POCSO कानून में स्किन-टू-स्किन संपर्क जरूरी नहीं: उड़ीसा हाइकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- नाबालिग के स्तन को दबाना यौन हमला
Amir Ahmad
7 March 2026 2:03 PM IST

उड़ीसा हाइकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि किसी नाबालिग लड़की के स्तन को दबाना या खींचना, भले ही वह सीधे स्किन-टू-स्किन संपर्क के बिना किया गया हो POCSO Act की धारा 7 के तहत 'यौन हमले' की श्रेणी में आता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में आरोपी की मंशा सबसे महत्वपूर्ण होती है न कि शरीर का सीधा स्पर्श।
यह मामला अगस्त 2021 का है जब एक नाबालिग लड़की बस से यात्रा कर रही थी। जब बस एक स्टॉपेज पर रुकी तो दोषी ने बस की खिड़की के बाहर से हाथ डालकर लड़की के साथ छेड़छाड़ की और उसके स्तन को दबाया। पीड़िता के शोर मचाने पर उसके पिता ने आरोपी का पीछा किया जिसके बाद आरोपी ने उनके साथ मारपीट भी की। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई, जिसके खिलाफ उसने हाइकोर्ट में अपील दायर की थी।
डॉ. जस्टिस संजीव कुमार पाणिग्रही की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि धारा 7 के तहत 'यौन हमले' की परिभाषा में वे सभी कृत्य शामिल हैं, जो यौन मंशा के साथ किए जाते हैं।
जस्टिस पाणिग्रही ने स्पष्ट किया,
"यह तर्क कि 'स्किन-टू-स्किन' संपर्क के अभाव में यह कृत्य यौन हमला नहीं माना जाएगा, अब कानूनी रूप से मान्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही साफ किया कि POCSO Act की धारा 7 की संकीर्ण व्याख्या कानून के मूल उद्देश्य और भावना को ही विफल कर देगी।"
अदालत ने पीड़िता के मैट्रिक सर्टिफिकेट के आधार पर यह भी पुख्ता किया कि घटना के समय उसकी आयु 17 वर्ष 5 महीने थी जिससे वह कानूनन नाबालिग की श्रेणी में आती है।
अपीलकर्ता की इस दलील को खारिज करते हुए कि कपड़ों के ऊपर से किया गया स्पर्श यौन हमला नहीं है, हाइकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले (अटॉर्नी जनरल बनाम सतीश) का हवाला दिया।
उस फैसले में बॉम्बे हाइकोर्ट के विवादास्पद स्किन-टू-स्किन वाले फैसले को पलटते हुए कहा गया था
"अगर ऐसी संकीर्ण व्याख्या स्वीकार की जाती है तो दस्ताने पहनकर या कपड़ों के माध्यम से किसी बच्चे के यौन अंगों को छूना भी अपराध की श्रेणी से बाहर हो जाएगा, जो एक खतरनाक स्थिति होगी। POCSO Act की धारा 7 के तहत मुख्य तत्व यौन मंशा है न कि त्वचा का स्पर्श।"
हाइकोर्ट ने माना कि आरोपी का कृत्य न केवल POCSO Act के तहत यौन हमला है बल्कि यह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग करने का भी गंभीर अपराध है। अदालत ने कहा कि बस की खिड़की से हाथ डालकर किया गया यह कृत्य न केवल अभद्र था बल्कि एक युवती की शारीरिक अखंडता पर सीधा प्रहार था। परिणामस्वरूप हाइकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा बरकरार रखी और आरोपी की अपील खारिज की।

