मात्र पेशे से संबोधित करना SC/ST Act के तहत अपराध नहीं, अपमान की मंशा जरूरी: इलाहाबाद हाइकोर्ट
Amir Ahmad
2 March 2026 12:36 PM IST

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को उसके पेशे के आधार पर पुकारना मात्र से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के तहत अपराध नहीं बनता, जब तक यह सिद्ध न हो कि ऐसे शब्द जानबूझकर उस समुदाय से संबंधित व्यक्ति को अपमानित करने की मंशा से कहे गए।
जस्टिस अनिल कुमार-एक्स की पीठ ने गौतम बुद्ध नगर में SC/ST Act के विशेष जज द्वारा अगस्त 2024 में पारित समन आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की।
अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323, 504 और 506 के साथ-साथ SC/ST Act की धारा 3(1)(द) और 3(1)(ध) के तहत तलब किया गया।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि वह अपीलकर्ता के कपड़े धोती थी। एक दिन जब उसने अपनी मजदूरी मांगी तो उसके साथ रास्ते में दुर्व्यवहार किया गया और कथित रूप से जातिसूचक शब्द कहे गए। हाइकोर्ट ने पाया कि विवाद मजदूरी मांगने के बाद उत्पन्न हुआ और शिकायत में केवल इतना उल्लेख है कि जातिसूचक शब्द और धोबिन कहा गया।
अदालत ने यह भी नोट किया कि दोनों पक्षों के बीच संविदात्मक संबंध है जिसमें शिकायतकर्ता कपड़े धोने का काम करती है। पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति को उसके पेशे से संबोधित करना अपने आप में अधिनियम के प्रावधानों को आकर्षित नहीं करेगा, जब तक यह स्थापित न हो कि शब्दों का प्रयोग विशेष रूप से अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित व्यक्ति को अपमानित करने की नीयत से किया गया।
पीठ ने अपीलकर्ता की इस दलील पर भी विचार किया कि ट्रायल कोर्ट ने पुलिस की अंतिम रिपोर्ट को स्पष्ट रूप से स्वीकार या अस्वीकार किए बिना ही प्रोटेस्ट प्रार्थनापत्र को परिवाद में बदल दिया जो अवैध है। हाइकोर्ट ने कहा कि आदेश में पुलिस रिपोर्ट से असहमति का स्पष्ट उल्लेख अनिवार्य नहीं है।
यदि ट्रायल कोर्ट प्रोटेस्ट प्रार्थनापत्र को परिवाद में परिवर्तित करता है तो इसका स्वाभाविक अर्थ है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 173(2) के तहत प्रस्तुत अंतिम रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया गया।इन टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए SC/ST Act की धारा 3(1)(द) और 3(1)(ध) से संबंधित समन आदेश और कार्यवाही को निरस्त किया। हालांकि, IPC की धारा 323, 504 और 506 के तहत शेष कार्यवाही कानून के अनुसार जारी रखने का निर्देश दिया।

