ट्रायल शुरू होने के बाद कोर्ट की अनुमति के बिना पुलिस आगे की जांच नहीं कर सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Praveen Mishra

7 Aug 2026 2:09 PM IST

  • ट्रायल शुरू होने के बाद कोर्ट की अनुमति के बिना पुलिस आगे की जांच नहीं कर सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि ट्रायल शुरू होने के बाद कोई भी पुलिस अधिकारी, चाहे उसका पद कितना भी ऊंचा क्यों न हो, अदालत की अनुमति के बिना किसी आपराधिक मामले में आगे की जांच (Further Investigation) का आदेश नहीं दे सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह सिद्धांत पहले धारा 173(8) CrPC के तहत स्थापित था और अब धारा 193(9) BNSS में इसे स्पष्ट रूप से शामिल कर दिया गया है।

    जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कानपुर नगर के जॉइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस द्वारा लंबित हत्या के मुकदमे में आगे की जांच के आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर (Without Jurisdiction) बताते हुए रद्द कर दिया।

    राज्य सरकार ने दलील दी कि जांच अधिकारी ने ट्रायल कोर्ट से अनुमति मांगी थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण कर पाया कि संबंधित आवेदन में अदालत से आगे की जांच की अनुमति नहीं मांगी गई थी, बल्कि केवल यह बताया गया था कि जॉइंट कमिश्नर पहले ही आगे की जांच का आदेश दे चुके हैं और उसके लिए केस डायरी उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया है।

    कोर्ट ने आवेदन की भाषा पर भी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह अनुमति मांगने वाला आवेदन नहीं, बल्कि अदालत को पहले से लिए गए पुलिस निर्णय की जानकारी देने वाला "अहंकारी" (Arrogantly Worded) आवेदन था। अदालत ने कहा कि यदि जॉइंट कमिश्नर को आगे की जांच आवश्यक लगती थी, तो उन्हें जांच अधिकारी के माध्यम से ट्रायल कोर्ट से विधिवत अनुमति मांगनी चाहिए थी।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Pramod Kumar v. State of Uttar Pradesh (2026) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी आगे की जांच का निर्देश नहीं दे सकते। अदालत ने जॉइंट कमिश्नर का आदेश रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि उसके आधार पर की गई कोई भी जांच "Non Est" (कानून की नजर में अस्तित्वहीन) मानी जाएगी। हालांकि, पुलिस को कानून के अनुसार ट्रायल कोर्ट से अनुमति लेकर दोबारा आगे की जांच के लिए आवेदन करने की स्वतंत्रता दी गई।

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    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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