सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Update: 2026-02-08 03:30 GMT

सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (02 फरवरी, 2026 से 06 फरवरी, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

सेकेंडरी सबूत पेश करने की शर्तें साबित न होने तक दस्तावेज़ की फोटोकॉपी सबूत नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फोटोकॉपी किए गए पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर की गई बिक्री यह देखते हुए रद्द की कि किसी दस्तावेज़ की फोटोकॉपी, जो सेकेंडरी सबूत है, तब तक सबूत नहीं है जब तक कि वह एविडेंस एक्ट की धारा 65 में बताई गई शर्तों के तहत न आती हो। एविडेंस एक्ट की धारा 65 सेकेंडरी सबूत (कॉपी, मौखिक बयान) पेश करने की अनुमति देती है, जब मूल दस्तावेज़ धारा 64 के तहत पेश नहीं किया जा सकता। यह तब लागू होता है, जब मूल दस्तावेज़/सबूत खो गया हो, नष्ट हो गया हो, विरोधी पक्ष के कब्ज़े में हो, या एक सार्वजनिक दस्तावेज़ हो।

Cause Title: THARAMMEL PEETHAMBARAN AND ANOTHER VERSUS T. USHAKRISHNAN AND ANOTHER

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PMLA | अटैचमेंट की पुष्टि के खिलाफ अपील लंबित हो तो संपत्ति जब्ती का आदेश नहीं दे सकती स्पेशल कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 8 की व्याख्या करते हुए एक अहम फैसला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि PMLA की धारा 8(3) के तहत अटैचमेंट की पुष्टि के खिलाफ अपील अपीलीय अधिकरण में लंबित है तो स्पेशल कोर्ट धारा 8(7) के तहत संपत्ति की जब्ती की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ा सकती।

जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि जैसे ही धारा 8(3) के आदेश को धारा 26 के तहत चुनौती दी जाती है, धारा 8(7) की कार्यवाही पर एक निहित रोक लग जाती है।

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अर्ध-न्यायिक प्राधिकरणों के पास समीक्षा की शक्ति नहीं होती, जब तक कि कानून द्वारा उन्हें यह शक्ति न दी गई हो: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (6 फरवरी) को कहा कि अर्ध-न्यायिक प्राधिकरणों को समीक्षा क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने का अधिकार नहीं है, जब तक कि कानून द्वारा उन्हें ऐसा करने का अधिकार न दिया गया हो।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया, जिसमें राजस्व अधिकारी द्वारा समीक्षा क्षेत्राधिकार के प्रयोग को सही ठहराया गया। कोर्ट ने कहा कि राज्य मंत्री के निर्देशों के अनुसार, प्रतिवादी के पक्ष में विवादित भूमि का हस्तांतरण अस्वीकार्य था, खासकर तब जब भूमि पहले ही राज्य सरकार के पास हस्तांतरित हो चुकी थी।

Cause Title: STATE OF WEST BENGAL & ORS. VERSUS JAI HIND PVT. LTD.

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सहकारी हाउसिंग सोसायटी द्वारा निर्णय में अनुचित देरी होने पर वैधानिक प्राधिकरण हस्तक्षेप कर सकता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई सहकारी हाउसिंग सोसायटी किसी मामले पर निर्णय लेने से इनकार करती है या उसे लंबे समय तक लंबित रखती है, तो ऐसे में वैधानिक प्राधिकरण सोसायटी के मामलों में हस्तक्षेप कर सकते हैं ताकि न्याय और निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने यह टिप्पणी मुंबई स्थित मालबोरो हाउस को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी लिमिटेड से जुड़े एक मामले में की। यह मामला उन फ्लैट मालिकों से संबंधित था, जो कई वर्षों से अपने-अपने फ्लैटों में शांतिपूर्वक रह रहे थे, लेकिन इसके बावजूद उन्हें सोसायटी की सदस्यता नहीं दी जा रही थी।

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BNSS की धारा 35(3) के नोटिस के बाद गिरफ़्तारी केवल नए तथ्यों पर ही संभव: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि BNSS, 2023 की धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी करना—उन अपराधों में जिनमें अधिकतम सज़ा सात वर्ष तक है—अनिवार्य है। साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि धारा 35(6) के तहत गिरफ़्तारी नोटिस जारी होने के बाद केवल उन्हीं नए तथ्यों/सामग्रियों के आधार पर की जा सकती है, जो नोटिस जारी करते समय पुलिस अधिकारी के पास उपलब्ध नहीं थीं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 35(6) के अंतर्गत गिरफ़्तारी करते समय पुलिस अधिकारी उन परिस्थितियों या कारकों पर भरोसा नहीं कर सकता, जो धारा 35(3) का नोटिस जारी करते समय मौजूद थे। यानी, बाद की गिरफ़्तारी के लिए ताज़ा सामग्री/कारक आवश्यक होंगे। कोर्ट ने यह भी चेताया कि धारा 35(6) के तहत गिरफ़्तारी की शक्ति का प्रयोग अत्यंत सीमित और अपवादस्वरूप होना चाहिए।

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किसी महिला खासकर नाबालिग को गर्भ पूरा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और संवेदनशील फैसले में कहा कि किसी भी महिला को और विशेष रूप से किसी नाबालिग लड़की को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसी टिप्पणी के साथ अदालत ने एक नाबालिग लड़की की 30 सप्ताह की गर्भावस्था को मेडिकल रूप से समाप्त करने की अनुमति दी। मामले की सुनवाई जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने की।

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राज्य सरकार के कर्मचारी साल में दो बार महंगाई भत्ता क्लेम नहीं कर सकते, जब तक कि नियम इसकी इजाज़त न दें: सुप्रीम कोर्ट

पश्चिम बंगाल सर्विसेज (वेतन और भत्ते में संशोधन) नियम, 2009 के तहत महंगाई भत्ते के भुगतान पर निर्देशों को लेकर पश्चिम बंगाल राज्य की चुनौती पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार के कर्मचारियों को अधिकार के तौर पर साल में दो बार डीए के भुगतान का हक नहीं है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने कहा – “इसका कारण यह है कि RoPA नियमों में, जिनका हमने ऊपर ज़िक्र किया, कहीं भी यह नहीं कहा गया कि डीए का भुगतान साल में दो बार किया जाएगा या किया जा सकता है। जो कुछ भी नियमों में नहीं दिया गया, जो संबंधित समय अवधि के लिए 'मौजूदा वेतन' के वितरण को नियंत्रित करते हैं, उसे किसी भी पक्ष का अधिकार नहीं कहा जा सकता है। कर्मचारियों के साल में दो बार डीए के वितरण के अधिकार की वैध उम्मीद के सिद्धांत पर आधारित तर्क को खारिज करने की ज़रूरत है, जैसा कि पहले वितरित किया गया था, क्योंकि यह कानूनी पाठ से नहीं निकलता है।”

Case Title – State of West Bengal v. Confederation of State Government Employees, West Bengal

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सुप्रीम कोर्ट ने BCI की नॉमिनेशन फीस को मंज़ूरी दी, हाईकोर्ट्स से कहा- फीस को चुनौती देने के मामले में स्टेट बार काउंसिल चुनावों में दखल न दें

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा स्टेट बार काउंसिल्स के चुनाव लड़ने के लिए तय की गई 1.25 लाख रुपये की नॉमिनेशन फीस को मंज़ूरी दी। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने यह भी निर्देश दिया कि कोई भी हाईकोर्ट चुनाव फीस तय करने को लेकर किसी भी चुनौती के कारण चल रहे बार काउंसिल चुनावों में दखल नहीं देगा। बेंच ने घोषणा की कि इस मुद्दे पर हाई कोर्ट्स में लंबित सभी रिट याचिकाओं को खारिज माना जाएगा।

Case : BAR COUNCIL OF INDIA v. PRAHLAD SHARMA AND ORS. T.P.(C) No. 3577-3590/2025

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'कर्ता' द्वारा खरीदी गई प्रॉपर्टीज़ को जॉइंट हिंदू फैमिली की संपत्ति माना जाएगा, जब तक कि इसके विपरीत न साबित हो: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (5 फरवरी) को कहा कि एक बार जब पैतृक, आय देने वाली संपत्ति का अस्तित्व साबित हो जाता है तो जॉइंट हिंदू फैमिली के अस्तित्व के दौरान कर्ता द्वारा किया गया कोई भी बाद का अधिग्रहण जॉइंट फैमिली की संपत्ति माना जाएगा, जब तक कि खुद के अधिग्रहण का दावा करने वाला व्यक्ति ठोस सबूतों के साथ सबूत का बोझ साबित न कर दे।

कोर्ट ने कहा, "जहां जॉइंट फैमिली के अस्तित्व के दौरान अधिग्रहण किए जाते हैं, और जहां आय देने वाली पैतृक संपत्तियों का अस्तित्व दिखाया जाता है, वहां कर्ता के नाम पर खरीदी गई संपत्तियों को आमतौर पर जॉइंट फैमिली की संपत्ति माना जाता है, जब तक कि इसके उलट साबित न हो।"

Cause Title: DORAIRAJ VERSUS DORAISAMY (DEAD) THROUGH LRs & ORS.

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DGP नियुक्ति में देरी पर सख्त सुप्रीम कोर्ट: समय पर प्रस्ताव न भेजने वाले राज्यों के खिलाफ UPSC चला सकेगा अवमानना कार्यवाही

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि राज्य सरकारों को पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति के लिए संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को प्रस्ताव भेजने में अनावश्यक देरी नहीं करनी चाहिए। अदालत ने कई राज्यों में 'कार्यवाहक/अध hoc DGP' नियुक्त करने की प्रवृत्ति पर असंतोष जताते हुए UPSC को यह अधिकार दिया कि वह राज्यों को समय पर प्रस्ताव भेजने के लिए रिमाइंडर भेजे। यदि इसके बावजूद राज्य सरकारें डिफॉल्ट करती हैं, तो UPSC को अवमानना कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता होगी।

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7 साल तक की सज़ा वाले अपराधों में गिरफ्तारी नियम नहीं, बल्कि अपवाद; ऐसे मामलों में BNSS की धारा 35(3) के तहत नोटिस अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 35(3) के तहत 7 वर्ष तक की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस द्वारा नोटिस देना अनिवार्य है, और नोटिस दिए बिना गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने कहा कि ऐसे अपराधों में गिरफ्तारी नियम नहीं, बल्कि अपवाद है। जब तक धारा 35(3) के तहत नोटिस देकर अभियुक्त को उपस्थित होने का अवसर न दिया जाए और वह उसका पालन करे, तब तक गिरफ्तारी नहीं हो सकती।

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RTE Act | केंद्र से फंड न मिलने का हवाला देकर राज्य शिक्षकों को कम मानदेय नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार द्वारा धनराशि जारी न किए जाने का हवाला देकर राज्य सरकार शिक्षकों को बेहद कम मानदेय देने का औचित्य नहीं ठहरा सकती। कोर्ट ने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) के क्रियान्वयन की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की है, और उसे पहले शिक्षकों को भुगतान करना होगा; केंद्र का हिस्सा बाद में वसूला जा सकता है।

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि सर्व शिक्षा अभियान/समग्र शिक्षा योजना के तहत नियुक्त अंशकालिक प्रशिक्षकों (फिजिकल एजुकेशन, आर्ट व वर्क एजुकेशन) को ₹17,000 प्रति माह मानदेय दिया जाए। कोर्ट ने RTE Act, 2009 की धारा 7(5) पर भरोसा करते हुए कहा कि अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए धन उपलब्ध कराने का अंतिम दायित्व राज्य पर है।

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'सख्त राजनीतिक पोस्ट के लिए कोई मैकेनिकल FIR नहीं': सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़े मामलों के लिए जारी दिशानिर्देश बरकरार रखें

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़े मामलों में FIR दर्ज करने को रेगुलेट करने के लिए तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा बनाए गए दिशानिर्देश बरकरार रखें और पुलिस को "सख्त, आपत्तिजनक या आलोचनात्मक राजनीतिक भाषणों" पर बिना सोचे-समझे FIR दर्ज न करने का निर्देश दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट के मामले में दुश्मनी को बढ़ावा देने, सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा या देशद्रोह के लिए FIR तभी दर्ज की जा सकती है, जब प्रथम दृष्टया मामला बनता हो।

Case Title – State of Telangana v. Nalla Balu @ Durgam Shashidhar Goud & Anr.

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फाइनल रिपोर्ट दाखिल करने के बाद आगे की जांच के लिए कोर्ट की इजाज़त ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस खुद से आगे की जांच नहीं कर सकती। साथ ही CrPC की धारा 173(8)/BNSS की धारा 193(9) के तहत आगे की जांच करने से पहले कोर्ट की इजाज़त लेना ज़रूरी है।

जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने आरोपियों द्वारा दायर अपील मंज़ूरी की और 2023 का इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया, जिसमें एक दशक पुराने रेप केस में पुलिस अधिकारियों को "आगे की जांच" जारी रखने की इजाज़त दी गई।

Cause Title: PRAMOD KUMAR & ORS. VERSUS STATE OF U.P. & ORS.

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तलाक के बाद पति का अपनी पूर्व पत्नी का भरण-पोषण करने का कर्तव्य सिर्फ इसलिए खत्म नहीं होगा कि वह पढ़ी-लिखी है या उसे माता-पिता का सहारा है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक पति तलाक के बाद अपनी पूर्व पत्नी का भरण-पोषण करने के कर्तव्य से इस आधार पर बच नहीं सकता कि वह पढ़ी-लिखी या उसे माता-पिता का सहारा है। जस्टिस एसवीएन भट्टी और आर महादेवन की बेंच ने यह टिप्पणी की, "हमारे समाज में शादी एक ऐसी संस्था है, जो भावनात्मक जुड़ाव, साथ और आपसी सहारे पर आधारित है, जिसे सिर्फ पैसे के हिसाब से नहीं आंका जा सकता। एक महिला अक्सर एक स्थिर और सम्मानजनक जीवन की सही उम्मीदों के साथ शादी करती है। जब ऐसी शादी टूट जाती है तो पति का यह कर्तव्य कि पत्नी सम्मान के साथ जी सके, सिर्फ इस आधार पर खत्म नहीं हो जाता कि वह पढ़ी-लिखी है या उसे माता-पिता का सहारा है। तलाक के बाद पत्नी को उस जीवन स्तर के अनुसार जीने का अधिकार है, जिसकी उसे शादी के दौरान आदत थी।"

Cause Title: Y VERSUS X

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प्राइमरी टीचरों को दस साल तक हर महीने 7000 रुपये देना बंधुआ मज़दूरी है: सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार से 17 हज़ार रुपये देने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (4 फरवरी) को उत्तर प्रदेश सरकार की "गलत हरकतों" के लिए आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि राज्य के प्राइमरी स्कूल टीचरों/इंस्ट्रक्टरों को एक दशक से ज़्यादा समय तक हर महीने सिर्फ़ 7,000 रुपये का मामूली फिक्स्ड मानदेय देकर एक तरह की 'बेगार' करवाई जा रही है।

टीचरों को मिलने वाली सैलरी स्थिर और कम होने पर जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने राज्य सरकार को सभी टीचरों को हर महीने 17,000 रुपये का मानदेय देने का निर्देश दिया। यह फैसला फाइनेंशियल ईयर 2017-18 से लागू होगा और बकाया छह महीने के अंदर देना होगा।

Cause Title: STATE OF UTTAR PRADESH AND ORS. VERSUS ANURAG AND ORS. (with connected matters)

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भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A अवैध रिश्वत की मांग के मामलों पर लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17-A का संरक्षण लोक सेवकों द्वारा अवैध रिश्वत की मांग के मामलों में लागू नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान केवल उन मामलों तक सीमित है, जहाँ अपराध सरकारी कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए निर्णय या दी गई सिफारिशों से संबंधित हो।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस एस.सी. शर्मा की खंडपीठ ने कहा— “धारा 17-A एक विशेष उद्देश्य से लाई गई है। यह उन अपराधों पर लागू होती है जो लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में लिए गए निर्णय या दी गई सिफारिशों से संबंधित हों। अवैध रिश्वत की मांग के मामलों में धारा 17-A किसी भी तरह से लागू नहीं हो सकती।”

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आर्बिट्रेटर का कार्यकाल खत्म होने के बाद दिया गया अवार्ड तब तक अमान्य नहीं होगा, जब तक कोर्ट समय बढ़ा दे: सुप्रीम कोर्ट

एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (3 फरवरी) को कहा कि जहां धारा 29A के तहत तय कानूनी अवधि के बाद कोई आर्बिट्रल अवार्ड दिया जाता है तो ऐसा अवार्ड भले ही ट्रिब्यूनल का कार्यकाल तकनीकी रूप से खत्म होने के बाद दिया गया हो, उसे लागू किया जा सकता है, अगर धारा 29A के तहत सक्षम कोर्ट में आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के कार्यकाल को बढ़ाने के लिए आवेदन किया गया हो।

Cause Title: C. VELUSAMY VERSUS K INDHERA

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POSH Act के तहत ICC की रिपोर्ट के खिलाफ अपील सुन सकता है, सशस्त्र बल अधिकरण: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फैसला दिया कि POSH अधिनियम के तहत गठित आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee – ICC) की रिपोर्ट और उसकी सिफारिशों से आहत कोई भी सैन्य कर्मी, सशस्त्र बल अधिकरण (Armed Forces Tribunal – AFT) के समक्ष अपील दायर कर सकता है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की खंडपीठ ने यह कहते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि POSH अधिनियम की धारा 18 के तहत सैन्य कर्मी को ICC की रिपोर्ट के खिलाफ AFT में जाने का कोई अधिकार नहीं है।

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IBC | आपस में जुड़ी कॉर्पोरेट संस्थाओं के खिलाफ सिंगल इनसॉल्वेंसी याचिका दायर की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट

घर खरीदारों को राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (2 फरवरी) को फैसला सुनाया कि रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की धारा 7 के तहत एक से ज़्यादा कॉर्पोरेट संस्थाओं के खिलाफ एक ही इनसॉल्वेंसी याचिका दायर की जा सकती है, अगर वे प्रोजेक्ट के एग्जीक्यूशन और मार्केटिंग में आपस में जुड़ी हुई हैं।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने NCLAT का फैसला बरकरार रखा, जिसने दो कॉर्पोरेट संस्थाओं के खिलाफ जॉइंट कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) की अनुमति दी थी जो रियल एस्टेट प्रोजेक्ट से आपस में जुड़ी हुईं।

Cause Title: SATINDER SINGH BHASIN versus COL. GAUTAM MULLICK & ORS. (with connected matters)

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