उत्तराखंड हाईकोर्ट

बिना जांच बर्खास्तगी पर उत्तराखंड हाईकोर्ट सख्त, कहा- बड़ी सजा देने से पहले विभागीय जांच जरूरी
बिना जांच बर्खास्तगी पर उत्तराखंड हाईकोर्ट सख्त, कहा- बड़ी सजा देने से पहले विभागीय जांच जरूरी

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि किसी कर्मचारी पर बड़ी सजा थोपने के लिए विभागीय जांच को सामान्य रूप से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच से छूट देने की शक्ति केवल असाधारण परिस्थितियों में और ठोस कारणों के आधार पर ही प्रयोग की जा सकती है।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी पुलिस कांस्टेबल की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसे वर्ष 2020 में कथित दुर्व्यवहार के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। आरोप है कि लॉकडाउन के दौरान क्वारंटीन केंद्र में उसने एक महिला के...

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भर्ती परीक्षा में नकल के मामले में कथित आउटसाइड सॉल्वर को ज़मानत देने से किया इनकार
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भर्ती परीक्षा में नकल के मामले में कथित 'आउटसाइड सॉल्वर' को ज़मानत देने से किया इनकार

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आरोपी को ज़मानत देने से इनकार किया, जिस पर आरोप है कि उसने एक चल रही परीक्षा में नकल की साज़िश के तहत "आउटसाइड सॉल्वर" (बाहर से सवाल हल करने वाले) के तौर पर काम किया था। कोर्ट ने कहा कि डिजिटल सबूत, जिनसे पता चलता है कि परीक्षा के दौरान ही प्रश्न पत्रों को रियल-टाइम में भेजा और हल किया गया, अपने आप में एक मज़बूत प्रथम दृष्टया (prima facie) सबूत हैं।कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस तरह के अपराध सार्वजनिक भर्ती परीक्षाओं की शुचिता पर सीधा हमला करते हैं और चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता...

जाति प्रमाण पत्र रद्द करने से पहले कारण बताओ नोटिस देने की शर्त सिर्फ़ फ़ोन कॉल करने से पूरी नहीं होती: उत्तराखंड हाईकोर्ट
जाति प्रमाण पत्र रद्द करने से पहले 'कारण बताओ नोटिस' देने की शर्त सिर्फ़ फ़ोन कॉल करने से पूरी नहीं होती: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि किसी व्यक्ति को सिर्फ़ फ़ोन कॉल करना, जाति प्रमाण पत्र रद्द करने से पहले 'कारण बताओ नोटिस' जारी करने की शर्त को पूरा नहीं करता। कोर्ट ने कहा कि जाति प्रमाण पत्र रद्द करने से, जिससे नागरिक अधिकार मिलते हैं, प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का उचित और सही मौक़ा मिलना ज़रूरी है।जस्टिस पंकज पुरोहित रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में तहसीलदार द्वारा 09.07.2025 को जारी उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें याचिकाकर्ता का OBC जाति प्रमाण पत्र रद्द किया गया था।...

नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण टाल नहीं सकता पिता, मां की आय या कर्ज का बहाना स्वीकार नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट
नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण टाल नहीं सकता पिता, मां की आय या कर्ज का बहाना स्वीकार नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पिता अपने नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से यह कहकर बच नहीं सकता कि मां भी कमाती है या उस पर कर्ज और पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे के भरण-पोषण का दायित्व सर्वोच्च है और स्वेच्छा से लिए गए वित्तीय बोझ इस जिम्मेदारी को कम नहीं कर सकते।जस्टिस आशीष नैथानी ने रुड़की फैमिली कोर्ट केा आदेश बरकरार रखा, जिसमें पिता को नाबालिग बच्चे के लिए प्रति माह 8,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।मामला...

व्यभिचार साबित करने के लिए DNA टेस्ट का आदेश आम तौर पर नहीं दिया जा सकता, बच्चे की वैधता की धारणा ही मान्य होनी चाहिए: उत्तराखंड हाईकोर्ट
व्यभिचार साबित करने के लिए DNA टेस्ट का आदेश आम तौर पर नहीं दिया जा सकता, बच्चे की वैधता की धारणा ही मान्य होनी चाहिए: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि व्यभिचार के आरोपों को साबित करने के लिए किसी बच्चे के DNA टेस्ट का आदेश आम तौर पर नहीं दिया जा सकता, खासकर तब जब साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत बच्चे की वैधता की कानूनी धारणा को चुनौती देने के लिए कोई दलीलें या सबूत मौजूद न हों।कोर्ट ने टिप्पणी की कि बिना किसी ठोस आधार के ऐसे टेस्ट की अनुमति देना एक वैध विवाह से जन्मे बच्चे को प्राप्त कानूनी सुरक्षा को कमज़ोर करेगा और बच्चे की गरिमा और निजता में अनावश्यक दखल माना जाएगा। इसी आधार पर कोर्ट ने वैवाहिक...

नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण टाल नहीं सकता पिता, मां की आय या कर्ज का बहाना स्वीकार नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट
नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण टाल नहीं सकता पिता, मां की आय या कर्ज का बहाना स्वीकार नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पिता अपने नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से यह कहकर बच नहीं सकता कि मां भी कमाती है या उस पर कर्ज और पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे के भरण-पोषण का दायित्व सर्वोच्च है और स्वेच्छा से लिए गए वित्तीय बोझ इस जिम्मेदारी को कम नहीं कर सकते।जस्टिस आशीष नैथानी ने रुड़की फैमिली कोर्ट केा आदेश बरकरार रखा, जिसमें पिता को नाबालिग बच्चे के लिए प्रति माह 8,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।मामला...

परिवार पेंशनभोगी को आश्रित बताकर मेडिकल प्रतिपूर्ति से वंचित नहीं किया जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
परिवार पेंशनभोगी को 'आश्रित' बताकर मेडिकल प्रतिपूर्ति से वंचित नहीं किया जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि परिवार पेंशन पाने वाले व्यक्ति को आश्रित मानकर मेडिकल प्रतिपूर्ति (मेडिकल रिइम्बर्समेंट) से वंचित नहीं किया जा सकता, खासकर जब वह अपने स्वतंत्र अधिकार के रूप में इस लाभ का दावा कर रहा हो। कोर्ट ने कहा कि यदि राज्य सरकार ने किसी परिवार पेंशनभोगी को स्वास्थ्य योजना का लाभ दिया और उससे नियमित अंशदान भी लिया जा रहा है, तो बाद में आयु सीमा का हवाला देकर दावा खारिज करना अनुचित है।जस्टिस पंकज पुरोहित ने एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह...

प्रशासनिक चूक के कारण दावा खारिज नहीं किया जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट का मृतक कांस्टेबल की विधवा को ₹25 लाख का बीमा देने का निर्देश
प्रशासनिक चूक के कारण दावा खारिज नहीं किया जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट का मृतक कांस्टेबल की विधवा को ₹25 लाख का बीमा देने का निर्देश

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि कोई भी बैंक किसी मृतक पुलिस कांस्टेबल की विधवा को आकस्मिक मृत्यु बीमा योजना का लाभ देने से सिर्फ इस आधार पर इनकार नहीं कर सकता कि उसका नाम बीमित कर्मचारियों की सूची में शामिल नहीं था, जबकि यह चूक प्रशासनिक लापरवाही के कारण हुई हो।यह मामला उत्तराखंड पुलिस के कांस्टेबल की मृत्यु से जुड़ा है। कांस्टेबल की मृत्यु ड्यूटी के दौरान सड़क दुर्घटना में हुई थी। उस समय उसका वेतन खाता (Salary Account) संबंधित बैंक में था। यह देखते हुए कि अधिकारियों के बीच तालमेल की कमी...

कानूनी योजना के तहत पुनर्वास दंडात्मक नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रिस्पना नदी के किनारे बसी बस्ती के निवासियों को जारी बेदखली नोटिस को सही ठहराया
कानूनी योजना के तहत पुनर्वास दंडात्मक नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रिस्पना नदी के किनारे बसी बस्ती के निवासियों को जारी बेदखली नोटिस को सही ठहराया

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि देहरादून में रिस्पना नदी के किनारे बसी बस्ती के निवासियों को दूसरी जगह बसाने के लिए अधिकारियों द्वारा की गई कार्रवाई, जो 'उत्तराखंड शहरी स्थानीय निकाय और प्राधिकरण (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2018' के तहत की गई, उसे गैर-कानूनी या दंडात्मक नहीं कहा जा सकता।कोर्ट ने कहा कि जब निवासियों को एक कानूनी योजना के तहत किसी दूसरी जगह (वैकल्पिक आवास) पर बसाया जा रहा हो तो ऐसी कार्रवाई अधिनियम के उद्देश्य के अनुरूप ही मानी जाएगी। इसी आधार पर कोर्ट ने निवासियों को जारी किए...

धमकी का सामना कर रहे विवाहित जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित करे राज्य: उत्तराखंड हाईकोर्ट का निर्देश
धमकी का सामना कर रहे विवाहित जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित करे राज्य: उत्तराखंड हाईकोर्ट का निर्देश

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी विवाहित जोड़े को खतरे की आशंका हो तो राज्य की जिम्मेदारी है कि वह उनकी सुरक्षा और संरक्षण सुनिश्चित करे। अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया कि वह खतरे का आकलन कर आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराए।जस्टिस राकेश थपलियाल ने यह अंतरिम आदेश दंपत्ति की याचिका पर दिया जिसमें उन्होंने शांतिपूर्वक वैवाहिक जीवन जीने के लिए सुरक्षा की मांग की थी।याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का रुख करते हुए अपनी जान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए पुलिस सुरक्षा...

सहमति से बने किशोर संबंध को अपराध मानना अनुचित: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अपहरण केस पर लगाई रोक
सहमति से बने किशोर संबंध को अपराध मानना अनुचित: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अपहरण केस पर लगाई रोक

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश में 15 वर्षीय लड़के के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाई। इस लड़के पर अपनी ही उम्र की लड़की के अपहरण का आरोप लगाया गया था। अदालत ने माना कि मामला सहमति से बने किशोर संबंध का प्रतीत होता है।जस्टिस आलोक मेहरा ने यह आदेश देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले को ध्यान में रखना जरूरी है, जिसमें कहा गया कि सहमति से बने किशोर संबंधों को नजरअंदाज करने से अन्यायपूर्ण परिणाम सामने आ सकते हैं।मामले में लड़की के पिता ने FIR दर्ज कर...

ज़मीन वन भूमि नहीं पाई गई: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सैन्य धाम युद्ध स्मारक के निर्माण के खिलाफ PIL खारिज की
ज़मीन वन भूमि नहीं पाई गई: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 'सैन्य धाम' युद्ध स्मारक के निर्माण के खिलाफ PIL खारिज की

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने देहरादून में 'सैन्य धाम' नाम के युद्ध स्मारक के निर्माण को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) खारिज की। कोर्ट ने यह फैसला देते हुए कहा कि राजस्व और वन अधिकारियों द्वारा किए गए एक संयुक्त सर्वेक्षण में यह ज़मीन वन भूमि नहीं पाई गई। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब सक्षम अधिकारियों ने ज़मीन का निरीक्षण कर यह प्रमाणित कर दिया कि यह वन भूमि का हिस्सा नहीं है तो याचिका में उठाई गई चुनौती का मूल आधार ही खत्म हो जाता है, जिससे यह आधार कानूनी रूप से टिकने लायक नहीं रह जाता।जस्टिस मनोज...

सक्षम व्यक्ति बेरोज़गारी का बहाना बनाकर भरण-पोषण से बच नहीं सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
सक्षम व्यक्ति बेरोज़गारी का बहाना बनाकर भरण-पोषण से बच नहीं सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि बेरोज़गारी का महज़ बहाना किसी सक्षम और योग्य व्यक्ति को CrPC की धारा 125 के तहत अपने नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकता। कोर्ट ने इस सिद्धांत को दोहराया कि एक सक्षम व्यक्ति के बारे में यह माना जाता है कि उसमें कमाने की क्षमता है। साथ ही जानबूझकर की गई या बिना सबूत वाली बेरोज़गारी का इस्तेमाल कानूनी ज़िम्मेदारी से बचने के लिए नहीं किया जा सकता। इस सिद्धांत को लागू करते हुए कोर्ट ने दो नाबालिग बच्चों को दिए गए भरण-पोषण में दखल देने...

शादी के वादे का सिर्फ़ टूटना, अगर शुरू से कोई धोखा न हो तो रेप नहीं माना जाएगा: उत्तराखंड हाईकोर्ट
शादी के वादे का सिर्फ़ टूटना, अगर शुरू से कोई धोखा न हो तो रेप नहीं माना जाएगा: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि शादी के वादे का सिर्फ़ टूटना रेप नहीं माना जाएगा, जब तक कि पहली नज़र में यह साबित न हो जाए कि वह वादा शुरू से ही झूठा था और सिर्फ़ सहमति पाने के लिए किया गया। इसी सिद्धांत को लागू करते हुए कोर्ट ने IPC की धारा 376 के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने कहा कि आरोपों से ज़्यादा से ज़्यादा यही पता चलता है कि दो बालिग लोगों के बीच आपसी सहमति से बना रिश्ता टूट गया।जस्टिस आशीष नैथानी ने CrPC की धारा 482 के तहत दायर याचिका को मंज़ूरी दी। इस याचिका में...

पत्नी के चरित्र पर शक मात्र से आत्महत्या के लिए उकसाना साबित नहीं होता: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पति को बरी किया
पत्नी के चरित्र पर शक मात्र से आत्महत्या के लिए उकसाना साबित नहीं होता: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पति को बरी किया

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पत्नी के चरित्र पर शक करना या सामान्य वैवाहिक विवाद, बिना किसी ठोस उकसावे या सहायता के आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण नहीं माना जा सकता। अदालत ने इसी आधार पर पति को बरी किया।जस्टिस आशीष नैथानी ने सेशन कोर्ट, उधम सिंह नगर का फैसला रद्द किया, जिसमें पति को भारतीय दंड संहिता धारा 306 के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल की सजा सुनाई गई थी।मामला 15 सितंबर, 2004 का है, जब आरोपी की पत्नी ने अपने ससुराल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। अभियोजन का आरोप था...

हाईकोर्ट ने मोहम्मद दीपक के खिलाफ FIR रद्द करने से किया इनकार, सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से भी रोका
हाईकोर्ट ने 'मोहम्मद' दीपक के खिलाफ FIR रद्द करने से किया इनकार, सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से भी रोका

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 'मोहम्मद' दीपक कुमार और अन्य लोगों को 26 जनवरी की कोटद्वार घटना और उससे जुड़े मामलों के बारे में सोशल मीडिया पर कोई भी बयान देने या वीडियो पोस्ट करने से रोक दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने से मामले की चल रही जांच प्रभावित हो सकती है।बता दें, 26 जनवरी को दीपक का बजरंग दल के सदस्यों से आमना-सामना हुआ था। आरोप है कि ये सदस्य एक मुस्लिम दुकानदार द्वारा अपनी दुकान के नाम में 'बाबा' शब्द का इस्तेमाल करने पर आपत्ति जता रहे थे। इस घटना का एक वीडियो ऑनलाइन वायरल हो गया था।इस घटना के...

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जिम मालिक मोहम्मद दीपक के खिलाफ चल रही जांच की स्थिति और उसे मिले दान के ब्योरे मांगे
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जिम मालिक 'मोहम्मद दीपक' के खिलाफ चल रही जांच की स्थिति और उसे मिले 'दान' के ब्योरे मांगे

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह जनवरी 2026 में कोटद्वार में हुई घटना से जुड़ी कई FIRs की जांच के संबंध में एक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करे। इस घटना में दीपक कुमार उर्फ ​​'मोहम्मद दीपक' शामिल था।जस्टिस राकेश थपलियाल की बेंच ने याचिकाकर्ता (दीपक) को यह भी निर्देश दिया कि वह अब तक अपने बैंक खाते में जमा हुए 'दान' का स्पष्ट ब्योरा दे। यह निर्देश तब दिया गया, जब इस घटना का एक वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया।बता दें, यह मामला 26 जनवरी, 2026 को कोटद्वार (पौड़ी गढ़वाल) में हुई एक घटना...