डिफॉल्ट आदेश रद्द कर पूर्ण न्याय सुनिश्चित कर सकता है DRAT, यह केवल निर्णय देने वाली संस्था नहीं: पटना हाईकोर्ट

Amir Ahmad

27 April 2026 1:55 PM IST

  • डिफॉल्ट आदेश रद्द कर पूर्ण न्याय सुनिश्चित कर सकता है DRAT, यह केवल निर्णय देने वाली संस्था नहीं: पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि डेट रिकवरी अपीलीय ट्रिब्यूनल (DRAT) केवल एक निर्णय देने वाली संस्था नहीं है, बल्कि उसे पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए डिफॉल्ट आदेशों को रद्द करने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऋण वसूली एवं दिवाला अधिनियम, 1993 की धारा 21 के तहत प्री-डिपॉजिट न करने के कारण अपील खारिज होना केवल प्रक्रियात्मक कार्रवाई है, इससे अपील का वैधानिक अधिकार समाप्त नहीं होता।

    जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस सुनील दत्ता मिश्रा की खंडपीठ लेटर्स पेटेंट अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 4 सितंबर 2024 के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके जरिए सिंगल बेंच ने DRAT द्वारा आठ वर्ष बाद अपील बहाल करने का आदेश रद्द कर दिया था।

    मामला

    विवाद की शुरुआत तब हुई, जब प्रतिवादी बैंक ने अपीलकर्ताओं के ऋण खाते को गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित किए जाने के बाद वसूली कार्यवाही शुरू की। डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT), पटना ने बैंक के दावे को स्वीकार करते हुए रिकवरी सर्टिफिकेट जारी किया।

    इसके खिलाफ अपीलकर्ताओं ने DRAT में अपील दायर की, लेकिन वर्ष 2015 में धारा 21 के तहत अनिवार्य प्री-डिपॉजिट जमा नहीं करने के कारण अपील खारिज की गई।

    बाद में वर्ष 2023 में अपीलकर्ताओं ने डिक्री राशि का 50 प्रतिशत से अधिक जमा कर अपील बहाल करने की मांग की, जिसे DRAT ने स्वीकार किया। हालांकि, सिंगल बेंच ने यह कहते हुए आदेश रद्द किया कि इतने लंबे समय बाद ट्रिब्यूनल को अपना आदेश वापस लेने का अधिकार नहीं है।

    हाईकोर्ट की टिप्पणी

    खंडपीठ ने कहा कि अधिनियम की धारा 22(2) ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल को सिविल कोर्ट जैसी व्यापक शक्तियां प्रदान करती है, जिनमें अपने आदेशों की समीक्षा और डिफॉल्ट में पारित आदेशों को निरस्त करने का अधिकार भी शामिल है।

    अदालत ने कहा,

    “ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल मात्र सीमित अधिकार क्षेत्र वाली संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि उन्हें सिविल कोर्ट के समान व्यापक अधिकार दिए गए हैं ताकि प्रक्रियात्मक त्रुटियों के कारण किसी पक्ष को अपूरणीय क्षति न हो और मामलों का निपटारा यथासंभव गुण-दोष के आधार पर हो।”

    प्री-डिपॉजिट न करना केवल प्रक्रियात्मक कमी

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्री-डिपॉजिट न करने पर अपील खारिज होना मेरिट्स पर निर्णय नहीं है, बल्कि केवल प्रक्रियात्मक परिणाम है। इसलिए ऐसी खारिजी अंतिम नहीं मानी जा सकती और ट्रिब्यूनल उसे वापस लेने का अधिकार रखता है।

    अदालत ने कहा कि धारा 21 में यह अवश्य कहा गया कि प्री-डिपॉजिट के बिना अपील स्वीकार नहीं की जाएगी, लेकिन उसमें कोई समयसीमा निर्धारित नहीं है और न ही यह कहा गया कि एक बार खारिज होने पर अपील हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी।

    सिंगल बेंच का आदेश रद्द

    पटना हाईकोर्ट ने सिंगल बेंच का फैसला निरस्त करते हुए DRAT का आदेश बहाल किया, जिसके तहत अपील पुनर्स्थापित की गई थी।

    अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य तकनीकी आधार पर मामलों को समाप्त करना नहीं, बल्कि वास्तविक विवाद का न्यायपूर्ण समाधान करना है।

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