मुख्य सुर्खियां
जस्टिस रमना ने दिये फैमिली कोर्ट के कामकाज में सुधार के सुझाव कहा, IPC की धारा 498 ए पर फिर से विचार हो
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एन वी रमना ने शनिवार को यह कहते हुए परिवार अदालत के कामकाज में सुधार के लिए कई सुझाव दिए कि पारिवारिक जीवन में अशांति से व्यक्ति की कार्यक्षमता और समाज का विकास प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि परिस्थितियों के व्यक्ति के नियंत्रण के बाहर चले जाने के कारण पारिवारिक जीवन में अशांति बढ़ रही है। जस्टिस रमना झारखंड की राजधानी रांची में परिवार अदालतों के न्यायाधीशों को संवेदनशील बनाने के लिए दो-दिवसीय 'प्रथम क्षेत्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम' को सम्बोधित कर रहे...
हाउसिंग सोसाइटी इंडस्ट्री नहीं, इसके कर्मचारी नहीं हैं कामगार, इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फिर दोहराया है कि औद्योगिक विवाद अधिनियम (आईडी एक्ट) , 1947 के तहत हाउसिंग सोसाइटी (आवासीय समिति) न तो 'उद्योग' है और न इसके कर्मचारी 'कामगार'। जस्टिस डॉ. योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव ने गौतमबुद्ध नगर के अरुण विहार रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन की एक अपील पर व्यवस्था दी, "आवासीय समिति सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत पंजीकृत होती है और इसका काम अपार्टमेंट मालिकों को आवश्यक रखरखाव सुविधाएं उपलब्ध कराना है और इस प्रकार सोसाइटी को इंडस्ट्री नहीं कहा जा सकता।" लेबर कोर्ट...
दो या अधिक बच्चों वाले सरकारी कर्मचारियों को नहीं मिलेगा मातृत्व अवकाश, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नियमों को सही ठहराया
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अपनी एकल पीठ द्वारा पारित एक आदेश को रद्द कर दिया है। इस आदेश में एकल पीठ ने उस प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया था, जिसके तहत महिला सरकारी कर्मचारियों को दो या अधिक जीवित बच्चे होने के बाद मातृत्व अवकाश से वंचित कर दिया जाता है। यूपी मौलिक नियमों के नियम 153 के द्वितीय परंतुक में कहा गया है कि "यदि किसी महिला सरकारी कर्मचारी के दो या अधिक जीवित बच्चे हैं तो भी उसे मातृत्व अवकाश नहीं दिया जाएगा। हालांकि ऐसी छुट्टी अन्य किसी वजह से उसके लिए स्वीकार्य हो सकती हैं। यदि किसी...
पति की हत्या के आरोप से पत्नी बरी, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, महिला अकेले पति को पंखे से नहीं लटका सकती, पढ़िए फैसला
हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट द्वारा एक महिला को उसके पति की हत्या का दोषी ठहराया गया था और उसे सज़ा दी। आरोपी ने फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जहां उसे आरोपों से बरी कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पति की हत्या की आरोपी महिला को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी के कथित सहयोगियों के हाईकोर्ट बरी होने के बाद अभियोजन पक्ष द्वारा पेश कहानी पर संदेह जताया और इस संदेह का लाभ आरोपी को दिया।यह भी पढ़ें अनुकम्पा पर नौकरी पाने वाले आश्रितों की सूची में माता-पिता और बहन...
अनुकम्पा पर नौकरी पाने वाले आश्रितों की सूची में माता-पिता और बहन को भी शामिल किया जाये: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी है कि सेवानिवृत्ति से पहले मरने वाले कर्मचारियों के माता-पिता और बहन को अनुकम्पा के आधार पर नौकरी पाने वाले आश्रितों की सूची से बाहर रखना अन्यायपूर्ण एवं इस नियुक्ति योजना के उद्देश्य के विपरीत है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एच सी मिश्रा और न्यायमूर्ति दीपक रोशन की खंडपीठ ने यह व्यवस्था उस रिट याचिका पर विचार करते हुए दी जिसमें यह सवाल उठाया गया था कि नेशनल कोल वेज एग्रीमेंट (एनसीडब्ल्यूए) के उपबंध 9-3-3 के तहत निर्दिष्ट आश्रितों की गैर-मौजूदगी में सेंट्रल...
जब सुप्रीम कोर्ट ने PIL दाखिल करने पर रोक लगाई हो तो याचिका पर सुनवाई नहीं कर सकते : दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को सुराज़ इंडिया ट्रस्ट और उसके अध्यक्ष राजीव दहिया द्वारा दायर जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया जिनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने पहले आदेश जारी किए थे और अपनी रजिस्ट्री को यह निर्देश दिया था कि वह उनके द्वारा दायर किसी भी आवेदन को स्वीकार न करें। "याचिकाकर्ता की सुनवाई करना नहीं है उचित" मुख्य न्यायाधीश डी. एन. पटेल और न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर ने कहा, "यह हमारे लिए संभव और उचित नहीं है कि याचिकाकर्ता की सुनवाई की जाए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को...
एनडीपीएस एक्ट : कोर्ट को संतुष्ट होना चाहिए कि कबूलनामा स्वैच्छिक है और अभियुक्त को उसके अधिकारों से अवगत कराया गया है, सुप्रीम कोर्ट का फैसला
"यहां तक कि अगर यह स्वीकार्य भी है, तो भी अदालत को संतुष्ट होना होगा कि यह एक स्वैच्छिक बयान है, जो किसी भी दबाव से मुक्त है और यह भी कि अभियुक्त को स्वीकारोक्ति/संस्वीकृति दर्ज कराने से पहले अपने अधिकारों से अवगत कराया गया था।"
केरल भारतीय क्षेत्र में, इसकी अदालतें सुप्रीम कोर्ट के फैसले मानने के लिए बाध्य, चर्च मामले में हाईकोर्ट का फैसला रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने केरल में चर्चों में प्रशासन और प्रार्थनाओं के संचालन के अधिकार को लेकर वर्ष 2017 के अपने फैसले में दो गुटों के विवाद में केरलहाई कोर्ट द्वारा छेड़छाड़ करने पर अपने फैसले में यह दोहराया है कि भविष्य में न्यायालयों द्वारा सुप्रीम कोर्ट आदेशों और निर्णयों के उल्लंघन को 'गंभीरता से' लिया जाएगा। केरल हाई कोर्ट का आदेश किया गया था रद्द शीर्ष अदालत ने केरल हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें यह कहा गया था कि मालनकारा चर्चों में प्रार्थना सेवाओं का मालाकार चर्च के दो...
अगर अपराध का इरादा नहीं है तो मकोका के तहत गिरफ़्तारी से संरक्षण दिया जा सकता है, पढ़िए बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला
महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के तहत किसी को गिरफ़्तारी से बचाव का यह पहला उदाहरण हो सकता है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस बारे में सुरजीतसिंह गंभीर की याचिका स्वीकार कर ली है। न्यायमूर्ति रंजीत मोरे और भारती डांगरे की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता पर मकोका के तहत मामला दर्ज करने का फ़ैसला करने वालेआईजी और सीआईडी ने दिमाग़ से काम नहीं लिया है और यह मामला जानबूझकर अपराध करने का नहीं है। इसमें आपराधिक मनःस्थिति ( mens rea) का आभाव था। मकोका के तहत दर्ज हुए मामले में अग्रिम ज़मानत...
हज पर जाने वाले लोग हज कमेटी के उपभोक्ता नहीं, पढ़ें NCDRC का फैसला
राष्ट्रीय उपभोक्ता वाद निपटान आयोग (NCDRC) ने यह दोहराया है कि हज कमिटी ऑफ इंडिया, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के दायरे में नहीं आती है और हज तीर्थयात्री, कमिटी के उपभोक्ता नहीं हैं। न्यायमूर्ति वी. के. जैन ने अधिवक्ता शेख इमरान आलम और राहुल कुमार जैन के माध्यम से हज कमेटी ऑफ इंडिया द्वारा दायर एक पुनरीक्षण याचिका (Revision petition) पर फैसला सुनाते हुए कानून की इस निर्धारित स्थिति को दोहराया। मूल शिकायत 2 हज तीर्थयात्रियों द्वारा (जिन्होंने तीर्थयात्रा के बाद भारत लौटने के दौरान विमान...
जब रोगी के परिवार के सदस्य ऑपरेशन के लिए सहमति देते हैं, तो वे इसके परिणाम सहन करने के लिए भी सहमति देते हैं, हाईकोर्ट का फैसला
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2 डॉक्टरों के खिलाफ चिकित्सीय लापरवाही के लिए आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया और कहा कि "जोखिम हमेशा शामिल होता है और जब रोगी/परिवार के सदस्य ऑपरेशन किए जाने के लिए सहमति देते हैं, तो वे इस तरह के ऑपरेशन और उससे जुड़े परिणाम सहन करने के लिए सहमति देते हैं।" अधिवक्ता भानु भूषण जौहरी के माध्यम से डॉ. आज़म हसीन और डॉ. आदिल महमूद अली द्वारा दायर अपील के जरिये यह मामला न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह- I के समक्ष रखा गया। उन्होंने अतिरिक्त सीजेएम की अदालत में...
जजों को कानून के नियमों का पालन करना चाहिए या शासकों के क़ानून का?
एम श्रीधर आचार्युलू"तबादला का अधिकार बहुत ही ख़तरनाक अधिकार है जो उन जजों के लिए भारी मुश्किलें पैदा करता है और उनकी प्रतिष्ठा पर दाग़ लगाता है जिसका तबादला होता है, क्योंकि तबादला किसी नीति पर अमल की वजह से नहीं होता बल्कि तबादले के लिए जज का चुनाव मनमाने ढंग से किया जाता है और मेरी समझ में इसमें कोई अंतर नहीं है कि तबादला सरकार के कहने पर होता है या भारत के मुख्य न्यायाधीश के कहने पर"। यह बयान सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने एसपी गुप्ता बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक मामले में दिया था। यह टिप्पणी...
रिकवरी प्रमाण पत्र जारी करने के बाद ऋण का भुगतान न करना सतत अपराध नहीं माना जा सकता, सुप्रीम कोर्ट का फैसला
उच्चतम न्यायालय ने यह माना है कि रिकवरी प्रमाण पत्र जारी करने के बाद, ऋण का भुगतान न करने को एक सतत/निरंतर अपराध नहीं माना जा सकता है, जिससे लिमिटेशन एक्ट के तहत कार्रवाई के सतत वादकारण (cause of action) को जन्म दिया जा सके। जस्टिस आर. एफ. नरीमन और जस्टिस सूर्या कांत की पीठ ने NCLAT के एक आदेश, जिसमे एक वित्तीय ऋण के संबंध में एक दिवालिया याचिका (insolvency petition) को अनुमति दी गयी, के खिलाफ दायर अपील को अनुमति देते हुए ऐसा आयोजित किया। अभ्युदय कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड द्वारा 23.12.1999 को...
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, जस्टिस मदन लोकुर ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की हालिया सिफारिशों की आलोचना की
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, न्यायमूर्ति मदन लोकुर ने इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की हालिया सिफारिशे "मनमानी होने के करीब, निरंतरता की अनुपस्थिति का संकेत देती हैं"। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों के चयन की प्रक्रिया को Chancellor's Foot syndrome (अर्थात चांसलर या निर्णय लेने के पद पर बैठे एक व्यक्ति द्वारा पूर्ण रूप से अपने अंतःकरण के मुताबिक निर्णय लिए जाने की प्रथा, जो किसी निर्धारित मानदंड पर आधारित नहीं होती) की संज्ञा देते हुए उन्होंने...
पति ने पत्नी का गलत पता देकर ले ली तलाक की डिक्री, हाईकोर्ट का निर्देश, नए सिरे से करें केस की सुनवाई
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक पति को मिली एकपक्षीय (ex-parte) तलाक की डिक्री को पलट दिया है और मामले को नए सिरे से विचार के लिए परिवार न्यायालय (family court) में वापस भेज दिया है, क्योंकि यह पाया गया कि पति ने पत्नी के गलत पते का विवरण दिया था, जिससे उसकी तलाक की याचिका पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए पत्नी अदालत न आ सके।पत्नी ने उच्च न्यायालय के समक्ष यह दलील दी कि, "चूंकि अपीलार्थी का पैतृक घर राजस्थान राज्य के शिरोनी में है, इसलिए वह वहां गई और उसने दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन...
आपातकाल के दौरान अमेरिका में शरण लेने वाले पहले भारतीय थे राम जेठमलानी
मुकुंद पी उन्नीसमकालीन भारतीय इतिहास में न्यायपालिका और भारतीय लोकतंत्र के लिए सर्वाधिक उथल-पुथल वाले दौर (1970-1976) में राम जेठमलानी बार काउन्सिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष रहे। उनके नेतृत्व में बार काउन्सिल ने क़ानूनी पेशे के बारे में आम आचरण के नियमों को व्यवस्थित किया और इसके लिए बार काउन्सिल ऑफ़ इंडिया रूल्ज़, 1975 को लागू किया। जब बदनाम और आलोकप्रिय आपराधिक मामलों के आरोपियों का बचाव करने वाले वकीलों की आलोचना होती थी तो जेठमलानी के नेतृत्व में बार काउन्सिल ऑफ़ इंडिया उन्हें ज़रूरी सुरक्षा...
राम जेठमलानी द्वारा लड़े गए ये 10 हाई प्रोफाइल केस
वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी, जिन्हें आम तौर पर आपराधिक कानून के विद्वान् के रूप में माना जाता है, का कल सुबह 95 वर्ष की आयु में निधन हो गया। एक साहसी और जुझारू वकील के रूप में जाने गए जेठमलानी, कई हाई-प्रोफाइल मामलों में पेश हुए हैं। यहां उनमें से कुछ का संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है। 1. नानावटी केस विभाजन के बाद कराची से बॉम्बे में अपनी कानूनी प्रैक्टिस को शिफ्ट करने वाले जेठमलानी, नानावटी मामले में अपनी उपस्थिति के साथ चर्चा में आये और उन्होंने खूब सुर्खियाँ बटोरी। उस मामले में,...
कार्यपालिका, न्यायपालिका, सशस्त्र सेनाओं की आलोचना राजद्रोह नहीं है : न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता ने राज्य की संस्थाओं/निकायों की वैध आलोचना के खिलाफ राजद्रोह कानून के उपयोग के कारण उत्पन्न 'चिलिंग प्रभाव' के बारे में विस्तार से बात की। उन्होंने न्यायपालिका की निष्पक्ष आलोचना के सापेक्ष कंटेम्प्ट कार्रवाई के खतरों का भी उल्लेख किया। "न्यायपालिका आलोचना से ऊपर नहीं है। यदि उच्चतर न्यायालयों के न्यायाधीश उनके द्वारा प्राप्त सभी अवमानना संचारों पर ध्यान देने लगें, तो अवमानना कार्यवाही के अलावा अदालतों में कोई काम नहीं हो सकेगा। वास्तव...




















