'महंत मंदिर की ज़मीन को अपने निजी नाम पर घोषित करने की मांग नहीं कर सकते': मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Shahadat
7 Aug 2026 10:20 AM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जनराई तोरिया मंदिर के महंत की उस अपील को खारिज करने वाला ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा, जिसमें उन्होंने मंदिर की ज़मीन पर मालिकाना हक अपने निजी नाम पर घोषित करने की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि महंत मंदिर की ज़मीन को अपने निजी नाम पर घोषित करने की मांग नहीं कर सकते। [2026 LiveLaw (MP) 316]
यह कहते हुए कि ट्रायल कोर्ट ने महंत के मुकदमे को सही ढंग से खारिज किया, जस्टिस विवेक जैन की बेंच ने कहा:
"इस मामले में महंत के निजी नाम पर संपत्ति के मालिकाना हक की घोषणा की मांग की गई, जिसे ट्रायल कोर्ट द्वारा मंजूर नहीं किया जा सकता और ट्रायल कोर्ट ने इसे सही ढंग से खारिज किया।"
महंत धर्म दास के एक शिष्य ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देते हुए अपील दायर की थी, जिसमें उनका मुकदमा खारिज कर दिया गया। अपीलकर्ता का तर्क था कि जनराई तोरिया मंदिर छतरपुर में स्थित है, जहाँ उत्तराधिकार का तरीका गुरु-शिष्य परंपरा है।
अपीलकर्ता ने अपनी याचिका में तर्क दिया कि वह मंदिर का महंत है और 67 एकड़ संपत्ति के मालिक के तौर पर घोषणा चाहता है।
राज्य ने अपनी लिखित दलील में तर्क दिया कि संपत्ति खुद अर्जित की गई संपत्ति नहीं है, बल्कि सार्वजनिक मंदिर से जुड़ी ज़मीन है। राज्य ने तर्क दिया कि महंत को मासिक भत्ता दिया जाता था। आगे यह भी तर्क दिया गया कि महंत होने के नाते, वह मंदिर के कामकाज का प्रबंधन कर सकते हैं, लेकिन ज़मीन पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकते।
ट्रायल कोर्ट ने मुद्दों को तय करने के बाद माना कि अपीलकर्ता न तो मालिक है और न ही राहत का दावा करने का हकदार है, क्योंकि वह केवल सार्वजनिक मंदिर का पुजारी है। मुकदमे के लंबित रहने के दौरान राज्य द्वारा कुछ ज़मीन की नीलामी के सवाल पर ट्रायल कोर्ट ने माना कि उक्त नीलामी गैर-कानूनी नहीं थी क्योंकि यह एक साल के लिए खेती के अधिकारों के लिए की गई।
अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने मंदिर के महंत के अधिकार को न पहचानकर गलती की, जो 'सिर्फ पुजारी' के अधिकारों और 'शेबैत' के अधिकारों से कहीं ऊंचे स्तर का होता है।
बता दें, एक शेबैत देवता की सेवा और देखभाल करता है और डेबुत्तर संपत्ति (देवता के नाम पर निहित संपत्ति) के प्रबंधक के तौर पर काम करता है। अपीलकर्ता का तर्क था कि महंत को मंदिर की संपत्ति के पूरे मैनेजमेंट की ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है और उसकी तुलना सिर्फ़ एक पुजारी से नहीं की जा सकती; वह पुजारी से अलग होता है और उसके पास ज़्यादा कानूनी अधिकार होते हैं।
अपीलकर्ता ने आगे तर्क दिया कि मंदिर की स्थापना 1603 में हुई और पहले महंत हरदेव जी के समय से ही महंतों की परंपरा चली आ रही है। यह तर्क दिया गया कि ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव (डाइवर्जन) के लिए तत्कालीन महंत के नाम पर एक रसीद जारी की गई, लेकिन 1965 में उनकी हत्या कर दी गई।
यह दावा किया गया कि मंदिर और मठ के मैनेजमेंट को लेकर विवाद शुरू हो गया। यह तर्क दिया गया कि डाइवर्जन के लिए शुल्क जमा करने का नोटिस जारी किया गया और कमर्शियल मकसद से ज़मीन के डाइवर्जन के लिए महंत के नाम पर नोटिस जारी किया गया, जिसे बाद में जमा कर दिया गया।
यह तर्क दिया गया कि 1974 तक रेवेन्यू रिकॉर्ड में महंत का नाम दर्ज था, और केवल 1974-75 में, बिना किसी उचित कारण के, रेवेन्यू रिकॉर्ड में मंदिर के मैनेजर के तौर पर कलेक्टर का नाम दर्ज कर दिया गया।
राज्य के वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने साफ़ तौर पर दर्ज किया कि संपत्ति महंत की अपनी कमाई (सेल्फ़-एक्वायर्ड) से खरीदी गई संपत्ति नहीं थी। यह तर्क दिया गया कि पुजारी मंदिर की संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता।
इन दलीलों को खारिज करते हुए बेंच ने कहा कि मुकदमे में मांगी गई राहतें मूल रूप से गलतफहमी पर आधारित थीं। बेंच ने गौर किया कि अपीलकर्ता ने इस बात की घोषणा नहीं मांगी कि वह मंदिर का महंत है या उसे मंदिर या उसकी संपत्ति का मैनेजमेंट करने का अधिकार है, बल्कि इसके बजाय उसने 67 एकड़ ज़मीन को अपने निजी नाम पर करने की घोषणा मांगी थी।
कोर्ट ने कहा कि अगर अपील करने वाले ने मंदिर के हित में मंदिर का प्रशासन चलाने और उसकी संपत्ति का प्रबंधन करने के अधिकारों के साथ 'महंत' के तौर पर मान्यता मांगी होती तो मामला अलग होता। लेकिन, यह मुकदमा मंदिर की ज़मीन का मालिकाना हक अपने निजी नाम पर पाने के लिए दायर किया गया था। बेंच ने माना कि ऐसी राहत कानूनी रूप से नहीं दी जा सकती।
इसके अलावा, कोर्ट ने गौर किया कि ऐसी कोई दलील नहीं दी गई कि किसी पिछले महंत ने वह संपत्ति अपनी निजी हैसियत से या निजी इस्तेमाल के लिए हासिल की थी। इसके विपरीत, अपील करने वाले का अपना ही कहना था कि ज़मीन मंदिर से जुड़ी हुई थी। कोर्ट ने पाया कि दलीलें मांगी गई राहत से मेल नहीं खाती थीं; ऐसी राहत देने से महंत मंदिर की संपत्ति को अपनी संपत्ति समझकर बेच या हस्तांतरित कर सकता था।
एम. सिद्दीक (राम जन्मभूमि मंदिर बनाम सुरेश दास, (2020) 1 SCC 1) मामले का हवाला देते हुए बेंच ने फिर से कहा कि ट्रस्ट की संपत्ति की सुरक्षा बहुत ज़रूरी है और 'शेबैत' (मंदिर का प्रबंधक) संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता।
याचिकाकर्ता की इस दलील को खारिज करते हुए कि राज्य ने मंदिर की ज़मीन के कुछ हिस्से की नीलामी की थी, कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सही ढंग से नोट किया कि नीलामी केवल एक साल के लिए ज़मीन पर खेती करने के अधिकार के लिए की गई। बेंच ने स्पष्ट किया कि खेती के अधिकारों के अलावा और कुछ नहीं किया गया।
इस प्रकार, अपील खारिज कर दी गई।
Case Title: Mahant Bhagwandas Sadik Shishya v State of MP, FIRST APPEAL No. 249 of 1998


