उत्तराखंड हाईकोर्ट
लाइसेंस नवीनीकरण में देरी पर सांप रखने वाले व्यक्ति को जमानत, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा- केवल तकनीकी चूक पर जेल उचित नहीं
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सांपों के कथित अवैध कब्जे के मामले में गिरफ्तार व्यक्ति को जमानत देते हुए कहा कि केवल लाइसेंस की अवधि समाप्त हो जाने और समय पर उसका नवीनीकरण न हो पाने के आधार पर किसी को लगातार जेल में रखना उचित नहीं माना जा सकता।जस्टिस आशीष नैथानी आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। आरोपी के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड से यह प्रतीत होता है कि आरोपी पहले वैध लाइसेंस के तहत कार्य कर रहा था और...
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नेशनल गेम्स कैंप के दौरान नाबालिग खिलाड़ी से रेप के आरोपी हॉकी कोच को ज़मानत दी
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक नेशनल हॉकी कोच को ज़मानत दी। इस कोच पर POCSO Act के तहत आरोप है कि उसने 2025 के नेशनल गेम्स के लिए चयन हेतु आयोजित हॉकी कैंप में शामिल एक नाबालिग खिलाड़ी के साथ रेप किया।जस्टिस आलोक मेहरा एक आरोपी द्वारा दायर ज़मानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस आरोपी को BNS की धारा 64(2)(f) (रेप), 127(2) (गलत तरीके से रोकना) और POCSO Act की धारा 5(N) (बच्चे के रिश्तेदार द्वारा, चाहे खून के रिश्ते, गोद लेने, शादी, अभिभावकत्व, या फोस्टर केयर के ज़रिए हो, या बच्चे के माता-पिता के साथ...
नाबालिग पीड़िता में अपने कार्यों के परिणामों को समझने की पर्याप्त परिपक्वता है: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने POCSO मामले में जमानत दी
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने POCSO Act के तहत दर्ज आरोपी को जमानत दी। कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि, हालांकि पीड़िता कानूनी तौर पर नाबालिग थी, लेकिन रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह संकेत मिलता है कि वह स्वेच्छा से आवेदक के साथ गई और उसमें अपने कार्यों की प्रकृति और परिणामों को समझने के लिए पर्याप्त "समझ, परिपक्वता और विवेक" मौजूद था।कोर्ट ने टिप्पणी की कि, हालांकि POCSO Act के प्रावधान प्रकृति में कठोर हैं, लेकिन यह कठोरता कोर्ट को जमानत देने के लिए अपने विवेकाधीन क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने से नहीं रोकती,...
कब्रिस्तान में दफन अधिकार को लेकर दो मुस्लिम समुदायों का विवाद जनहित याचिका के दायरे में नहीं आता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि कब्रिस्तान में दफन अधिकार को लेकर दो मुस्लिम समुदायों के बीच विवाद जनहित याचिका के दायरे में नहीं आता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे अधिकारों को उचित दीवानी कार्यवाही या कानूनन उपलब्ध अन्य माध्यमों से स्थापित किया जा सकता है।चीफ जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ देहरादून के भनियावाला गांव स्थित एक कब्रिस्तान से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रही थी।याचिका में मांग की गई कि बरेलवी समुदाय के लोगों को कब्रिस्तान में शव दफनाने और अंतिम धार्मिक रस्में...
केवल पुराने मुकदमों के आधार पर गैंगस्टर एक्ट में दोषी नहीं ठहराया जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल पुराने मुकदमों के पंजीकरण या आपराधिक इतिहास के आधार पर किसी व्यक्ति को उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एवं समाज विरोधी क्रियाकलाप निवारण अधिनियम, 1986 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि संगठित आपराधिक गतिविधियों का एक क्रम मौजूद था और आरोपी उसमें साझा उद्देश्य के तहत शामिल थे।जस्टिस आशीष नैथानी गैंगस्टर एक्ट के तहत दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील पर सुनवाई कर रहे थे। स्पेशल जज नैनीताल ने...
रामगंगा-सरयू संगम क्षेत्र में खनन पर सख्ती, हाईकोर्ट ने भारी मशीनों के इस्तेमाल पर तत्काल रोक लगाई
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रामगंगा-सरयू नदी संगम क्षेत्र में खनन कार्यों के दौरान भारी मशीनों के इस्तेमाल पर तत्काल रोक लगाने का निर्देश दिया।अदालत ने प्रशासन को सुनिश्चित करने को कहा कि संबंधित खनन क्षेत्रों में किसी भी पट्टाधारक द्वारा भारी मशीनों का उपयोग न किया जाए।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी और जस्टिस सिद्धार्थ साह की खंडपीठ पिथौरागढ़ निवासी द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी।याचिका में आरोप लगाया गया कि खनन पट्टाधारक नियमों के विपरीत पोकलेन और जेसीबी जैसी भारी मशीनों का उपयोग कर रहे...
आरोप वाला गिरफ़्तारी मेमो अनुच्छेद 22(1) की गिरफ़्तारी के आधार बताने की शर्त को पूरा करता है: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ़्तार व्यक्ति को गिरफ़्तारी के आधार बताने की संवैधानिक शर्त तब पूरी मानी जाती है, जब गिरफ़्तारी मेमो, जिसमें गिरफ़्तारी का आधार बनाने वाले ज़रूरी तथ्यात्मक आरोप शामिल हों, आरोपी को दे दिया जाता है। कोर्ट ने कहा कि इसका मकसद आरोपों के सार की सही जानकारी देना है, न कि गिरफ़्तारी मेमो से अलग कोई दूसरा दस्तावेज़ देना। इसी आधार पर कोर्ट ने गिरफ़्तारी और उसके बाद की रिमांड को कानूनी तौर पर सही ठहराया।जस्टिस आशीष नैथानी ने 09.10.2024 के...
पुराने नियमों की समय-सीमा से अपील का अधिकार खत्म नहीं किया जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बर्खास्त सिपाही को दी राहत
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि वर्ष 1991 के पुलिस नियमों में अपील दाखिल करने के लिए निर्धारित समय-सीमा का उपयोग उस स्थिति में नहीं किया जा सकता, जब वह उत्तराखंड पुलिस अधिनियम, 2007 के प्रावधानों से असंगत हो।अदालत ने स्पष्ट किया कि निरस्त कानून के तहत बनाए गए नियम, बाद में बने अधिनियम से टकराव होने पर प्रभावी नहीं रह सकते।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी बर्खास्त किए गए सिपाही की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसने सेवा से हटाए जाने और बाद में विलंब के आधार पर अपील खारिज किए जाने को...
NBFC द्वारा रिकवरी एजेंटों से जबरन वाहन कब्ज़े में लेना असंवैधानिक: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दिया लौटाने का आदेश
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (NBFC) यदि रिकवरी एजेंटों के माध्यम से बिना विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाए वित्तपोषित वाहनों का जबरन कब्ज़ा लेती हैं, तो यह अवैध होने के साथ-साथ संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन भी है।अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी कार्रवाई कानून के शासन के विपरीत है और इससे नागरिकों के आजीविका के अधिकार का हनन होता है।जस्टिस पंकज पुरोहित ने समान प्रकृति की दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। दोनों मामलों में परिवहन व्यवसाय से...
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बिना क्रॉस-अपील के मोटर दुर्घटना मुआवज़ा बढ़ाया, CPC के आदेश 41 नियम 33 का हवाला दिया
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए CPC के आदेश 41 नियम 33 का हवाला देकर मोटर दुर्घटना मुआवज़ा बढ़ाया जा सकता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अपीलीय अदालत ऐसी शक्ति का प्रयोग तब कर सकती है, जब अवार्ड को न्यायसंगत और पूर्ण बनाना आवश्यक हो।जस्टिस रविंद्र मैथानी ICICI लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी द्वारा दायर अपील की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (Motor Accident Claims Tribunal) द्वारा 16.12.2022 को पारित अवार्ड को चुनौती दी गई। इस अवार्ड के तहत,...
समझौते के बाद अतिरिक्त मांग नहीं कर सकते पक्षकार: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि जब पक्षकार आपसी सहमति से समझौता कर लेते हैं और उस पर अमल भी हो जाता है तो बाद में तय शर्तों से बाहर जाकर कोई अतिरिक्त दावा नहीं किया जा सकता।जस्टिस आलोक मेहरा आपराधिक मामले को निरस्त करने की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस मामले में दोनों पक्षकारों के बीच पहले ही समझौता हो चुका था, जिसे अदालत ने 20 जुलाई, 2024 को दर्ज किया था। समझौते के तहत याचिकाकर्ताओं को प्रतिवादी को 38,61,795 रुपये का भुगतान करना था जो बाद में पूरा कर दिया गया।अदालत के...
बिना जांच बर्खास्तगी पर उत्तराखंड हाईकोर्ट सख्त, कहा- बड़ी सजा देने से पहले विभागीय जांच जरूरी
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि किसी कर्मचारी पर बड़ी सजा थोपने के लिए विभागीय जांच को सामान्य रूप से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच से छूट देने की शक्ति केवल असाधारण परिस्थितियों में और ठोस कारणों के आधार पर ही प्रयोग की जा सकती है।जस्टिस मनोज कुमार तिवारी पुलिस कांस्टेबल की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसे वर्ष 2020 में कथित दुर्व्यवहार के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। आरोप है कि लॉकडाउन के दौरान क्वारंटीन केंद्र में उसने एक महिला के...
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भर्ती परीक्षा में नकल के मामले में कथित 'आउटसाइड सॉल्वर' को ज़मानत देने से किया इनकार
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आरोपी को ज़मानत देने से इनकार किया, जिस पर आरोप है कि उसने एक चल रही परीक्षा में नकल की साज़िश के तहत "आउटसाइड सॉल्वर" (बाहर से सवाल हल करने वाले) के तौर पर काम किया था। कोर्ट ने कहा कि डिजिटल सबूत, जिनसे पता चलता है कि परीक्षा के दौरान ही प्रश्न पत्रों को रियल-टाइम में भेजा और हल किया गया, अपने आप में एक मज़बूत प्रथम दृष्टया (prima facie) सबूत हैं।कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस तरह के अपराध सार्वजनिक भर्ती परीक्षाओं की शुचिता पर सीधा हमला करते हैं और चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता...
पीड़िता का शोर न मचाना सहमति का संकेत नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने POCSO के तहत सज़ा रखी बरकरार
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि किसी नाबालिग पीड़िता का आचरण, जैसे कि शोर न मचाना या भागने की कोशिश न करना, उसे सहमति या अपनी मर्ज़ी का संकेत नहीं माना जा सकता।कोर्ट ने आगे दोहराया कि एक बार जब पीड़िता का नाबालिग होना साबित हो जाता है तो POCSO Act के तहत सहमति कानूनी रूप से बेमानी हो जाती है। साथ ही पीड़िता की गवाही में छोटी-मोटी विसंगतियां अभियोजन पक्ष के अन्यथा विश्वसनीय मामले को कमज़ोर नहीं करतीं।इसी आधार पर कोर्ट ने POCSO Act और IPC के तहत अपराधों के लिए अपीलकर्ता की सज़ा बरकरार...
जाति प्रमाण पत्र रद्द करने से पहले 'कारण बताओ नोटिस' देने की शर्त सिर्फ़ फ़ोन कॉल करने से पूरी नहीं होती: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि किसी व्यक्ति को सिर्फ़ फ़ोन कॉल करना, जाति प्रमाण पत्र रद्द करने से पहले 'कारण बताओ नोटिस' जारी करने की शर्त को पूरा नहीं करता। कोर्ट ने कहा कि जाति प्रमाण पत्र रद्द करने से, जिससे नागरिक अधिकार मिलते हैं, प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का उचित और सही मौक़ा मिलना ज़रूरी है।जस्टिस पंकज पुरोहित रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में तहसीलदार द्वारा 09.07.2025 को जारी उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें याचिकाकर्ता का OBC जाति प्रमाण पत्र रद्द किया गया था।...
नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण टाल नहीं सकता पिता, मां की आय या कर्ज का बहाना स्वीकार नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पिता अपने नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से यह कहकर बच नहीं सकता कि मां भी कमाती है या उस पर कर्ज और पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे के भरण-पोषण का दायित्व सर्वोच्च है और स्वेच्छा से लिए गए वित्तीय बोझ इस जिम्मेदारी को कम नहीं कर सकते।जस्टिस आशीष नैथानी ने रुड़की फैमिली कोर्ट केा आदेश बरकरार रखा, जिसमें पिता को नाबालिग बच्चे के लिए प्रति माह 8,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।मामला...
व्यभिचार साबित करने के लिए DNA टेस्ट का आदेश आम तौर पर नहीं दिया जा सकता, बच्चे की वैधता की धारणा ही मान्य होनी चाहिए: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि व्यभिचार के आरोपों को साबित करने के लिए किसी बच्चे के DNA टेस्ट का आदेश आम तौर पर नहीं दिया जा सकता, खासकर तब जब साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत बच्चे की वैधता की कानूनी धारणा को चुनौती देने के लिए कोई दलीलें या सबूत मौजूद न हों।कोर्ट ने टिप्पणी की कि बिना किसी ठोस आधार के ऐसे टेस्ट की अनुमति देना एक वैध विवाह से जन्मे बच्चे को प्राप्त कानूनी सुरक्षा को कमज़ोर करेगा और बच्चे की गरिमा और निजता में अनावश्यक दखल माना जाएगा। इसी आधार पर कोर्ट ने वैवाहिक...
नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण टाल नहीं सकता पिता, मां की आय या कर्ज का बहाना स्वीकार नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पिता अपने नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से यह कहकर बच नहीं सकता कि मां भी कमाती है या उस पर कर्ज और पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे के भरण-पोषण का दायित्व सर्वोच्च है और स्वेच्छा से लिए गए वित्तीय बोझ इस जिम्मेदारी को कम नहीं कर सकते।जस्टिस आशीष नैथानी ने रुड़की फैमिली कोर्ट केा आदेश बरकरार रखा, जिसमें पिता को नाबालिग बच्चे के लिए प्रति माह 8,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।मामला...
परिवार पेंशनभोगी को 'आश्रित' बताकर मेडिकल प्रतिपूर्ति से वंचित नहीं किया जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि परिवार पेंशन पाने वाले व्यक्ति को आश्रित मानकर मेडिकल प्रतिपूर्ति (मेडिकल रिइम्बर्समेंट) से वंचित नहीं किया जा सकता, खासकर जब वह अपने स्वतंत्र अधिकार के रूप में इस लाभ का दावा कर रहा हो। कोर्ट ने कहा कि यदि राज्य सरकार ने किसी परिवार पेंशनभोगी को स्वास्थ्य योजना का लाभ दिया और उससे नियमित अंशदान भी लिया जा रहा है, तो बाद में आयु सीमा का हवाला देकर दावा खारिज करना अनुचित है।जस्टिस पंकज पुरोहित ने एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह...
प्रशासनिक चूक के कारण दावा खारिज नहीं किया जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट का मृतक कांस्टेबल की विधवा को ₹25 लाख का बीमा देने का निर्देश
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि कोई भी बैंक किसी मृतक पुलिस कांस्टेबल की विधवा को आकस्मिक मृत्यु बीमा योजना का लाभ देने से सिर्फ इस आधार पर इनकार नहीं कर सकता कि उसका नाम बीमित कर्मचारियों की सूची में शामिल नहीं था, जबकि यह चूक प्रशासनिक लापरवाही के कारण हुई हो।यह मामला उत्तराखंड पुलिस के कांस्टेबल की मृत्यु से जुड़ा है। कांस्टेबल की मृत्यु ड्यूटी के दौरान सड़क दुर्घटना में हुई थी। उस समय उसका वेतन खाता (Salary Account) संबंधित बैंक में था। यह देखते हुए कि अधिकारियों के बीच तालमेल की कमी...













