सेवा के दौरान दिव्यांग होने वाले कर्मचारियों को ही मिल सकता है अतिरिक्त पद का लाभ, आरक्षण से नियुक्त कर्मियों को नहीं: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
3 Aug 2026 5:15 PM IST

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 20(4) के तहत अतिरिक्त पद (सुपरन्यूमेरेरी पद) पर समायोजन का लाभ केवल उन कर्मचारियों को मिल सकता है, जो सेवा के दौरान दिव्यांग हुए हों। यह प्रावधान उन कर्मचारियों पर लागू नहीं होता, जिन्हें पहले से दिव्यांग होने के कारण आरक्षित श्रेणी में सरकारी नौकरी मिली है।
जस्टिस अजय मोहन गोयल ने कहा,
"धारा 20(4) का सीधा अर्थ है कि यह प्रावधान तभी लागू होता है, जब कोई कर्मचारी सेवा के दौरान दिव्यांग हो जाए। वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता को दिव्यांग व्यक्ति होने के आधार पर ही सरकारी सेवा मिली थी, इसलिए इस धारा का लाभ उसे नहीं दिया जा सकता।"
मामले में याचिकाकर्ता 100 प्रतिशत दृष्टिबाधित हैं और जिला निरीक्षक/जिला लेखा परीक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। उसने हाईकोर्ट से अनुरोध किया था कि उन्हें रामपुर में अतिरिक्त पद सृजित कर वहीं समायोजित करने का निर्देश राज्य सरकार को दिया जाए।
याचिकाकर्ता ने कहा कि वह और उनकी पत्नी दोनों दृष्टिबाधित हैं तथा उनका दो वर्ष का बच्चा है। शिमला का दुर्गम भौगोलिक क्षेत्र उनके परिवार के लिए कठिनाइयां पैदा करता है। उन्होंने विभाग के एक आंतरिक पत्र का भी हवाला दिया, जिसमें रामपुर में उन्हें बनाए रखने के लिए अतिरिक्त पद सृजित करने की सिफारिश की गई।
राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति दिव्यांगजन के लिए आरक्षित पद पर हुई थी और बाद में उन्हें पदोन्नति मिली। रामपुर में जिला निरीक्षक/जिला लेखा परीक्षा अधिकारी का कोई स्वीकृत पद नहीं है, इसलिए वहां उनकी तैनाती संभव नहीं है। हालांकि सरकार ने कहा कि जहां इस पद का स्वीकृत रिक्त पद उपलब्ध होगा, वहां उनकी नियुक्ति पर विचार किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम की धारा 20, विशेष रूप से उपधारा (4) का विस्तृत परीक्षण करते हुए कहा कि यह प्रावधान उन कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए बनाया गया, जो नौकरी के दौरान दिव्यांग हो जाते हैं। ऐसे कर्मचारियों को पदावनत नहीं किया जा सकता और आवश्यकता होने पर उन्हें किसी अन्य पद या अतिरिक्त पद पर समायोजित किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की यह दलील कानून की गलत व्याख्या पर आधारित है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि विभागीय अधिकारियों ने भी संबंधित प्रावधान को सही ढंग से नहीं समझा।
तबादले के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि रामपुर में जिला निरीक्षक/जिला लेखा परीक्षा अधिकारी का कोई स्वीकृत पद ही नहीं है। ऐसे में अदालत सरकार को नया पद सृजित करने या किसी गैर-मौजूद स्वीकृत पद पर किसी कर्मचारी की तैनाती का निर्देश नहीं दे सकती।
इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज किया।


