ट्रेड यूनियन 'राज्य' नहीं, प्रस्तावित हड़ताल रोकने के लिए नियोक्ता सीधे हाईकोर्ट नहीं जा सकता : कर्नाटक हाईकोर्ट
Amir Ahmad
3 Aug 2026 5:51 PM IST

कर्नाटक हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी प्रस्तावित हड़ताल को रोकने के लिए नियोक्ता द्वारा ट्रेड यूनियन के खिलाफ सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर करना सामान्यतः स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ट्रेड यूनियन संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' की श्रेणी में नहीं आती और न ही वह कोई सार्वजनिक कर्तव्य निभाने वाली संस्था है।
जस्टिस अनंत रामनाथ हेगड़े की एकलपीठ ने बॉश ऑटोमोटिव इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की याचिका खारिज करते हुए कहा कि यदि सुलह कार्यवाही के दौरान हड़ताल पर वैधानिक रोक का उल्लंघन होने का आरोप है, तो नियोक्ता को राहत के लिए औद्योगिक न्यायाधिकरण का रुख करना चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"ट्रेड यूनियन न तो 'राज्य' है, न राज्य का कोई अंग या एजेंसी, न ही कोई वैधानिक प्राधिकरण अथवा सरकार से पर्याप्त वित्तीय सहायता प्राप्त संस्था। केवल इस आधार पर कि वह औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के प्रावधानों का पालन करने के लिए बाध्य है, उसे सार्वजनिक कर्तव्य निभाने वाली संस्था नहीं माना जा सकता।"
अदालत ने कहा कि औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत नियोक्ता, ट्रेड यूनियन और कर्मचारी सभी कानून के प्रावधानों से बंधे हैं, लेकिन केवल इतना पर्याप्त नहीं है कि उनके खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर की जा सके।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एस. शोभा बनाम मुथूट फाइनेंस लिमिटेड (2025) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी संस्था के खिलाफ रिट तभी जारी की जा सकती है, जब वह सार्वजनिक कर्तव्य या सार्वजनिक कार्य का निर्वहन कर रही हो। ट्रेड यूनियन इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती।
कोर्ट ने कहा,
"सुलह कार्यवाही लंबित रहने के दौरान प्रस्तावित हड़ताल रोकने के लिए ट्रेड यूनियन के खिलाफ रिट याचिका सामान्य नियम के रूप में सुनवाई योग्य नहीं है। केवल असाधारण परिस्थितियों में ही ऐसा उपाय उपलब्ध हो सकता है।"
मामला बॉश ऑटोमोटिव इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। कंपनी ने कर्मचारी यूनियन द्वारा 23 फरवरी को जारी हड़ताल नोटिस को चुनौती दी थी, जिसमें 9 मार्च से हड़ताल शुरू करने की घोषणा की गई।
विवाद कर्मचारी यूनियन द्वारा प्रस्तुत मांगपत्र से उत्पन्न हुआ। 3 मार्च से सुलह कार्यवाही शुरू हो गई और उसके लंबित रहते हुए यूनियन ने 9 मार्च से हड़ताल की घोषणा की।
कंपनी का तर्क था कि औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की धारा 62(1)(घ) के अनुसार सुलह कार्यवाही लंबित रहने के दौरान तथा उसके समाप्त होने के सात दिन तक हड़ताल प्रतिबंधित है। इसलिए प्रस्तावित हड़ताल धारा 63 के तहत अवैध थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि संहिता की धारा 44(7)(ग) स्पष्ट रूप से यह अधिकार औद्योगिक न्यायाधिकरण को देती है कि वह यह तय करे कि कोई हड़ताल या तालाबंदी वैध है या अवैध।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यद्यपि औद्योगिक विवाद से संबंधित मुख्य मामला सुलह कार्यवाही पूरी होने तक न्यायाधिकरण के समक्ष नहीं लाया जा सकता, लेकिन यदि शिकायत केवल धारा 62 या 63 के उल्लंघन जैसी वैधानिक रोक से संबंधित हो, तो प्रभावित पक्ष सीमित राहत के लिए औद्योगिक न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटा सकता है।
कोर्ट ने कहा,
"यदि यह माना जाए कि धारा 62 और 63 के तहत उपलब्ध वैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए भी प्रभावित पक्ष न्यायाधिकरण के पास नहीं जा सकता, तो इन प्रावधानों का उद्देश्य और प्रभाव दोनों समाप्त हो जाएंगे।"
अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में औद्योगिक न्यायाधिकरण केवल यह जांच करेगा कि सुलह कार्यवाही लंबित रहने के दौरान हड़ताल पर लगी वैधानिक रोक का उल्लंघन हुआ है या नहीं। वह प्रस्तावित हड़ताल की वैधता के व्यापक प्रश्न या मूल औद्योगिक विवाद के गुण-दोष पर फैसला नहीं करेगा।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत केवल 14 दिन बीत जाने से सुलह कार्यवाही स्वतः समाप्त नहीं मानी जाएगी। सुलह अधिकारी द्वारा संहिता की धारा 60 के अनुसार विफलता दर्ज किए जाने पर ही सुलह कार्यवाही समाप्त मानी जाएगी।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने कंपनी की याचिका खारिज की। हालांकि, अदालत ने कंपनी को यह स्वतंत्रता दी कि यदि सुलह कार्यवाही अभी भी लंबित है और हड़ताल पर वैधानिक रोक लागू है, तो वह धारा 62(1)(घ) के कथित उल्लंघन के संबंध में उचित राहत के लिए औद्योगिक न्यायाधिकरण का रुख कर सकती है।


