7 साल तक की सज़ा वाले अपराधों में गिरफ्तारी नियम नहीं, बल्कि अपवाद; ऐसे मामलों में BNSS की धारा 35(3) के तहत नोटिस अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

5 Feb 2026 1:58 PM IST

  • 7 साल तक की सज़ा वाले अपराधों में गिरफ्तारी नियम नहीं, बल्कि अपवाद; ऐसे मामलों में BNSS की धारा 35(3) के तहत नोटिस अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 35(3) के तहत 7 वर्ष तक की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस द्वारा नोटिस देना अनिवार्य है, और नोटिस दिए बिना गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।

    जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने कहा कि ऐसे अपराधों में गिरफ्तारी नियम नहीं, बल्कि अपवाद है। जब तक धारा 35(3) के तहत नोटिस देकर अभियुक्त को उपस्थित होने का अवसर न दिया जाए और वह उसका पालन करे, तब तक गिरफ्तारी नहीं हो सकती।

    गिरफ्तारी “विवेकाधीन”, अनिवार्य नहीं

    कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी जांच की प्रक्रिया में पुलिस का विवेकाधीन (discretionary) अधिकार है, कोई अनिवार्यता नहीं।

    धारा 35 BNSS के अनुसार, बिना वारंट गिरफ्तारी तभी संभव है जब—

    1. धारा 35(1)(b)(i) के तहत पुलिस को यह कारणयुक्त विश्वास हो कि अभियुक्त ने अपराध किया है; और

    2. धारा 35(1)(b)(ii) के तहत कम-से-कम एक आवश्यकता मौजूद हो (जैसे आगे अपराध रोकना, साक्ष्य से छेड़छाड़ रोकना, गवाहों की सुरक्षा, जांच में सहयोग, या अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित करना)।

    इन दोनों शर्तों की एकसाथ पूर्ति आवश्यक है। इसके बावजूद भी गिरफ्तारी स्वतः अनिवार्य नहीं है; पुलिस को निर्णय लेना होगा और कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे—चाहे गिरफ्तारी करे या न करे।

    धारा 35(3): नोटिस देना “नियम”

    धारा 35(3) के तहत पुलिस गिरफ्तारी के बजाय नोटिस देकर उपस्थित होने को कह सकती है। कोर्ट ने कहा कि 7 वर्ष तक की सज़ा वाले अपराधों में इस प्रावधान को धारा 35(1)(b) और उसके प्रावधानों के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

    यदि नोटिस का पालन किया जाता है और अभियुक्त उपस्थित होता है, तो धारा 35(5) के अनुसार उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट की टिप्पणी:

    “7 वर्ष तक की सज़ा वाले अपराधों में धारा 35(3) के तहत नोटिस देना नियम है, जबकि धारा 35(6) सहपठित धारा 35(1)(b) के तहत गिरफ्तारी स्पष्ट अपवाद है।”

    सुप्रीम कोर्ट के निष्कर्ष (संक्षेप में)

    i. गिरफ्तारी अनिवार्य नहीं, बल्कि जांच को सुगम बनाने का विवेकाधीन साधन है।

    ii. पुलिस को पहले यह तय करना होगा कि गिरफ्तारी आवश्यक है या नहीं।

    iii. 7 वर्ष तक की सज़ा वाले अपराधों में गिरफ्तारी से पहले धारा 35(1)(b) की शर्तें पूरी होना आवश्यक है।

    iv. धारा 35(3) का नोटिस नियम है; गिरफ्तारी अपवाद।

    v. नोटिस के बाद भी गिरफ्तारी रूटीन नहीं, केवल अत्यावश्यक होने पर।

    vi. पुलिस को गिरफ्तारी/गैर-गिरफ्तारी—दोनों के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे।

    यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा और अनावश्यक गिरफ्तारियों पर अंकुश लगाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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