झारखंड हाईकोट

निजी पक्षों के भूमि विवाद का फैसला नहीं कर सकते राज्य दिव्यांग आयुक्त, यह अधिकार केवल सिविल कोर्ट का: झारखंड हाईकोर्ट
निजी पक्षों के भूमि विवाद का फैसला नहीं कर सकते राज्य दिव्यांग आयुक्त, यह अधिकार केवल सिविल कोर्ट का: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य दिव्यांग आयुक्त को निजी पक्षों के बीच अचल संपत्ति के स्वामित्व या भूमि विवाद का फैसला करने का अधिकार नहीं है।अदालत ने कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत आयुक्त को जांच के सीमित उद्देश्य से सिविल अदालत जैसी कुछ शक्तियां दी गई हैं, लेकिन इससे उन्हें भूमि स्वामित्व से जुड़े विवादों का निपटारा करने का अधिकार नहीं मिल जाता। जस्टिस श्री आनंद सेन की एकल पीठ दो संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। पहली याचिका में राज्य दिव्यांग आयुक्त के 28 जून 2019...

वैवाहिक मामले की सुनवाई के दौरान बेटा बालिग हो जाए तो माँ उसके DNA टेस्ट के लिए सहमति नहीं दे सकती: झारखंड हाईकोर्ट
वैवाहिक मामले की सुनवाई के दौरान बेटा बालिग हो जाए तो माँ उसके DNA टेस्ट के लिए सहमति नहीं दे सकती: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि अगर वैवाहिक मामले की सुनवाई के दौरान बच्चा बालिग हो जाता है तो माँ के पास बच्चे की ओर से DNA टेस्ट के लिए सहमति देने का अधिकार नहीं रहता। कोर्ट ने कहा कि एक बालिग बच्चा, जो मामले का पक्षकार नहीं है, उसे DNA टेस्ट कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और अगर बच्चा ऐसा टेस्ट कराने से इनकार करता है तो माँ के खिलाफ कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।जस्टिस अनुभा रावत चौधरी की सिंगल जज बेंच एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका गिरिडीह के प्रिंसिपल जज के उस आदेश...

“17 साल की नौकरी के बाद चाय और बिस्किट घर ले जाने पर नौकरी से निकालना सही नहीं”: झारखंड हाईकोर्ट ने चपरासी को बहाल करने का आदेश दिया
“17 साल की नौकरी के बाद चाय और बिस्किट घर ले जाने पर नौकरी से निकालना सही नहीं”: झारखंड हाईकोर्ट ने चपरासी को बहाल करने का आदेश दिया

झारखंड हाईकोर्ट ने कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले चपरासी को बहाल करने का आदेश दिया, जिसे ऑफिस से चाय और बिस्किट लेने के आरोप में नौकरी से निकाल दिया गया था। कोर्ट ने माना कि कथित गलत काम के लिए यह सज़ा बहुत ज़्यादा है। कोर्ट ने यह भी पाया कि अनुशासनात्मक कार्रवाई भी गलत तरीके से की गई, क्योंकि कर्मचारी को एक अस्पष्ट 'शो-कॉज़ नोटिस' (कारण बताओ नोटिस) दिया गया और बिना कोई कारण बताए उसका जवाब खारिज कर दिया गया।चीफ जस्टिस एम.एस. सोनाक और जस्टिस राजेश शंकर की डिवीजन बेंच उस अपील पर सुनवाई कर रही थी,...

झारखंड हाईकोर्ट ने पुरुष एसिड अटैक पीड़ितों के लिए मुआवज़ा स्कीम में बदलाव का सुझाव दिया, पीड़ित का मुआवज़ा बढ़ाकर ₹15 लाख किया
झारखंड हाईकोर्ट ने पुरुष एसिड अटैक पीड़ितों के लिए मुआवज़ा स्कीम में बदलाव का सुझाव दिया, पीड़ित का मुआवज़ा बढ़ाकर ₹15 लाख किया

झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य को 'झारखंड पीड़ित मुआवज़ा स्कीम, 2016' के तहत पुरुष एसिड अटैक पीड़ितों को दिए जाने वाले मुआवज़े पर फिर से विचार करना चाहिए। कोर्ट ने 2019 की संशोधन स्कीम के तहत पुरुष और महिला पीड़ितों को मिलने वाले मुआवज़े में बड़े अंतर को देखते हुए यह बात कही।जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की डिवीज़न बेंच ने एसिड अटैक पीड़ित को मिलने वाले मुआवज़े को ₹3 लाख से बढ़ाकर ₹15 लाख करते हुए यह टिप्पणी की।कोर्ट एक सिंगल जज के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई...

झारखंड हाईकोर्ट ने पलामू में कस्टडी में हुई कथित मौत की न्यायिक जांच का आदेश दिया, BNSS की धारा 196(2) के तहत जांच करने को कहा
झारखंड हाईकोर्ट ने पलामू में कस्टडी में हुई कथित मौत की न्यायिक जांच का आदेश दिया, BNSS की धारा 196(2) के तहत जांच करने को कहा

झारखंड हाईकोर्ट ने पलामू जिले में व्यक्ति की कस्टडी में हुई मौत और उस दौरान उसे दी गई यातना के आरोपों की न्यायिक जांच का आदेश दिया। कोर्ट 'डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सुरक्षा उपायों के उल्लंघन का आरोप लगाने वाली अवमानना ​​याचिका पर सुनवाई कर रहा था।जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अनुभा रावत चौधरी की डिवीजन बेंच ने कहा कि अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू करने से पहले यह तय करना ज़रूरी है कि क्या किसी सरकारी अधिकारी ने 'डी.के. बसु' मामले में तय...

दिव्यांगों के अधिकारों से जुड़े मामलों में विशेष संवेदनशीलता जरूरी, सेवा विवाद होने पर भी जनहित याचिका सुनवाई योग्य: झारखंड हाईकोर्ट
दिव्यांगों के अधिकारों से जुड़े मामलों में विशेष संवेदनशीलता जरूरी, सेवा विवाद होने पर भी जनहित याचिका सुनवाई योग्य: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों और भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़े मामलों में सामान्य सेवा विवादों पर लागू प्रतिबंध के बावजूद जनहित याचिका पर विचार किया जा सकता है।अदालत ने कहा कि दिव्यांगजनों से जुड़े मुद्दों को "विशेष संवेदनशीलता" के साथ देखा जाना चाहिए। चीफ जस्टिस एम. एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ एक ऐसी याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें वर्ष 2018 की उस अधिसूचना को चुनौती दी गई, जिसके तहत भर्ती प्रक्रियाओं में दिव्यांगता प्रमाणपत्र...

झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ऑनलाइन जमीन रिकॉर्ड में गड़बड़ी खत्म, अब सीओ के डिजिटल साइन से ही होगा सत्यापन
झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ऑनलाइन जमीन रिकॉर्ड में गड़बड़ी खत्म, अब सीओ के डिजिटल साइन से ही होगा सत्यापन

झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य भर के सर्कल अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे फिजिकल ज़मीन रजिस्टर और राज्य के ऑनलाइन पोर्टल पर दिख रही एंट्रीज़ के बीच बार-बार पाई जा रही गड़बड़ियों को देखते हुए ऑनलाइन ज़मीन के रिकॉर्ड की जांच करें और उन्हें डिजिटल रूप से प्रमाणित करें।जस्टिस आनंद सेन की सिंगल जज बेंच, लोहरदगा ज़िले के बारीडीह गाँव में स्थित ज़मीन से जुड़े रिकॉर्ड में सुधार की मांग करने वाली राम प्रकाश भगत उर्फ राम प्रकाश उरांव की रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी।याचिकाकर्ता ने रजिस्टर-II, लगान रसीदों और...

झारखंड सरकार के ₹6000 के सालाना प्रीमियम के आश्वासन के बाद हाईकोर्ट ने वकीलों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस की मांग वाली PIL बंद की
झारखंड सरकार के ₹6000 के सालाना प्रीमियम के आश्वासन के बाद हाईकोर्ट ने वकीलों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस की मांग वाली PIL बंद की

झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों के लिए आर्थिक मदद और मेडिकल इंश्योरेंस कवरेज की मांग वाली PIL का निपटारा किया। कोर्ट ने झारखंड सरकार के इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया कि रजिस्टर्ड वकीलों के लिए सालाना प्रीमियम का भुगतान राज्य सरकार लगातार करती रहेगी।चीफ जस्टिस एम.एस. सोनाक और जस्टिस राजेश शंकर की डिवीजन बेंच जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका झारखंड में प्रैक्टिस करने वाले वकील ने दायर की थी, जिसमें वकीलों और उनके आश्रित परिवार के सदस्यों के लिए आर्थिक मदद...

लोकायुक्त के मुख्य न्यायिक काम उनके भाई के खिलाफ शिकायत होने पर भी किसी और को नहीं सौंपे जा सकते: झारखंड हाईकोर्ट
लोकायुक्त के मुख्य न्यायिक काम उनके भाई के खिलाफ शिकायत होने पर भी किसी और को नहीं सौंपे जा सकते: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने लोकायुक्त के अपने ही भाई के खिलाफ आरोपों से जुड़ी कार्यवाही में लोकायुक्त द्वारा पारित एक आदेश को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि 'ज़रूरत का सिद्धांत' (doctrine of necessity) तब लागू होता है, जब लोकायुक्त का पद एक-सदस्यीय संस्था हो और झारखंड लोकायुक्त अधिनियम, 2001 के तहत पद के मुख्य न्यायिक काम किसी और को नहीं सौंपे जा सकते हों।जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की सिंगल जज बेंच संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में झारखंड के लोकायुक्त द्वारा...

झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: हाईकोर्ट में लॉ क्लर्क बनने से वकालत नामांकन का अधिकार खत्म नहीं होता
झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: हाईकोर्ट में लॉ क्लर्क बनने से वकालत नामांकन का अधिकार खत्म नहीं होता

झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हाईकोर्ट में लॉ रिसर्चर या रिसर्च एसोसिएट के रूप में कार्यरत लॉ ग्रेजुएट को वकील के रूप में नामांकन से वंचित नहीं किया जा सकता।हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी नियुक्ति के दौरान उसका वकालत लाइसेंस निलंबित माना जाएगा। जस्टिस आनंद सेन की एकलपीठ ऋचा प्रिया की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में झारखंड राज्य बार काउंसिल को निर्देश देने की मांग की गई कि उसे उसी तारीख से एडवोकेट के रूप में नामांकित किया जाए, जिस दिन उसके साथ आवेदन करने...

427 हिरासत मौतों पर झारखंड हाईकोर्ट सख्त, कहा- कानून की खुली अवहेलना, न्यायिक जांच के दिए आदेश
427 हिरासत मौतों पर झारखंड हाईकोर्ट सख्त, कहा- कानून की खुली अवहेलना, न्यायिक जांच के दिए आदेश

झारखंड में हिरासत में हुई मौतों के मामलों पर झारखंड हाईकोर्ट ने बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य द्वारा पेश किए गए आंकड़े “शब्दों से परे झकझोर देने वाले” हैं। हाईकोर्ट ने पाया कि वर्ष 2018 से अब तक राज्य में 427 लोगों की पुलिस या न्यायिक हिरासत में मौत हुई, लेकिन बड़ी संख्या में मामलों में कानून के स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद न्यायिक जांच नहीं कराई गई।चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में मांग की गई कि हिरासत में मौत, गायब होने...

झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग में अवैध खनन पर जताई सख्त चिंता, कहा- कार्रवाई से बचने के लिए संस्थागत तैयारी की कमी बहाना नहीं
झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग में अवैध खनन पर जताई सख्त चिंता, कहा- कार्रवाई से बचने के लिए 'संस्थागत तैयारी की कमी' बहाना नहीं

झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग के इचक क्षेत्र में अवैध पत्थर खनन और गैरकानूनी स्टोन क्रशर यूनिट्स के संचालन को स्थापित मानते हुए राज्य अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि प्रशासन अब “संस्थागत तैयारी की कमी” का हवाला देकर पर्यावरणीय नुकसान पर कार्रवाई से बच नहीं सकता।चीफ़ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ सिवाने नदी क्षेत्र में अवैध खनन के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि बिना पर्यावरणीय मंजूरी और आवश्यक...

सिर्फ़ आरक्षित श्रेणी से होने से फ़ायदा नहीं मिलता, कट-ऑफ़ तारीख़ से पहले जाति प्रमाण पत्र जमा करना ज़रूरी है: झारखंड हाईकोर्ट
सिर्फ़ आरक्षित श्रेणी से होने से फ़ायदा नहीं मिलता, कट-ऑफ़ तारीख़ से पहले जाति प्रमाण पत्र जमा करना ज़रूरी है: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि आरक्षण चाहने वाले उम्मीदवारों को भर्ती विज्ञापनों में बताई गई शर्तों का सख़्ती से पालन करना होगा, जिसमें कट-ऑफ़ तारीख़ के अंदर तय फ़ॉर्मेट में जाति प्रमाण पत्र जमा करना भी शामिल है। सिर्फ़ आरक्षित श्रेणी से होने से ही कोई उम्मीदवार ऐसे फ़ायदे का दावा करने का हक़दार नहीं हो जाता।चीफ़ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की एक डिवीज़न बेंच अपीलों के एक समूह की सुनवाई कर रही थी, जिसमें 20.12.2019 को सिंगल जज द्वारा दिए गए साझा फ़ैसले को चुनौती दी गई। उस फ़ैसले...

पूर्ण बरी होने या निलंबन पूरी तरह अनुचित पाए जाने पर ही मिलेगा निलंबन अवधि का पूरा वेतन: झारखंड हाईकोर्ट
पूर्ण बरी होने या निलंबन पूरी तरह अनुचित पाए जाने पर ही मिलेगा निलंबन अवधि का पूरा वेतन: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी निलंबित कर्मचारी को बिना पूर्ण दोषमुक्ति के सेवा में बहाल किया जाता है अथवा निलंबन को पूरी तरह अनुचित नहीं ठहराया जाता तो वह निलंबन अवधि के लिए पूर्ण वेतन और निर्वाह भत्ता के अंतर की मांग नहीं कर सकता। ऐसे मामलों में कर्मचारी को केवल उतना ही वेतन और भत्ता मिलेगा, जितना सक्षम प्राधिकारी उचित समझे।जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय और जस्टिस दीपक रोशन की खंडपीठ ने यह निर्णय देते हुए कर्मचारी की अपील खारिज की और एकलपीठ का आदेश बरकरार रखा।मामले के अनुसार कर्मचारी...

झारखंड हाईकोर्ट ने अडानी थर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका स्वीकार की
झारखंड हाईकोर्ट ने अडानी थर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका स्वीकार की

झारखंड हाईकोर्ट ने 15 अप्रैल 2026 के आदेश में गोड्डा जिले में अडानी थर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए 1,363 एकड़ से अधिक कृषि भूमि के अधिग्रहण को चुनौती देने वाली रिट याचिका को स्वीकार करते हुए मामले की सुनवाई करने का निर्देश दिया। इस मामले की सुनवाई जस्टिस आनंद सेन की एकल पीठ ने की।याचिका में भूमि अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया को चुनौती दी गई है, जो भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता अधिनियम, 2013 के तहत की गई थी। इसमें अधिनियम की धारा 4, 5, 11 और 19 के तहत जारी...

बिना इजाज़त जान-बूझकर गैर-हाज़िरी होने पर ही नौकरी से निकाला जा सकता है, बीमारी की वजह से गैर-हाज़िरी पर सज़ा ज़्यादा मानी जाएगी: झारखंड हाईकोर्ट
बिना इजाज़त जान-बूझकर गैर-हाज़िरी होने पर ही नौकरी से निकाला जा सकता है, बीमारी की वजह से गैर-हाज़िरी पर सज़ा ज़्यादा मानी जाएगी: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट की चीफ़ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस दीपक रोशन की डिवीज़न बेंच ने फ़ैसला दिया कि ड्यूटी से बिना इजाज़त गैर-हाज़िरी को जान-बूझकर किया गया साबित करना ज़रूरी है, तभी नौकरी से निकाला जा सकता है। अगर गैर-हाज़िरी किसी मज़बूरी वाली वजह से, जैसे कि किसी मेडिकल बीमारी की वजह से हो, तो सज़ा ज़्यादा मानी जाएगी।मामले की पृष्ठभूमिअपील में जवाब देने वाले (कर्मचारी) को असिस्टेंट टीचर के तौर पर नियुक्त किया गया। तीन साल तक सेवा करने के बाद वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। फिर वह ठीक से मेडिकल जांच...

HIV संक्रमित खून चढ़ाने का मामला गंभीर, बच्चों का भविष्य खतरे में: झारखंड हाईकोर्ट ने मांगी जांच रिपोर्ट
HIV संक्रमित खून चढ़ाने का मामला गंभीर, बच्चों का भविष्य खतरे में: झारखंड हाईकोर्ट ने मांगी जांच रिपोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने चाईबासा सदर अस्पताल में नाबालिग बच्चों को HIV संक्रमित खून चढ़ाने के मामले को बेहद गंभीर बताते हुए राज्य सरकार से जांच की स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी। अदालत ने कहा कि इस घटना ने बच्चों के भविष्य को खतरे में डाल दिया और जिम्मेदार लोगों को सजा मिलनी चाहिए।जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय की सिंगल बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ताओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया कि थैलेसीमिया से पीड़ित नाबालिग बच्चों को अस्पताल के ब्लड बैंक में एचआईवी संक्रमित खून चढ़ाया...