पत्नी के चरित्र पर शक मात्र से आत्महत्या के लिए उकसाना साबित नहीं होता: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पति को बरी किया
Amir Ahmad
26 March 2026 5:03 PM IST

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पत्नी के चरित्र पर शक करना या सामान्य वैवाहिक विवाद, बिना किसी ठोस उकसावे या सहायता के आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण नहीं माना जा सकता। अदालत ने इसी आधार पर पति को बरी किया।
जस्टिस आशीष नैथानी ने सेशन कोर्ट, उधम सिंह नगर का फैसला रद्द किया, जिसमें पति को भारतीय दंड संहिता धारा 306 के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल की सजा सुनाई गई थी।
मामला 15 सितंबर, 2004 का है, जब आरोपी की पत्नी ने अपने ससुराल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। अभियोजन का आरोप था कि पति उसकी चरित्र पर शक करता था और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करता था, जिसके चलते उसने यह कदम उठाया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण साबित करने के लिए भारतीय दंड संहिता धारा 107 के तहत उकसावे, साजिश या जानबूझकर सहायता जैसे तत्वों का होना आवश्यक है।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए उकसाया या कोई ऐसा निकटवर्ती कृत्य किया हो, जो सीधे तौर पर घटना से जुड़ा हो।
पीठ ने टिप्पणी की,
“वैवाहिक जीवन में विवाद और शक जैसी स्थितियां दुर्भाग्यपूर्ण जरूर हैं लेकिन केवल इसी आधार पर किसी को आत्महत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।”
अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि मामले में कोई सुसाइड नोट या ऐसा प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है, जो आरोपी को आत्महत्या से सीधे जोड़ता हो। साथ ही आरोपी को पहले ही भारतीय दंड संहिता धारा 304-बी और भारतीय दंड संहिता धारा 498-ए के आरोपों से बरी किया जा चुका था, जिससे गंभीर क्रूरता के आरोप भी साबित नहीं हुए।
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने चरित्र पर शक को ही दुष्प्रेरण मान लिया, जो कानून की मंशा के विपरीत है।
इसी के साथ अदालत ने कहा कि दुष्प्रेरण के लिए 'मेंस रिया' (दोषपूर्ण मंशा) और स्पष्ट उकसावे का होना जरूरी है, जो इस मामले में पूरी तरह अनुपस्थित है।
अदालत ने पति की सजा रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया और आपराधिक अपील को मंजूर कर लिया।

