सहकारी हाउसिंग सोसायटी द्वारा निर्णय में अनुचित देरी होने पर वैधानिक प्राधिकरण हस्तक्षेप कर सकता है: सुप्रीम कोर्ट
Praveen Mishra
6 Feb 2026 4:06 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई सहकारी हाउसिंग सोसायटी किसी मामले पर निर्णय लेने से इनकार करती है या उसे लंबे समय तक लंबित रखती है, तो ऐसे में वैधानिक प्राधिकरण सोसायटी के मामलों में हस्तक्षेप कर सकते हैं ताकि न्याय और निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने यह टिप्पणी मुंबई स्थित मालबोरो हाउस को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी लिमिटेड से जुड़े एक मामले में की। यह मामला उन फ्लैट मालिकों से संबंधित था, जो कई वर्षों से अपने-अपने फ्लैटों में शांतिपूर्वक रह रहे थे, लेकिन इसके बावजूद उन्हें सोसायटी की सदस्यता नहीं दी जा रही थी।
फ्लैट मालिकों ने पहले सोसायटी से सदस्यता के लिए संपर्क किया, लेकिन जब लंबे समय तक कोई निर्णय नहीं लिया गया, तो उन्होंने महाराष्ट्र सहकारी सोसायटी अधिनियम, 1960 के तहत डिविजनल जॉइंट रजिस्ट्रार का रुख किया। जॉइंट रजिस्ट्रार ने सोसायटी को फ्लैट मालिकों को सदस्यता देने का निर्देश दिया।
हालांकि, बाद में बाॉम्बे हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट का कहना था कि यह अधिकार केवल सोसायटी का है कि वह तय करे कि उसका सदस्य कौन बनेगा। इसके बाद फ्लैट मालिकों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए, जस्टिस संदीप मेहता द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि यद्यपि किसी हाउसिंग सोसायटी को अपने आंतरिक मामलों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता है, लेकिन यह स्वतंत्रता असीमित नहीं है। यदि सोसायटी वर्षों तक किसी आवेदन पर निर्णय नहीं लेती या जानबूझकर उसे लंबित रखती है, तो सरकारी प्राधिकरणों का हस्तक्षेप पूरी तरह से उचित है।
कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं ने पहले सोसायटी के अधिकृत अधिकारी के समक्ष सदस्यता के लिए आवेदन किया था। जब अधिकृत अधिकारी ने यह कहते हुए निर्णय लेने से इनकार कर दिया कि उसके पास नीति संबंधी निर्णय लेने का अधिकार नहीं है, तभी अपीलकर्ताओं ने अधिनियम के तहत उपलब्ध अपील और पुनरीक्षण जैसे वैधानिक उपायों का सहारा लिया। ऐसे में हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष कि जॉइंट रजिस्ट्रार ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश पारित किया, कानूनन टिकाऊ नहीं है।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने जॉइंट रजिस्ट्रार द्वारा सदस्यता प्रदान करने के आदेश को सही ठहराया और अपील स्वीकार की।
हालांकि, खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सोसायटी के अन्य सदस्य लंबे समय तक योगदान राशि के भुगतान में देरी के कारण अतिरिक्त या बढ़े हुए ब्याज के निर्धारण को लेकर असंतुष्ट हैं, तो वे उचित प्राधिकरण के समक्ष अलग से आवेदन कर सकते हैं। इसके अलावा, 30 सितंबर 2025 को हुई एजीएम (AGM) के निर्णय को चुनौती देने का प्रश्न भी कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से विचार के लिए खुला छोड़ा गया है।
इन अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया और खर्चों के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया।

