आरोप वाला गिरफ़्तारी मेमो अनुच्छेद 22(1) की गिरफ़्तारी के आधार बताने की शर्त को पूरा करता है: उत्तराखंड हाईकोर्ट
Shahadat
30 April 2026 5:46 PM IST

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ़्तार व्यक्ति को गिरफ़्तारी के आधार बताने की संवैधानिक शर्त तब पूरी मानी जाती है, जब गिरफ़्तारी मेमो, जिसमें गिरफ़्तारी का आधार बनाने वाले ज़रूरी तथ्यात्मक आरोप शामिल हों, आरोपी को दे दिया जाता है।
कोर्ट ने कहा कि इसका मकसद आरोपों के सार की सही जानकारी देना है, न कि गिरफ़्तारी मेमो से अलग कोई दूसरा दस्तावेज़ देना। इसी आधार पर कोर्ट ने गिरफ़्तारी और उसके बाद की रिमांड को कानूनी तौर पर सही ठहराया।
जस्टिस आशीष नैथानी ने 09.10.2024 के रिमांड आदेश को चुनौती देने वाली और यह घोषणा करने की मांग करने वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज की कि गिरफ़्तारी गैर-कानूनी है और संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 का उल्लंघन करती है।
यह पुनर्विचार याचिका CBI द्वारा भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत आपराधिक साज़िश और जालसाज़ी से जुड़े अपराधों के संबंध में दर्ज की गई FIR से जुड़ी थी। पुनर्विचार याचिकाकर्ता को जांच के दौरान गिरफ़्तार किया गया था और सक्षम मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
रिमांड को चुनौती देते हुए पुनर्विचार याचिकाकर्ता ने दलील दी कि गिरफ़्तारी गैर-कानूनी है, क्योंकि गिरफ़्तारी के समय उसे गिरफ़्तारी के आधार लिखित रूप में नहीं बताए गए, जिससे संवैधानिक सुरक्षा उपायों का उल्लंघन हुआ।
यह तर्क दिया गया कि गिरफ़्तारी के आधार बताना अनिवार्य संवैधानिक शर्त है और इसे लिखित रूप में दिया जाना चाहिए ताकि गिरफ़्तार व्यक्ति आरोपों का आधार समझ सके और अपना बचाव तैयार कर सके।
सुप्रीम कोर्ट के पंकज बंसल बनाम भारत संघ, प्रबीर पुरकायस्थ बनाम राज्य (NCT दिल्ली) और मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य जैसे फैसलों का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया कि लिखित आधार न देने से गिरफ़्तारी गैर-कानूनी हो जाती है और उसके बाद की रिमांड भी रद्द हो जाती है।
इसके विपरीत, CBI ने दलील दी कि पुनर्विचार याचिकाकर्ता को गिरफ़्तारी के समय आरोपों के बारे में विधिवत सूचित किया गया और उसे दिए गए गिरफ़्तारी मेमो में अपराध बनाने वाले ज़रूरी तथ्य शामिल थे।
आगे यह भी कहा गया कि संवैधानिक शर्त तब पूरी मानी जाती है, जब गिरफ़्तार व्यक्ति को गिरफ़्तारी के आधार के बारे में सही तरीके से जानकारी दी जाए। इसके लिए जानकारी देने का कोई तय प्रारूप निर्धारित नहीं है। कोर्ट ने अनुच्छेद 22(1) के दायरे की जांच की और पाया कि इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार के बारे में बताया जाए, ताकि वह कानूनी उपायों का इस्तेमाल कर सके।
पंकज बंसल मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि गिरफ्तारी के लिखित आधार बताना महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है। हालांकि, विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य मामले पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह शर्त तब पूरी मानी जाएगी, जब गिरफ्तारी के आधार बनाने वाले मूल तथ्यात्मक आरोप सार्थक तरीके से बताए जाएं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने "गिरफ्तारी के कारणों" और "गिरफ्तारी के आधारों" के बीच अंतर किया। साथ ही यह माना कि बाद वाले का मतलब उन आवश्यक तथ्यात्मक आरोपों से है, जो आरोप का आधार बनते हैं।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि इस मामले में गिरफ्तारी मेमो में आरोपों का सार शामिल था और गिरफ्तारी के समय ही इसे याचिकाकर्ता को दिया गया। ऐसी परिस्थितियों में, गिरफ्तारी के आधारों को बताने की शर्त का काफी हद तक पालन किया गया।
कोर्ट ने फैसला सुनाया,
"एक बार जब गिरफ्तार व्यक्ति को एक लिखित दस्तावेज़ दे दिया जाता है, जिसमें गिरफ्तारी का आधार बनाने वाले आवश्यक तथ्यात्मक आरोप शामिल हों तो गिरफ्तारी के आधारों को लिखित रूप में बताने की शर्त पूरी मानी जाती है। संवैधानिक आदेश के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि गिरफ्तारी के आधारों को अनिवार्य रूप से गिरफ्तारी मेमो से अलग किसी दूसरे दस्तावेज़ में ही दर्ज किया जाए।
अनुच्छेद 22(1) का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गिरफ्तार व्यक्ति को उन आरोपों के बारे में पता चले, जो उसकी गिरफ्तारी का आधार हैं। यदि ऐसी जानकारी गिरफ्तारी मेमो या आरोपी को दिए गए किसी अन्य समकालीन दस्तावेज़ के माध्यम से दी जाती है तो यह नहीं कहा जा सकता कि गिरफ्तारी के आधारों को बताने की शर्त का उल्लंघन हुआ है।"
परिणामस्वरूप, संवैधानिक सुरक्षा उपायों का कोई उल्लंघन न पाते हुए हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी वैध थी और रिमांड आदेश में कोई गैर-कानूनी बात नहीं थी।
तदनुसार, आपराधिक पुनर्विचारक्षण याचिका खारिज की गई।
Case Name: Ravi Kant v Central Bureau of Investigation

