किसी महिला खासकर नाबालिग को गर्भ पूरा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
6 Feb 2026 1:35 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और संवेदनशील फैसले में कहा कि किसी भी महिला को और विशेष रूप से किसी नाबालिग लड़की को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
इसी टिप्पणी के साथ अदालत ने एक नाबालिग लड़की की 30 सप्ताह की गर्भावस्था को मेडिकल रूप से समाप्त करने की अनुमति दी।
मामले की सुनवाई जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने की।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में गर्भवती लड़की की प्रजनन संबंधी स्वायत्तता यानी उसके अपने शरीर और भविष्य को लेकर निर्णय लेने के अधिकार को सर्वोपरि माना जाना चाहिए खासकर तब जब उसने साफ तौर पर गर्भ जारी न रखने की इच्छा जताई हो।
अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विचार का मुख्य बिंदु यह है कि नाबालिग लड़की गर्भ को आगे बढ़ाना चाहती है या नहीं।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यहां यह सवाल निर्णायक नहीं है कि गर्भ किसी सहमति वाले संबंध से ठहरा या यौन शोषण का परिणाम था। तथ्य यह है कि लड़की स्वयं नाबालिग है और वह इस गर्भावस्था को आगे नहीं बढ़ाना चाहती।
पीठ ने कहा कि जब मां बनने जा रही लड़की की इच्छा और हितों को देखा जाए तो उसकी प्रजनन स्वायत्तता को पूरा महत्व दिया जाना चाहिए।
अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि न्यायालय किसी महिला को और वह भी नाबालिग हो तो उसे गर्भ पूरा करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने माना कि यह मामला नैतिक और कानूनी रूप से कठिन सवाल खड़े करता है। उन्होंने कहा कि यह सच है कि किसी बच्चे का जन्म अंततः एक जीवन को जन्म देता है। मौजूदा मामले में सबसे अहम बात यह है कि नाबालिग लड़की लगातार और स्पष्ट रूप से गर्भ जारी न रखने की इच्छा जता रही है।
उन्होंने कहा कि अगर कानून 24 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति देता है तो ऐसे असाधारण हालात में 30 सप्ताह पर भी यही प्रश्न उठता है कि क्या किसी लड़की को उसकी इच्छा के खिलाफ मां बनने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
अंततः अदालत के अनुसार सबसे बड़ा तथ्य यही है कि वह लड़की बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए मुंबई के जेजे अस्पताल को निर्देश दिया कि वह नाबालिग की गर्भावस्था को मेडिकल रूप से समाप्त करे और इस दौरान सभी आवश्यक चिकित्सकीय सावधानियां और सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाएं।
यह फैसला न केवल नाबालिगों के अधिकारों को रेखांकित करता है बल्कि महिलाओं की प्रजनन स्वतंत्रता को लेकर सुप्रीम कोर्ट के मानवीय और संवेदनशील दृष्टिकोण को भी सामने लाता है।

