हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Update: 2026-03-07 15:30 GMT

देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (02 मार्च, 2026 से 06 मार्च, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

BREAKING: पत्रकार रामचंदर छत्रपति हत्या मामले में डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम बरी

पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने वर्ष 2002 के चर्चित पत्रकार रामचंदर छत्रपति हत्या मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए गुरमीत राम रहीम सिंह को बरी कर दिया। हालांकि अदालत ने मामले में अन्य तीन दोषियों की सजा और दोषसिद्धि बरकरार रखी।

चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस विक्रम अग्रवाल की खंडपीठ ने दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने कुलदीप, निर्मल और कृष्ण लाल की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी। इससे पहले केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की विशेष अदालत ने इन सभी आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

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CCS पेंशन नियमों के तहत काम करने वाला कर्मचारी पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट के तहत ग्रेच्युटी का दावा नहीं कर सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने माना कि ग्रेच्युटी देने वाले कानूनी नियमों (जैसे CCS (पेंशन) नियम) के तहत काम करने वाला कर्मचारी पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 की धारा 2(e) के तहत “कर्मचारी” की परिभाषा से बाहर है, इसलिए वह 1972 एक्ट के तहत ग्रेच्युटी का दावा नहीं कर सकता। इसके अलावा यह भी माना गया कि इस्तीफा देने पर पिछली सर्विस खत्म हो जाएगी, इसलिए कर्मचारी पेंशन और ग्रेच्युटी का हकदार नहीं होगा।

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POCSO कानून में स्किन-टू-स्किन संपर्क जरूरी नहीं: उड़ीसा हाइकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- नाबालिग के स्तन को दबाना यौन हमला

उड़ीसा हाइकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि किसी नाबालिग लड़की के स्तन को दबाना या खींचना, भले ही वह सीधे स्किन-टू-स्किन संपर्क के बिना किया गया हो POCSO Act की धारा 7 के तहत 'यौन हमले' की श्रेणी में आता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में आरोपी की मंशा सबसे महत्वपूर्ण होती है न कि शरीर का सीधा स्पर्श।

यह मामला अगस्त 2021 का है जब एक नाबालिग लड़की बस से यात्रा कर रही थी। जब बस एक स्टॉपेज पर रुकी तो दोषी ने बस की खिड़की के बाहर से हाथ डालकर लड़की के साथ छेड़छाड़ की और उसके स्तन को दबाया। पीड़िता के शोर मचाने पर उसके पिता ने आरोपी का पीछा किया जिसके बाद आरोपी ने उनके साथ मारपीट भी की। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई, जिसके खिलाफ उसने हाइकोर्ट में अपील दायर की थी।

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माता-पिता के तलाक या पिता की दूसरी पत्नी की नियुक्ति से बेटे के करुणा के आधार पर नियुक्ति के अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

प्रतिवादी को करुणा के आधार पर नियुक्ति की राहत देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ इस आधार पर ऐसी नियुक्ति से इनकार करना कि उसके माता-पिता के तलाक के बाद प्रतिवादी मृतक कर्मचारी के साथ नहीं रह रहा था, इसलिए उस पर निर्भर नहीं था, साफ़ तौर पर गलत है।

एक्टिंग चीफ़ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बलजिंदर संधू की डिवीज़न बेंच ने राज्य की इस दलील को भी खारिज किया कि मृतक की दूसरी पत्नी को पहले ही नियुक्ति दी गई।

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ऑर्डर VI रूल 17 CPC प्रोविज़ो 2002 से पहले के केस पर लागू नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1997 के केस में बदलाव की इजाज़त दी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में साल 1997 में फाइल किए गए एक केस में बदलाव की अर्जी को इस आधार पर मंज़ूरी दी कि ऑर्डर VI के रूल 17 के प्रोविज़ो में बदलाव, जिसमें ट्रायल शुरू होने के बाद केस में बदलाव पर रोक बताई गई थी, 2002 में लागू किया गया, यानी केस फाइल होने के बाद।

जस्टिस मनीष कुमार निगम ने कहा, “यह केस साल 1997 का है, जो बदलाव से पहले का है। इसलिए स्टेट बैंक ऑफ़ हैदराबाद बनाम टाउन म्युनिसिपल काउंसिल के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखते हुए बदला हुआ प्रोविज़ो इस केस पर लागू नहीं होगा।”

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बिना प्रथम दृष्टया अपराध के किसी आरोपी की तलाश में जांच जारी नहीं रखी जा सकती : बॉम्बे हाइकोर्ट

बॉम्बे हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि प्रारंभिक जांच में किसी भी प्रकार का प्रथम दृष्टया अपराध सामने नहीं आता है तो केवल इस उम्मीद में कि आगे चलकर किसी आरोपी का पता लग सकता है। आपराधिक जांच को जारी नहीं रखा जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कानून की प्रक्रिया को केवल रोविंग और फिशिंग इंक्वायरी के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

यह टिप्पणी चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस गौतम ए. अंखड़ की खंडपीठ ने याचिका की सुनवाई के दौरान की। यह याचिका जीटीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड ने दायर की, जिसमें केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा दर्ज FIR रद्द करने की मांग की गई।

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S. 202 CrPC | मजिस्ट्रेट अपने इलाके के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाले आरोपी को समन जारी करने से पहले पूछताछ करने के लिए मजबूर: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फिर कहा कि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 202 के तहत मजिस्ट्रेट के लिए यह ज़रूरी है कि वह प्रोसेस जारी करने को टाल दे और यह पता लगाने के लिए कि आरोपी के खिलाफ समन जारी करने के लिए कार्रवाई करने का काफ़ी आधार है या नहीं, या तो पूछताछ करे या जांच का निर्देश दे।

जस्टिस आशीष नैथानी की बेंच का मानना ​​था कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत चेक बाउंस होने के मामलों में भी ऊपर बताया गया प्रोसीजरल सेफगार्ड ज़रूरी है। इसलिए मजिस्ट्रेट के इलाके के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाले आरोपी से जुड़े मामले में प्रोसेस जारी करने को टालना बुनियादी प्रोसीजरल गड़बड़ी है।

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'आरोपी दोषी को जांच रिपोर्ट न देना सज़ा का आदेश रद्द करता है': मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी कॉलेज के इंचार्ज प्रिंसिपल के सज़ा के आदेश को यह कहते हुए रद्द किया कि डिसिप्लिनरी अथॉरिटी कर्मचारी को जांच रिपोर्ट देने में नाकाम रही, जिससे सज़ा का आदेश रद्द हो गया।

जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की बेंच ने कहा; "क्योंकि जांच रिपोर्ट की कॉपी याचिकाकर्ता को नहीं दी गई और जांच ऑफिसर द्वारा दर्ज किए गए नतीजों पर जवाब दाखिल करने के लिए याचिकाकर्ता को सुनवाई का मौका नहीं दिया गया, इसलिए जांच ऑफिसर द्वारा दर्ज किए गए नतीजों के आधार पर सज़ा का आदेश पास किया गया। इसलिए इस कोर्ट की यह राय है कि याचिकाकर्ता को जांच रिपोर्ट न देना रेस्पोंडेंट/अथॉरिटी द्वारा दिए गए सज़ा के आदेश को रद्द करता है।"

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'नो वर्क नो पे' तब लागू नहीं होता, जब अधिकारी कर्मचारी को उसकी गलती के बिना काम से दूर रखते हैं: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी कर्मचारी को पहले गलत तरीके से प्रमोशन न मिलने के बाद रेट्रोस्पेक्टिव या डीम्ड प्रमोशन दिया जाता है तो एम्प्लॉयर “नो वर्क नो पे” के सिद्धांत का इस्तेमाल करके उसे होने वाले पैसे के फायदे देने से मना नहीं कर सकता।

कोर्ट ने एक सरकारी कर्मचारी की उस याचिका को मंज़ूरी दी, जिसमें उसने डिपार्टमेंट के आदेशों के उन क्लॉज़ को चुनौती दी थी, जिनमें उसे रेट्रोस्पेक्टिव प्रमोशन देने के बावजूद सैलरी का बकाया देने से मना कर दिया गया।

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'सिर्फ़ Whatsapp चैट के आधार पर तलाक़ का आदेश नहीं दिया जा सकता': बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि बिना सबूत के सिर्फ़ Whatsapp चैट के आधार पर तलाक़ का आदेश नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 13(1)(i-a) के तहत क्रूरता के आरोपों को कानूनी तौर पर मंज़ूर सबूतों से साबित किया जाना चाहिए। साथ ही विरोधी पक्ष को उस सामग्री का खंडन करने का मौका दिया जाना चाहिए, जिस पर भरोसा किया गया।

जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजुषा देशपांडे की एक डिवीजन बेंच पत्नी द्वारा दायर फैमिली कोर्ट अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें फैमिली कोर्ट द्वारा पास किए गए 27 मई 2025 के एकतरफ़ा फ़ैसले और आदेश को चुनौती दी गई। उस फ़ैसले से फैमिली कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13(1)(i-a) के तहत पति की तलाक़ की अर्ज़ी को मंज़ूरी दी थी।

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लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले दो वयस्क माता-पिता की धमकियों से सुरक्षा के हकदार, बड़े लोग पार्टनर चुनने के लिए आज़ाद: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले दो सहमति से रहने वाले वयस्क परिवार के सदस्यों की धमकियों और दखलंदाज़ी से पुलिस सुरक्षा के हकदार हैं। साथ ही दोहराया कि पार्टनर चुनने का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 से मिलता है।

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने एक कपल की उस याचिका को मंज़ूरी दी, जिसमें महिला के पिता से सुरक्षा की मांग की गई, जो कथित तौर पर उनके लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर उन्हें धमकी दे रहा था।

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मात्र पेशे से संबोधित करना SC/ST Act के तहत अपराध नहीं, अपमान की मंशा जरूरी: इलाहाबाद हाइकोर्ट

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को उसके पेशे के आधार पर पुकारना मात्र से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के तहत अपराध नहीं बनता, जब तक यह सिद्ध न हो कि ऐसे शब्द जानबूझकर उस समुदाय से संबंधित व्यक्ति को अपमानित करने की मंशा से कहे गए।

जस्टिस अनिल कुमार-एक्स की पीठ ने गौतम बुद्ध नगर में SC/ST Act के विशेष जज द्वारा अगस्त 2024 में पारित समन आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की।

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मजिस्ट्रेट का न्यायिक काम करना डीएम, एसपी और राजनीतिक मुखिया से ऊपर, उनके आदेशों की अनदेखी करना 'माफ़ करने लायक नहीं': इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि एक न्यायिक अधिकारी अपना न्यायिक काम करते हुए डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या डिस्ट्रिक्ट पुलिस चीफ और यहां तक ​​कि किसी राज्य के राजनीतिक मुखिया से भी ऊपर होता है, और उनके आदेश की अनदेखी करना 'माफ़ करने लायक नहीं' है। कोर्ट ने आगे कहा कि न्यायिक अधिकारी द्वारा दिए गए आदेशों की इस तरह अनदेखी न केवल कोर्ट की अवमानना ​​है, बल्कि कानून के अधिकार को सीधी चुनौती है।

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नई डीम्ड कन्वेयन्स याचिका मेरिट के आधार पर पहले खारिज होने के बाद सुनवाई योग्य नहीं, क्वासी-ज्यूडिशियल अथॉरिटीज़ रेस जुडिकाटा से बंधी हैं: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना कि एक बार जब एक क्वासी-ज्यूडिशियल अथॉरिटी ने डीम्ड कन्वेयन्स के लिए किसी एप्लीकेशन पर मेरिट के आधार पर फैसला कर लिया और नई एप्लीकेशन फाइल करने की छूट दिए बिना उसे खारिज किया तो वह बाद में उसी मुद्दे पर सिर्फ इसलिए अलग राय नहीं ले सकती, क्योंकि नई एप्लीकेशन बदले हुए रूप में पेश की गई।

कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने से फाइनलिटी के सिद्धांत को नुकसान होगा, क्योंकि हर असफल एप्लीकेंट बस मेज़रमेंट बदल सकता है या राहत को फिर से तय कर सकता है और अथॉरिटी को उसी मुद्दे पर फिर से फैसला करने के लिए मजबूर कर सकता है।

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