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रिट प्रक्रिया में हर टेंडर को चुनौती देना आम हो गया है : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]

Live Law Hindi
13 April 2019 2:16 PM GMT
रिट प्रक्रिया में हर टेंडर को चुनौती देना आम हो गया है : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़े]
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मंगलवार को एक फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि अमूमन हर टेंडर को रिट याचिका में चुनौती देना आम बात हो गई है। पीठ ने कहा कि इस वजह से ऐसे सरकारी क्षेत्र, जो निजी क्षेत्रों से प्रतिस्पर्धा कर रहे होते हैं, की वाणिज्यिक गतिविधियों पर प्रभाव पड़ता है।

"सामान्यतया पक्ष क़रार और टेंडर की शर्तों से बँधे होते हैं और सामान्यतया संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत किसी भी तरह की रिट याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती। सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों के आर्थिक गतिविधियों में शामिल होने को देखते हुए अदालत यह मानती है कि निष्पक्षता का तक़ाज़ा है कि नियंत्रण और संतुलन की कुछ व्यवस्था होनी चाहिए। इसी वजह से अनुच्छेद 226 के तहत रिट प्रक्रिया के दौरान टेंडरों की जाँच को बढ़ा दिया गया है। पर ऐसा लगता है कि इसके लिए खिड़की को कुछ ज़्यादा ही खोल दिया गया है और अब इस स्तर पर अमूमन सभी छोटे बड़े टेंडरों को रिट प्रक्रिया के स्तर पर चुनौती दी जाने लगी है।

इस बारे में पूर्व में आए कुछ फ़ैसलों का ज़िक्र करते हुए पीठ ने ऐसे कुछ सिद्धांतों का ज़िक्र किया जिन पर टेंडर क़रार को चुनौती देने वाली रिट याचिकाओं पर विचार करने के दौरान ध्यान देना चाहिए।

• हस्तक्षेप की इजाज़त तभी जब निर्णय लेने की प्रक्रिया कुछ हद तक मनमानी हो और क़ानून के तहत कोई भी अथॉरिटी जो तर्कसंगत निर्णय लेता है, इस तरह का निर्णय नहीं ले सकता।

• संवैधानिक अदालतों को प्रशासनिक निर्णयों में हस्तक्षेप करने में संयम बरतना चाहिए और प्रशासनिक अथॉरिटी के विचार की जगह अपना विचार नहीं डाल देना चाहिए। निर्णय लेने की प्रक्रिया के साथ असहमति इसका पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।

• दस्तावेज तैयार करने वाला व्यक्ति इसकी ज़रूरतों के बारे में ज़्यादा बेहतर जानता है। यह हो सकता हियाँ कि दस्तावेज़ को तैयार करने वाला व्यक्ति इनके बारे में ऐसी दलील दे सकता है जो कि संवैधानिक अदालतों में स्वीकार्य नहीं है। पर इसमें हस्तक्षेप का यह अपने आप में कारण नहीं हो सकता।

"…उद्देश्य यह नहीं है कि हर क़रार में जहाँ कुछ पार्टियाँ पीछे रह गईं, उनको इसमें ख़ामी ढूँढने की इजाज़त दी जाए ताकि जिस पक्ष को टेंडर प्राप्त हुआ है उसको ऐसे आधारों पर अयोग्य ठहरा दिया जाए जिसे टेंडर जारी करने वाला पक्ष भी सही नहीं मानता", कोर्ट ने कहा।

पीठ एक कॉल सेंटर स्थापित करने के लिए हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा जारी ई-टेंडर पर हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ याचिका की सुनवाई कर रहा था।


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