हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (27 अप्रैल, 2026 से 01 मई, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
चार्जशीट के बिना पेंडिंग जांच के आधार पर प्रमोशन से इनकार नहीं किया जा सकता: गुवाहाटी हाईकोर्ट
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे महिला सब-इंस्पेक्टर के मामले पर फिर से विचार करें ताकि उन्हें सब-इंस्पेक्टर (UB) के पद पर स्थायी किया जा सके और इंस्पेक्टर (UB) के पद पर प्रमोट किया जा सके। कोर्ट ने इस बात को ध्यान में रखा कि उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला पेंडिंग होने के बावजूद, कोई चार्जशीट दायर नहीं की गई।
इस मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस बुडी हाबुंग ने टिप्पणी की, "दोनों पक्षकारों के वकीलों की दलीलों पर विचार करने और रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों को देखने के बाद इस कोर्ट की राय है कि अगर प्रतिवादी अधिकारियों को याचिकाकर्ता के मामले पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया जाता है तो न्याय की मांग पूरी होगी।"
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PC Act के तहत कार्रवाई के लिए रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार करना ही काफी: राजस्थान हाईकोर्ट
भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018 (PC Act) के तहत दर्ज FIR रद्द करने की याचिका खारिज करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि इस प्रावधान के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि संबंधित सरकारी कर्मचारी वास्तव में वह सरकारी काम करने की स्थिति में हो।
जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर की बेंच ने टिप्पणी की कि इस अपराध के मामले में यह काफी है कि सरकारी कर्मचारी ने यह विश्वास दिलाकर रिश्वत स्वीकार की हो कि वह रिश्वत देने वाले की मदद किसी अन्य सरकारी कर्मचारी के माध्यम से करवा देगा, और रिश्वत देने वाले ने वास्तव में उसी विश्वास के आधार पर रिश्वत दी हो।
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सामाजिक संतुलन को बिगाड़ने वाली धार्मिक प्रथाओं की शुरुआत या विस्तार अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षित नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी ऐसी धार्मिक प्रथा या उपयोग की शुरुआत या विस्तार, जो पहले से प्रचलित नहीं थी—विशेष रूप से यदि वह मौजूदा सामाजिक संतुलन को बिगाड़ती है—तो उसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षण प्राप्त नहीं है।
पीठ ने आगे कहा कि राज्य के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि वह किसी वास्तविक व्यवधान का इंतज़ार करे; बल्कि, जहां ऐसी गतिविधि से सार्वजनिक जीवन प्रभावित होने की आशंका हो, वहां राज्य उचित निवारक उपाय कर सकता है।
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निजी ज़मीन पर नियमित सामूहिक धार्मिक गतिविधियां सरकारी नियमों से मुक्त नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि निजी संपत्ति पर धार्मिक प्रार्थनाएं आयोजित की जा सकती हैं, बशर्ते वे कभी-कभार और बिना किसी बाधा के हों; लेकिन जब संपत्ति का इस्तेमाल नियमित या संगठित सामूहिक गतिविधियों के लिए किया जाता है तो उस पर सरकारी नियम लागू हो सकते हैं।
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने आगे कहा कि अगर निजी संपत्ति पर ऐसी गतिविधि नियमित, संगठित या बड़े पैमाने पर होने लगती है तो इसे परिसर के इस्तेमाल के तरीके में बदलाव माना जा सकता है। यह योजना और स्थानीय नियमों सहित लागू कानूनों के अधीन होगा।
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प्राइवेट ट्रस्ट के साथ सर्विस विवाद रिट अधिकार क्षेत्र के तहत सुनवाई योग्य नहीं: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने 'द ट्रिब्यून ट्रस्ट' के कर्मचारी द्वारा दायर रिट याचिका खारिज की। कोर्ट ने माना कि किसी निजी संस्था के साथ पूरी तरह से संविदात्मक रोज़गार से उत्पन्न होने वाले सर्विस विवाद संविधान के अनुच्छेद 226/227 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र के दायरे में नहीं आते।
जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने कहा, "प्रतिवादी-ट्रस्ट एक स्वतंत्र संस्था है, जिसके अपने नियम हैं, जो उसके कर्मचारियों की सेवा के आंतरिक विनियमन के लिए बनाए गए हैं। इसके अलावा... किसी भी वैधानिक नियम के अभाव में प्रतिवादी-ट्रस्ट और उसके कर्मचारियों के बीच संबंध की प्रकृति निजी नियोक्ता और निजी कर्मचारी जैसी है, क्योंकि इसमें कोई सार्वजनिक कानून तत्व शामिल नहीं है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता द्वारा प्रतिवादी-ट्रस्ट के जिस कार्य को चुनौती दी गई, वह उसकी सेवा समाप्ति के संबंध में निजी संविदात्मक विवाद की प्रकृति का है। रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है, जो यह दर्शाता हो कि चुनौती दिए गए कार्य में कोई ऐसा सार्वजनिक तत्व है, जिसके लिए इस कोर्ट के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।"
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आरोप वाला गिरफ़्तारी मेमो अनुच्छेद 22(1) की गिरफ़्तारी के आधार बताने की शर्त को पूरा करता है: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ़्तार व्यक्ति को गिरफ़्तारी के आधार बताने की संवैधानिक शर्त तब पूरी मानी जाती है, जब गिरफ़्तारी मेमो, जिसमें गिरफ़्तारी का आधार बनाने वाले ज़रूरी तथ्यात्मक आरोप शामिल हों, आरोपी को दे दिया जाता है।
कोर्ट ने कहा कि इसका मकसद आरोपों के सार की सही जानकारी देना है, न कि गिरफ़्तारी मेमो से अलग कोई दूसरा दस्तावेज़ देना। इसी आधार पर कोर्ट ने गिरफ़्तारी और उसके बाद की रिमांड को कानूनी तौर पर सही ठहराया।
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हिंदू विवाह अधिनियम | धारा 13B में 'अलग रहना' का मतलब सिर्फ अलग घर में रहना नहीं, बल्कि पति-पत्नी के रिश्ते खत्म होना: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि Hindu Marriage Act, 1955 की धारा 13B के तहत “अलग रहना” (living separately) का अर्थ केवल शारीरिक दूरी नहीं, बल्कि वैवाहिक दायित्वों का पूर्ण रूप से समाप्त होना है।
कोर्ट ने उस मामले में आपसी सहमति से तलाक की याचिका खारिज करने के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पक्षकारों ने वैधानिक अवधि के भीतर वैवाहिक संबंध फिर से स्थापित कर लिए थे। जस्टिस नानी तागिया और जस्टिस आलोक कुमार पांडेय की खंडपीठ यह अपील सुन रही थी, जो 6 जून 2023 को शियोहर फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश के खिलाफ दायर की गई थी।
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बिना अवैध सरकारी लाभ से स्पष्ट संबंध के धन प्राप्ति को रिश्वत नहीं माना जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी लोकसेवक द्वारा धन प्राप्त करना मात्र, भले ही उसका संतोषजनक स्पष्टीकरण न दिया गया हो, तब तक रिश्वत नहीं माना जा सकता जब तक यह स्पष्ट रूप से सिद्ध न हो जाए कि वह राशि किसी अवैध सरकारी लाभ या पक्षपात के बदले दी गई थी।
जस्टिस संजीव नरूला ने यह टिप्पणी करते हुए केंद्रीय भंडारण निगम (CWC) के एक अधिकारी को सेवा से हटाने का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर भ्रष्टाचार का आरोप टिकाऊ नहीं है।
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योग्य और कमाने में सक्षम पत्नी केवल पति पर बोझ डालने के लिए काम न करे तो भरण-पोषण नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई शिक्षित और कमाने में सक्षम पत्नी केवल पति पर आर्थिक बोझ डालने के उद्देश्य से काम करने से परहेज करती है तो अदालतें हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार कर सकती हैं।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक महिला द्वारा दायर प्रथम अपील खारिज करते हुए की। महिला पेशे से स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं और उन्होंने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके अंतरिम भरण-पोषण का आवेदन अस्वीकार किया गया था।
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बधाई के नाम पर धन वसूली को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किन्नर समुदाय द्वारा शुभ अवसरों पर बधाई के नाम पर धन या उपहार लेने की प्रथा को कोई वैधानिक या कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है और अदालत इसे अधिकार के रूप में वैध नहीं ठहरा सकती।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने यह टिप्पणी याचिका खारिज करते हुए की, जिसमें किन्नर समुदाय की सदस्य रेखा देवी ने बधाई संग्रह के लिए क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र निर्धारित करने की मांग की थी।
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स्पेशल मैरिज एक्ट: तलाक याचिका के लिए विवाह पंजीकरण अनिवार्य नहीं — कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत विवाह का पंजीकरण (registration) कराना, तलाक याचिका दायर करने के लिए अनिवार्य नहीं है।
जस्टिस के. मनमधा राव की एकल पीठ ने यह फैसला उस याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें पत्नी ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसने पति की तलाक याचिका को केवल इस आधार पर खारिज करने से इनकार कर दिया था कि विवाह स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत पंजीकृत नहीं था।
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डिफॉल्ट आदेश रद्द कर पूर्ण न्याय सुनिश्चित कर सकता है DRAT, यह केवल निर्णय देने वाली संस्था नहीं: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि डेट रिकवरी अपीलीय ट्रिब्यूनल (DRAT) केवल एक निर्णय देने वाली संस्था नहीं है, बल्कि उसे पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए डिफॉल्ट आदेशों को रद्द करने का अधिकार प्राप्त है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऋण वसूली एवं दिवाला अधिनियम, 1993 की धारा 21 के तहत प्री-डिपॉजिट न करने के कारण अपील खारिज होना केवल प्रक्रियात्मक कार्रवाई है, इससे अपील का वैधानिक अधिकार समाप्त नहीं होता।
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लिखित पावर ऑफ अटॉर्नी को मौखिक रूप से रद्द या संशोधित नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि लिखित रूप में दी गई पावर ऑफ अटॉर्नी (PoA) को मौखिक बयान के आधार पर न तो रद्द किया जा सकता है और न ही उसमें कोई बदलाव किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे किसी भी परिवर्तन, संशोधन या निरस्तीकरण के लिए लिखित दस्तावेज आवश्यक है।
जस्टिस रेखा बोरणा ने अपने आदेश में कहा कि यदि कोई अनुबंध या दस्तावेज कानूनन लिखित रूप में आवश्यक है और उसे लिखित रूप में निष्पादित किया गया है तो उसके प्रावधानों को मौखिक रूप से बदला नहीं जा सकता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले एस. सक्तिवेल बनाम एम. वेणुगोपाल पिल्लई (2000) 7 SCC 104 का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में मौखिक साक्ष्य स्वीकार्य नहीं है।
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POSH Act | आंतरिक शिकायत समिति की रिपोर्ट और सिफारिशें अनिवार्य प्रकृति कीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम संबंधी पॉश कानून (POSH Act) के तहत आंतरिक शिकायत समिति (ICC) की रिपोर्ट और सिफारिशें बाध्यकारी हैं मात्र सलाहात्मक नहीं।
जस्टिस मनीष माथुर ने कहा कि यदि ICC अपनी जांच में किसी कर्मचारी को यौन उत्पीड़न का दोषी पाती है तो नियोक्ता या जिला अधिकारी के लिए उस आचरण को दुराचार मानते हुए अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करना अनिवार्य होगा।