भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A अवैध रिश्वत की मांग के मामलों पर लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

4 Feb 2026 4:10 PM IST

  • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A अवैध रिश्वत की मांग के मामलों पर लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17-A का संरक्षण लोक सेवकों द्वारा अवैध रिश्वत की मांग के मामलों में लागू नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान केवल उन मामलों तक सीमित है, जहाँ अपराध सरकारी कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए निर्णय या दी गई सिफारिशों से संबंधित हो।

    जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस एस.सी. शर्मा की खंडपीठ ने कहा—

    “धारा 17-A एक विशेष उद्देश्य से लाई गई है। यह उन अपराधों पर लागू होती है जो लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में लिए गए निर्णय या दी गई सिफारिशों से संबंधित हों। अवैध रिश्वत की मांग के मामलों में धारा 17-A किसी भी तरह से लागू नहीं हो सकती।”

    धारा 17-A के अनुसार, जब किसी लोक सेवक के खिलाफ आरोप उसके आधिकारिक निर्णय या सिफारिश से जुड़े हों, तभी जांच शुरू करने से पहले सरकार की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होती है।

    यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट के उस निर्णय से जुड़ा था, जिसमें कहा गया था कि राज्य का एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB), राज्य में पदस्थ केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के मामलों की जांच और एफआईआर दर्ज कर सकता है, और इसके लिए सीबीआई की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं है।

    याचिकाकर्ता पर पीसी एक्ट की धारा 7 और 7-A के तहत आरोप थे। उसने दलील दी कि केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना जांच नहीं हो सकती। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह तर्क खारिज करते हुए कहा कि—

    रिश्वत की मांग आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं है।

    इसलिए, ऐसे मामलों में धारा 17-A के तहत पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं पड़ती।

    राज्य पुलिस या राज्य ACB भी केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ जांच कर सकती है।

    इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी और साफ किया कि धारा 17-A का दुरुपयोग कर रिश्वतखोरी के मामलों में जांच रोकी नहीं जा सकती।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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