Begin typing your search above and press return to search.
ताजा खबरें

सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

LiveLaw News Network
5 Dec 2021 4:30 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
x

सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (29 नवंबर, 2021 से 3 दिसंबर, 2021) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं, सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण आयकर अधिनियम की धारा 254(2) के तहत शक्ति लागू करके अपने आदेश वापस नहीं ले सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण आयकर अधिनियम की धारा 254 (2) के तहत शक्ति का आह्वान करते हुए उसके द्वारा पारित आदेशों को वापस नहीं ले सकता है।

जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने कहा, "धारा 254 (2) की शक्ति केवल रिकॉर्ड से स्पष्ट गलती को सुधारने और संशोधित करने के लिए है और उससे आगे कुछ भी नहीं।"

इस मामले में, आईटीएटी ने राजस्व की अपील को स्वीकार कर लिया और माना कि सॉफ्टवेयर की खरीद के लिए किए गए भुगतान रॉयल्टी की प्रकृति में हैं। निर्धारिती ने अधिनियम की धारा 254(2) के तहत सुधार के लिए विविध आवेदन दायर किया।

केस का नाम: आयकर आयुक्त (आईटी -4), मुंबई बनाम रिलायंस टेलीकॉम लिमिटेड

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

सजा में एकपक्षीय वृद्धि अवैध; अगर आरोपी का प्रतिनिधित्व नहीं है तो हाईकोर्ट एमिकस क्यूरी की नियुक्ति करनी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि हाईकोर्ट द्वारा सजा में एकपक्षीय वृद्धि सीआरपीसी के तहत वैधानिक आदेश के खिलाफ है, जिसके तहत आपराधिक पुनरीक्षण में सजा को बढ़ाने से पहले मामला को दिखाने का अवसर प्रदान करता है।

जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बेला त्रिवेदी की खंडपीठ ने मद्रास हा्ईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अपीलकर्ताओं को कानूनी प्रतिनिधित्व ‌दिए बिना और मामले में एमिकस क्यूरी नियुक्त किए बिना सजा को बढ़ाया गया था।

केस शीर्षक: कृष्णन और अन्य बनाम राज्य पुलिस उपाधीक्षक और अन्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

एनआई अधिनियम की धारा 138 उन मामलों में भी लागू होती है जहां चेक आहरण के बाद और प्रस्तुति से पहले ऋण लिया जाता है: सुप्रीम कोर्ट

''केवल चेक को एक प्रतिभूति के रूप में लेबल करने मात्र से कानूनी रूप से लागू करने योग्य ऋण या देयता को पूरा करने के लिए डिज़ाइन किए गए एक इंस्ट्रूमेंट के रूप में इसके चरित्र को खत्म नहीं किया जाएगा।" सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (एनआई) एक्ट की धारा 138 उन मामलों में लागू होती है जहां चेक के आहरण के बाद लेकिन उसके नकदीकरण से पहले कर्ज लिया जाता है।

न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना की पीठ ने कहा कि धारा 138 का सही उद्देश्य पूरा नहीं होगा, अगर 'ऋण या अन्य देयता' की व्याख्या केवल उस ऋण को शामिल करने के लिए की जाए, जो चेक के आहरण की तारीख को मौजूद हो।

केस का नाम: सुनील टोडी बनाम गुजरात सरकार

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

पिछले वर्ष के लिए वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट को डाउनग्रेड करना विभागीय पदोन्नति समिति के अधिकार क्षेत्र में नहीं जिसमें पहले ही कार्रवाई की जा चुकी है : सुप्रीम कोर्ट

शुक्रवार को, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा लिए गए दृष्टिकोण में कोई गलती नहीं पाई, जिसमें कहा गया है कि पिछले वर्ष के लिए वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट (एपीएआर) को डाउनग्रेड करना विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) के अधिकार क्षेत्र में नहीं है जिसमें पहले ही कार्रवाई की जा चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि डीपीसी किसी अधिकारी को नोटिस दिए बिना उसे डाउनग्रेड नहीं कर सकता, जब संबंधित प्राधिकरण ने उसे अपग्रेड करने के कारण दर्ज किए थे।

[मामला: संघ लोक सेवा आयोग बनाम अवतार सिंह अरोड़ा और अन्य 2021 का डायरी नंबर 10581]

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

यौन उत्पीड़न के खिलाफ जीने और गरिमा का अधिकार अनुच्छेद 21 में निहित: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि यौन उत्पीड़न के खिलाफ सभी व्यक्तियों के लिए जीने के अधिकार और गरिमा के अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित हैं। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यह महत्वपूर्ण है कि "अति-तकनीकी " आधार पर यौन उत्पीड़न की शिकायतों को खारिज करने के बजाय इस अधिकार की भावना को बरकरार रखा जाए।

न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013, जो एक परिवर्तनकारी कानून है, पीड़ित व्यक्तियों की सहायता में आने में विफल रहेगा यदि यौन दुराचार की जांच की कार्यवाही लागू सेवा नियमों की ' अति-तकनीकी ' व्याख्या' पर अमान्य कर दी जाती है।

केस: भारत संघ और अन्य बनाम मुद्रिका सिंह

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

किशोर होने का दावा किसी भी अदालत में, किसी भी स्तर पर, यहां तक कि मामले के अंतिम निपटारे के बाद भी किया जा सकता है : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किशोर होने का दावा किसी भी अदालत में, किसी भी स्तर पर, यहां तक कि मामले के अंतिम निपटारे के बाद भी किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी और न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी की पीठ ने कहा कि यदि न्यायालय अपराध करने की तारीख को किसी व्यक्ति को किशोर मानता है, तो उसे उचित आदेश और सजा, यदि कोई हो, पारित करने के लिए किशोर को बोर्ड को भेजना होगा। किसी न्यायालय द्वारा पारित आदेश का कोई प्रभाव नहीं माना जाएगा।

केस: अशोक बनाम मध्य प्रदेश राज्य | अपील करने के लिए विशेष अनुमति ( आपराधिक) संख्या - 643/2020

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

आईपीसी की धारा 149 – किसी व्यक्ति को महज इसलिए गैर-कानूनी भीड़ का हिस्सा नहीं माना जा सकता कि उसने पीड़ित के ठिकाना बताया: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक मामले में एक व्यक्ति की दोषसिद्धि को रद्द करते हुए हाल ही में कहा है कि किसी व्यक्ति को महज इसलिए गैर-कानूनी जमावड़ा का हिस्सा नहीं माना जा सकता कि उसने हत्यारी भीड़ को पीड़ित का ठिकाना बताया था। उस व्यक्ति को गैर-कानूनी भीड़ के सामान्य उद्देश्य का साझेदार नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश की पीठ ने यह कहते हुए आगाह किया कि अदालतों को अपराध के सामान्य उद्देश्य को साझा करने के लिए अपराध के केवल निष्क्रिय दर्शकों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 149 के माध्यम से दोषी ठहराने की प्रवृत्ति से परहेज करना चाहिए।

केस का शीर्षक: तैजुद्दीन बनाम असम सरकार

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

हवाईअड्डे की सुरक्षा जांच में विकलांगों को कृत्रिम अंग हटाने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने विकलांग व्यक्तियों के लिए सुविधाजनक हवाई यात्रा सुनिश्चित करने के लिए दायर एक याचिका में बुधवार को कहा कि कृत्रिम अंगों (Prosthetic Limbs) / कैलिपर वाले विकलांग व्यक्तियों को हवाई अड्डे की सुरक्षा जांच में कृत्रिम अंग को हटाने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए ताकि मानवीय गरिमा बनाए रखी जा सके।

कोर्ट ने यह भी देखा कि हवाई यात्रा या सुरक्षा जांच के दौरान विकलांग व्यक्ति को उठाना अमानवीय है और कहा कि ऐसा व्यक्ति की सहमति के बिना नहीं किया जाना चाहिए।

केस का शीर्षक: जीजा घोष बनाम भारत संघ| डब्ल्यूपी (सी) 98/2012

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

आईबीसी की धारा 12 के तहत निर्धारित अवधि के भीतर ही पूरी समाधान प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिवाला और दिवालियापन संहिता की धारा 12 के तहत निर्धारित अवधि के भीतर ही पूरी समाधान प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए।

न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने कहा कि कोई भी विचलन ऐसी समय सीमा प्रदान करने के उद्देश्य और लक्ष्य को विफल कर देगा।

केस का: कॉरपोरेशन बैंक के माध्यम से एमटेक ऑटो लिमिटेड के लेनदारों की समिति बनाम दिनकर टी वेंकटब्रमण्यम

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

सेवानिवृत्ति के समय मौजूद नियमों पर ही पेंशन निर्धारित की जाएगी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सेवानिवृत्ति पर किसी कर्मचारी को देय पेंशन सेवानिवृत्ति के समय मौजूद नियमों पर निर्धारित की जाएगी। न्यायालय ने यह भी कहा कि कानून नियोक्ता को समान रूप से स्थित व्यक्तियों के संबंध में नियमों को अलग तरीके से लागू करने की अनुमति नहीं देता है।

वर्तमान मामले में जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ केरल उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच द्वारा पारित 29 अगस्त, 2019 के एक आदेश के खिलाफ एक सिविल अपील पर विचार कर रही थी, जिसमें उच्च न्यायालय ने अपील को खारिज कर दिया था।

केस: डॉ जी सदाशिवन नायर बनाम कोचीन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, इसके रजिस्ट्रार द्वारा प्रतिनिधित्व और अन्य। सिविल अपील संख्या 6994/2021

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

वयस्क होने तक बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारी पिता की है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक जोड़े के विवाह को भंग करते हुए कहा कि जब तक बच्चा / बेटा वयस्क (Majority Age) नहीं हो जाता, तब तक बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व पिता की है। अदालत ने कहा कि माता-पिता के बीच विवादों के कारण बच्चे को पीड़ित नहीं होना चाहिए।

इस मामले में, पत्नी ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसने क्रूरता और परित्याग के आधार पर विवाह को भंग करने वाले फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ उसकी अपील को खारिज कर दिया था। उसने अदालत से "क्रूरता" पर उसके खिलाफ निष्कर्षों को हटाने का अनुरोध किया।

केस का नाम: नेहा त्यागी बनाम लेफ्टिनेंट कर्नल दीपक त्यागी

ऑर्डर डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें

सुप्रीम कोर्ट ने 31 मार्च, 2020 से पहले ई-वाहन पोर्टल पर अपलोड किए गए बीएस-IV वाहनों की बिक्री के रजिस्ट्रेशन की अनुमति दी

सुप्रीम कोर्ट ने 31.03.2020 से पहले ई-वाहन पोर्टल पर अपलोड किए गए बीएस-IV वाहनों की बिक्री के रजिस्ट्रेशन की अनुमति दी है। साथ ही कोर्ट ने कहा कि बशर्ते कि अस्थायी/स्थायी रजिस्ट्रेशन कट ऑफ तिथि यानी 31.03.2020 से पहले दिया गया हो। हालांकि संबंधित परिवहन अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के लिए रिकॉर्ड की सावधानीपूर्वक जांच करने का निर्देश दिया गया कि बिक्री वास्तविक और 31.03.2020 से पहले हुई है।

केस टाइटल: एमसी मेहता बनाम भारत संघ

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

विशेष न्यायालय एमएमडीआर अधिनियम के साथ- साथ आईपीसी के तहत अपराधों का संयुक्त ट्रायल कर सकता है : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम के तहत एक विशेष न्यायालय आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 220 के अनुसार भारतीय दंड संहिता के तहत अपराधों के साथ-साथ एमएमडीआर अधिनियम के तहत अपराधों का संयुक्त ट्रायल कर सकता है।

धारा 220 सीआरपीसी उन स्थितियों को निर्दिष्ट करती है जहां अपराधों का संयुक्त ट्रायल संभव है। कोर्ट ने एमएमडीआर अधिनियम की धारा 30 सी के साथ सीआरपीसी की धारा 4 और 5 के संयुक्त पठन पर उल्लेख किया, कि संहिता के तहत निर्धारित प्रक्रिया विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाही पर लागू होगी जब तक कि एमएमडीआर अधिनियम इसके विपरीत कुछ भी प्रदान नहीं करता है।

केस: प्रदीप एस वोडेयार बनाम कर्नाटक राज्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

यदि गवाही भरोसेमंद है तो केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर बलात्कार के आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है : सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि बलात्कार के आरोपी को केवल पीड़िता/अभियोक्ता (prosecuterix) की गवाही के आधार पर दोषी ठहराया जा सकता है, लेकिन यह गवाही विश्वसनीय और भरोसेमंद होनी चाहिए।

इस मामले में, बलात्कार के आरोपी को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375 के तहत समवर्ती रूप से दोषी ठहराया गया था। आरोपी द्वारा उठाया गया एक तर्क यह था कि अभियोजन का मामला पूरी तरह से पीड़िता (अभियोक्ता) के बयान पर टिका है और किसी अन्य स्वतंत्र गवाह की जांच नहीं की गई है जिसने अभियोक्ता के मामले का समर्थन किया हो।

केस का नाम: फूल सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

जब मरीज को सर्जरी के लिए ले जाया गया और उस समय ऑपरेशन थियेटर उपलब्ध नहीं था तो यह अस्पताल की ओर से चिकित्सा लापरवाही नहीं : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में माना कि जब अन्य रोगियों की सर्जरी की जा रही हो, उस समय इमर्जेंसी ऑपरेशन थियेटर की अनुपलब्धता अस्पताल की लापरवाही का वैध आधार नहीं हो सकती।

जस्टिस हेमंत टी गुप्ता और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की पीठ ने कहा कि गंभीर स्थिति में भर्ती कोई मरीज अगर सर्जरी के बाद भी जिंदा नहीं रह पाता तो दोष अस्पताल या डॉक्टर को नहीं दिया जा सकता है, जिसने अपने साधनों के अनुसार हर संभव उपचार दिया।

केस शीर्षक: बॉम्बे हॉस्पिटल एंड मेडिकल रिसर्च सेंटर बनाम आशा जायसवाल और अन्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

जब अभियोजन पक्ष आईपीसी की धारा 300 में "तीसरे" के तत्वों को स्थापित किया तो आरोपी का मौत का कारण बनने का इरादा अप्रासंगिक : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एक बार जब अभियोजन पक्ष भारतीय दंड संहिता की धारा 300 में "तीसरे" का हिस्सा बनने वाले तीन तत्वों के अस्तित्व को स्थापित करता है, तो यह अप्रासंगिक है कि आरोपी की ओर से मौत का कारण बनने का इरादा था या नहीं।

न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायमूर्ति एएस ओक की पीठ राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा पारित 18 जुलाई, 2016 के आदेश के खिलाफ एक आपराधिक अपील पर विचार कर रही थी।

केस: विनोद कुमार वी अमृतपाल @ छोटू और अन्य।| 2021 की आपराधिक अपील संख्या 1519

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संज्ञान लेने के लिए पूरी तरह तार्किक आदेश जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संज्ञान लेने के लिए कोर्ट की ओर से पूरी तरह से तर्कसंगत आदेश जारी करना अनिवार्य नहीं है। (केस: प्रदीप एस वोडेयार बनाम यूनियन ऑफ इंडिया)

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर एक अपील पर विचार कर रही थी, जिसने आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया था।

केस शीर्षक: प्रदीप एस वोडेयार बनाम कर्नाटक राज्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

सुप्रीम कोर्ट ने डीएनबी रेजीडेंसी ट्रेनिंग के दौरान 308 दिनों का मातृत्व अवकाश लेने वाली महिला उम्मीदवार को थ्योरी परीक्षा देने की अनुमति दी

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महिला उम्मीदवार को दिसंबर में होने वाली थ्योरी परीक्षा देने की अनुमति दी, जिसने प्रसूति और स्त्री रोग विज्ञान में डीएनबी रेजीडेंसी ट्रेनिंग के दौरान 308 दिनों का मातृत्व अवकाश लिया था।

न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना की पीठ ने कहा कि राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड के 18 जनवरी के परिपत्र के खंड 6 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि तीन महीने की अवधि के लिए COVID-19 के कारण प्रशिक्षण का विस्तार विशेष परिस्थितियों में था और उम्मीदवारों की अपनी संबंधित एग्जिट परीक्षाओं में बैठने की पात्रता में हस्तक्षेप न करें क्योंकि पात्रता के उद्देश्य के लिए कट-ऑफ तिथियां भी तदनुसार संशोधित मानी जाएंगी।

केस का शीर्षक: दिव्य वेणुगोपालन बनाम राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड एंड अन्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

उपभोक्ता आयोग को जमानती वारंट तभी जारी करना चाहिए जब वकील या प्रतिनिधि के माध्यम से पार्टी का प्रतिनिधित्व बिल्कुल भी न हुआ हो: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उपभोक्ता आयोग को केवल अंतिम उपाय के रूप में किसी पार्टी की उपस्थिति के लिए जमानती वारंट जारी करना चाहिए। यदि पक्ष का प्रतिनिधित्व वकील या अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से किया जाता है तो जमानती वारंट जारी करना न्यायोचित नहीं है।

कोर्ट ने कहा, "जमानती वारंट अंतिम उपाय के रूप में जारी किए जाने चाहिए और केवल ऐसे मामले में जहां यह पाया जाता है कि विरोधी दल बिल्कुल भी सहयोग नहीं कर रहे हैं और वे जानबूझकर राष्ट्रीय आयोग के सामने पेश होने से बच रहे हैं और/या उनका प्रतिनिधित्व बिल्कुल भी नहीं हुआ है, भले ही अधिकृत प्रतिनिधि या उनके वकील के माध्यम से।''

केस टाइटल : एलएंडटी फाइनेंस लिमिटेड बनाम प्रमोद कुमार राणा और अन्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

हाईकोर्ट बिना कारण बताए शुरुआत में ही दूसरी अपील खारिज नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

सु्प्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए कि हाईकोर्ट सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 100 के तहत दायर दूसरी अपील बिना कारण बताए शुरुआत में ही खार‌िज नहीं कर सकता है। एक मामले को फिर से विचार करने के लिए हाईकोर्ट को वापस भेज दिया। मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने एक वाक्य के आदेश के साथ दूसरी अपील को खारिज कर दिया था।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, "यहां दी गई प्रस्तुतियों और कानून के प्रश्न को देखते हुए यह कोर्ट दूसरी अपील को स्वीकार करने के लिए कानून का कोई प्रश्न नहीं पाता है, जिसके कारण दूसरी अपील खारिज की जाती है।"

केस शीर्षक: हसमत अली बनाम अमीना बीबी और अन्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

पक्षद्रोही गवाह के विश्वसनीय साक्ष्य आपराधिक मुकदमे में दोषसिद्धि का आधार बन सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा कि एक आपराधिक मुकदमे में पक्षद्रोही गवाह (Hostile Witness) के विश्वसनीय साक्ष्य भी दोषसिद्धि का आधार बन सकते हैं।

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि भले ही गवाह मुकर गए हों, उनके सबूत स्वीकार किए जा सकते हैं, अगर वे स्वाभाविक और स्वतंत्र गवाह हैं और उनके पास आरोपी को झूठा फंसाने का कोई कारण नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसे गवाहों के साक्ष्य को मिटाया हुआ या रिकॉर्ड को पूरी तरह से मिटाया हुआ नहीं माना जा सकता है।

केस का नाम: हरि बनाम उत्तर प्रदेश राज्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

जब नियम विशेष प्रक्रिया को अपनाने की प्रणाली और तरीके पर विचार करते हैं, तो अधिकारियों के लिए नियमों का सख्ती से पालन कर शक्ति का प्रयोग करना अनिवार्य : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब नियम विशेष प्रक्रिया को अपनाने की प्रणाली और तरीके पर विचार करते हैं, तो अधिकारियों की ओर से नियम का सख्ती से पालन करके ऐसी शक्ति का प्रयोग करना अनिवार्य है।

वर्तमान मामले में न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय की पीठ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 7 अप्रैल, 2009 के आदेश ("आक्षेपित आदेश") के खिलाफ सिविल अपील पर विचार कर रही थी।

केस: भारत संघ और अन्य बनाम राम बहादुर यादव| 2010 की सिविल अपील संख्या 9334

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

शस्त्र अधिनियम- लाइसेंसी या स्वीकृत हथियार का अवैध उपयोग धारा 5 या 7 के तहत दुराचार को साबित किए बिना धारा 27 के तहत अपराध नहीं : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने पाया है कि एक लाइसेंसी या स्वीकृत हथियार का अवैध उपयोग शस्त्र अधि नियम, 1959 ("अधिनियम") की धारा 27 के तहत अपराध नहीं है जब तक कि अधिनियम की धारा 5 या 7 के तहत दुराचार साबित ना किया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि सेवा नियमों के तहत यह ज्यादा से ज्यादा 'कदाचार' हो सकता है।

वर्तमान मामले में सीजेआई एनवी एनवी रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के 19 मई, 2010 के आदेश ("आक्षेपित आदेश") के खिलाफ एक आपराधिक अपील पर विचार कर रही थी।

केस: सुरिंदर सिंह बनाम राज्य (केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़)| 2010 की आपराधिक अपील संख्या 2373

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63 के तहत शर्तों का यांत्रिक तरीके से अनुपालन वसीयत के निष्पादन को साबित नहीं करता : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 63 के तहत शर्तों का यांत्रिक तरीके से अनुपालन वसीयत के निष्पादन को साबित नहीं करता।

जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की बेंच ने कहा कि उक्त प्रावधान की आवश्यकता को पूरा करने के साक्ष्य विश्वसनीय होने चाहिए।

केस : हरियाणा राज्य बनाम हरनाम सिंह (डी)

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

मर्डर केस ट्रायल - निजी बचाव मामले में घायल गवाह के साक्ष्य को ऊंचे पायदान पर नहीं रखा जाएगा, जबकि आरोपी भी घायल हो गया हो: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि यह सिद्धांत कि एक घायल गवाह के साक्ष्य को एक ऊंचे पायदान पर रखा जाना चाहिए, निजी बचाव के मामले पर लागू नहीं हो सकता, जब आरोपी भी घायल हो गया हो।

न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश ने पहले आरोपपत्र में तय किए गए आरोपों को चुनौती देते हुए अभियुक्तों द्वारा दायर अपीलों के एक बैच की अनुमति दी, जबकि इसने वास्तविक शिकायतकर्ता द्वारा एक ट्रायल में दायर अपीलों को खारिज कर दिया, जो आगे की जांच के बाद दायर दूसरे आरोपपत्र के अनुसार शुरू हुई थी।

केस: अरविंद कुमार @ नेमीचंद और अन्य बनाम राजस्थान राज्य

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Next Story