स्पेशल मैरिज एक्ट: तलाक याचिका के लिए विवाह पंजीकरण अनिवार्य नहीं — कर्नाटक हाईकोर्ट

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    कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत विवाह का पंजीकरण (registration) कराना, तलाक याचिका दायर करने के लिए अनिवार्य नहीं है।

    जस्टिस के. मनमधा राव की एकल पीठ ने यह फैसला उस याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें पत्नी ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसने पति की तलाक याचिका को केवल इस आधार पर खारिज करने से इनकार कर दिया था कि विवाह स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत पंजीकृत नहीं था।

    अदालत ने अपने आदेश में कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जो यह कहता हो कि जब तक विवाह पंजीकृत न हो, तब तक धारा 27 के तहत तलाक याचिका दाखिल नहीं की जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 15 केवल विवाह के पंजीकरण की शर्तें बताती है, यह पंजीकरण को अनिवार्य नहीं बनाती।

    मामले के तथ्य अनुसार, पति-पत्नी दोनों 'मेडा' अनुसूचित जनजाति से हैं और उनका विवाह 2006 में पारंपरिक रीति-रिवाजों से हुआ था, जिसका पंजीकरण नहीं हुआ। दोनों के एक संतान भी है, लेकिन वर्ष 2009 से वे अलग रह रहे हैं। अनुसूचित जनजाति से होने के कारण उन पर हिंदू मैरिज एक्ट लागू नहीं होता।

    पति ने पहले हिंदू मैरिज एक्ट के तहत तलाक याचिका दायर की थी, जिसे अधिकार क्षेत्र के अभाव में खारिज कर दिया गया। इसके बाद उसने स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 27(b) के तहत क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की मांग की।

    पत्नी ने इस याचिका की वैधता को चुनौती देते हुए कहा कि बिना पंजीकरण के तलाक याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, लेकिन फैमिली कोर्ट ने इस आपत्ति को खारिज कर दिया। इसी आदेश को पत्नी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

    हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 15 के तहत विवाह का पंजीकरण केवल 'डायरेक्टरी' (अनुशंसात्मक) है, न कि 'मैंडेटरी' (अनिवार्य)। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि विवाह पंजीकृत होता है तो धारा 18 के तहत कुछ अतिरिक्त लाभ मिलते हैं, लेकिन पंजीकरण न होने से तलाक याचिका पर कोई रोक नहीं लगती।

    अदालत ने पत्नी द्वारा उद्धृत मामले Amitava Bhattacharya v. Aparna Bhattacharya को भी इस संदर्भ में अप्रासंगिक बताया, क्योंकि उस मामले में विवाह की वैधता का मुद्दा नाबालिगता के आधार पर तय किया गया था, न कि पंजीकरण की अनिवार्यता पर।

    अंततः हाईकोर्ट ने पत्नी की याचिका खारिज करते हुए कंकनपुरा फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और पति की तलाक याचिका को सुनवाई योग्य माना।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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