रचार विस्तार को व्यापक बनाया जाना चाहिए जिससे संबंधित जानकारियों पर विचार हो सके तथा खुलकर विमर्श हो सके।

बाहरी व्यक्तियों द्वारा यौन उत्पीड़न के मामलों में प्रभावित महिलाओं को पर्याप्त संरक्षण की व्यवस्था करना

जब कार्यस्थल पर कार्यरत महिलाओं का यौन उत्पीड़न करने वाले व्यक्ति उस कार्यस्थल में कार्यरत कर्मी न होकर बाहर का कोई व्यक्ति हो तो प्रभावित महिलाओं को बाहरी व्यक्तियों से बचाने हेतु पर्याप्त संरक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए अर्थात कार्यस्थल की बनावट किस प्रकार से होनी चाहिए कि कोई बाहरी व्यक्ति महिलाओं के संबंध में शोषण इत्यादि करने में सफल न हो पाए तथा कार्यस्थल का संगठन इस प्रकार से कार्य करें कि किसी महिला को किसी प्रकार से यौन रूप से प्रताड़ित नहीं किया जाए और अगर ऐसी घटना हुई है तो उस महिला की सहायता की जाए।

कार्यस्थल पर महिला कर्मियों को यौन उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करने हेतु विधि का अभाव है। इसकी पूर्ति हेतु केंद्रीय व राज्य सरकारों द्वारा यौन उत्पीड़न की घटनाओं की रोकथाम हेतु सक्षम विधि बनाकर काम किया जाना चाहिए। अनेकों राज्य द्वारा उत्पीड़न से संबंधित विधियों का निर्माण कर दिया गया है परंतु अभी तक कोई इस संबंध में केंद्रीय कानून उपलब्ध नहीं है तथा भारतीय दंड संहिता की धाराओं से ही काम लिया जा रहा है।

निवारक उपाय

कार्यस्थल पर नियोक्ता तथा जिम्मेदार अधिकारी चाहे वह सार्वजनिक उपक्रम हो या व्यक्तिगत उपक्रम हो को यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि यौन उत्पीड़न के निवारण हेतु समुचित प्रयास हो।

यौन शोषण जैसा कि परिभाषित किया गया है कि स्तरीय सूचना कार्यस्थल पर प्रदर्शित की जाए प्रकाशित की जाए एवं वितरित की जाए।

सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत संस्थाओं में नियम एवं नियमावली अनुशासन से संबंधित है में उन नियमों और विनियमों का समावेश होना चाहिए जिनके माध्यम से यौन शोषण पर निषेध लगे। ऐसे नियमों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को दंड का भागी बनाना पड़े यह समुचित दंड प्रदान किया जाए।

निजी नियोजन के संदर्भ में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उपरोक्त निषेधात्मक और निवारात्मक उपायों को इंडस्ट्रियल एंप्लॉयमेंट अधिनियम 1946 के स्टैंडिंग ऑर्डर में स्थान प्रदान किया जाए।

कार्य की उचित परिस्थितियां प्रदान उपलब्ध कराई जाएं। सुविधा, स्वास्थ्य, स्वच्छता का कार्यस्थल पर विशेष ध्यान रखा जाए। कार्यस्थल का वातावरण महिलाओं के प्रतिकूल न हो तथा कार्यस्थल में परिस्थितियां ऐसी न हो कि महिला कर्मी को यह लगे कि उसे पुरुष कर्मी की तुलना में अलाभकारी स्थिति में कार्य करने को बाध्य किया जा रहा है।

यदि कार्यस्थल पर कार्यरत किसी व्यक्ति का कोई कार्य यौन उत्पीड़न के समान है तो दोषी व्यक्ति दंड का पात्र होगा परंतु यदि दोषी व्यक्ति का कार्य भारतीय दंड संहिता या अन्य किसी अधिनियम महिला का अशिष्ट निरूपण अधिनियम 1986 के अंतर्गत अपराध हो तो नियोक्ता ऐसे अपराधी को दंडित किए जाने हेतु सक्षम अधिकारी के समक्ष परिवाद प्रस्तुत करेगा।

नियोक्ता को चाहिए कि वे कार्यकर्ताओं को अनुमति प्रदान करें कि वे यौन उत्पीड़न के मामलों में कर्मकारों की सभाओं में उठा सके या किसी अन्य मंच पर भी इस पर चर्चा करें। नियोक्ता और कर्मचारियों की बैठकों में भी इस विषय पर चर्चा की जानी चाहिए।

विशाखा के मामले में भारत के उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं के यौन उत्पीड़न को परिभाषित करते हुए उसमें कुछ कार्यों को शामिल किया है, जैसे कि-

महिला से शारीरिक संपर्क और ऐसे संपर्क का प्रयास-

यौन संपर्क का प्रस्ताव या अनुरोध

अश्लील टिप्पणियां इशारे

कामोत्तेजक चित्रों का प्रदर्शन किया और उनका प्रदर्शन, पोर्न का प्रदर्शन

अन्य अशोभनीय अथवा अश्लील आचरण

आर्थिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के अनुच्छेद-7 के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि महिलाओं को कार्य करने की उचित परिस्थितियां उपलब्ध कराई जाएंगी तथा महिलाएं कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का शिकार न हो ऐसा सुनिश्चित किया जाना चाहिए क्योंकि ऐसा न होना कार्य के उचित वातावरण को नष्ट करता है। भारतीय उच्च न्यायालय द्वारा उपरोक्त सम्मेलनों एवं गोष्टी के महत्व को स्वीकार किया गया।

अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल बनाम ए के चोपड़ा एआईआर 1999 उच्चतम न्यायालय 625 के मामले में निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट रूप से मत व्यक्त किया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए लिए गए निर्णय एवं प्रस्तावों का अनुपालन स्थानीय स्तर पर कराना भारतीय न्यायालयों का कर्तव्य हो जाता है। जिम विनियामों सहमति प्रदान के रूप में भारत गणराज्य द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई हो उनके अनुरूप विधि निर्माण में उनका समावेश भी होना चाहिए। विधि की अनुपस्थिति में न्यायालय लैंगिक समानता पर हुए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के सिद्धांतों को उचित सम्मान प्रदान करने हेतु नियमों को मान सकता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा आयोजित मनीला गोष्टी 1993 में स्वीकार किया गया था कि महिलाओं का कार्यस्थल पर उत्पीड़न एक प्रकार का लिंग भेद है जो कि महिलाओं के लिए विभेद कारक है।

अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसलिंग के वाद में प्रत्यार्थी अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसलिंग के चेयरमैन का प्राइवेट सेक्रेट्री था। यह प्राइवेट कंपनी थी प्राइवेट सेकेट्री ए के चोपड़ा द्वारा काउंसिल की एक महिला कर्मी के साथ छेड़छाड़ या उत्पीड़न का प्रयास किया गया। यह महिला कर्मी टाइपिस्ट थी। उसे डिक्टेशन लेने का अनुभव नहीं था परंतु ए के चोपड़ा द्वारा उसे बाध्य किया गया कि वह उसके साथ ताज होटल स्थित व्यापार केंद्र चले वहां उसे चेयरमैन से डिक्टेशन लेना होगा, ऐसा कहा गया।

मामले में प्रत्यार्थी के दबाव में वह होटल ताज चली गई और अपने कक्ष में डायरेक्टर की प्रतीक्षा करने लगी। प्रत्यार्थी द्वारा महिला कर्मी से सटकर बैठने का प्रयास किया गया जबकि इसका विरोध महिला कर्मी द्वारा किया गया। विरोध प्रदर्शित करने पर भी ए के चोपड़ा ने अपनी कार्यशैली नहीं बदली और आपत्तिजनक व्यवहार करते रहे डिक्टेशन लेने के बाद प्रत्यार्थी ने उसे बिजनेस सेंटर में ही टाइप कर लाने को कहा। टाइप करने की सुविधा होटल ताज के बेसमेंट में थी। ए के चोपड़ा ने बिजनेस सेंटर के बेसमेंट दिखाने के बहाने उस एकांत स्थल का लाभ उठाते हुए पुनः महिला कर्मी से सटकर बैठने तथा उसके अंग छूने (उत्पीड़न) का प्रयास किया, लिफ्ट में ऐसा प्रयास किया परंतु आपातकालीन बटन दबाकर महिला कर्मी ने स्वयं को बचा लिया। महिला कर्मी द्वारा संपूर्ण घटना की जानकारी निदेशक महोदय को दी गई तथा इसकी लिखित शिकायत भी दर्ज कराई।

विभागीय स्तर पर कार्यवाही के रूप में कर्मचारी को निलंबित किया गया तथा आरोप पत्र प्रदान किया गया। विवेचना अधिकारी द्वारा प्रदत्त और साक्ष्यों के आधार पर कर्मचारी को सेवा मुक्त किया गया। इस सेवा मुक्ति आदेश के विरुद्ध अपील की गई थी। उच्चतम न्यायालय का मत था कि ऐसे मामलों में जहां लैंगिक उत्पीड़न यौन शोषण का प्रचलित हो वहां न्यायालय से यह अपेक्षा होती है कि वह विस्तृत परिदृश्य में समस्या को रखें। प्रभावित व्यक्ति के कथन को संपूर्ण घटनाक्रम के संदर्भ में देखना चाहिए तथा अत्यंत तकनीकी आवश्यकता की उपलब्धता को भी शिथिल करना चाहिए। प्रस्तुत मामले में न्यायालय का अभिमत था कि प्रत्यार्थी का कार्य नैतिकता से परे था। महिला मातहत के साथ छेड़छाड़ या उत्पीड़न का कार्य यौन उत्पीड़न की परिभाषा में आता है। ऐसे कार्य हेतु सेवा से मुक्ति किया जाना व्यवहार के आपत्तिजनक होने वह दोनों की गुरुता के अनुरूप वैध है।

महिलाओं की यौन उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करने के विषय में भारतीय उच्च न्यायालय द्वारा विशाखा बनाम राजस्थान राज्य के मामले में दिए गए दिशानिर्देश अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस मामले के दिए गए दिशा निर्देश कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संबंधित अपराध को कम करने हेतु मील का पत्थर साबित हुए हैं। जब तक कार्यस्थल पर महिलाओं को यौन उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करने हेतु राष्ट्रीय उपबंध उपलब्ध नहीं है तब तक इस संबंध में यह दिशा निर्देश अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 तथा 21 के आलोक में लैंगिक समानता तथा यौन उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करने हेतु भी इन्हीं अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों को आधार बनाना होगा।

उच्चतम न्यायालय ने अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसलिंग बनाम ए के चोपड़ा के वाद निर्णय में मत व्यक्त किया है कि कार्यस्थल पर महिला कर्मी के साथ किया गया प्रत्येक यौन उत्पीड़न का प्रयास समानता के मूलभूत अधिकार का उल्लंघन होता है जो कि अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। यह संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अनुच्छेद 21 के अधिकार का भी उल्लंघन है, न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करें।

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