सुप्रीम कोर्ट

ज्यूडिशियल सर्विस के लिए बेंच क्लर्क का अनुभव लॉ क्लर्क के अनुभव के बराबर नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (6 अक्टूबर) को एक रिट याचिका खारिज की। इस याचिका में मांग की गई थी कि न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने के लिए ज़रूरी एक साल की कानूनी प्रैक्टिस की शर्त को पूरा करने के मकसद से, ज़िला न्यायपालिका में बेंच क्लर्क के अनुभव को लॉ क्लर्क के अनुभव के बराबर माना जाए।कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि बेंच क्लर्क का अनुभव "प्रशासनिक" (मिनिस्टीरियल) प्रकृति का होता है और लॉ क्लर्क के अनुभव से अलग होता है, इसलिए कोर्ट ने मामला खारिज किया।चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस...

S.72 BSA | अदालतों को खुद ही हस्ताक्षर की तुलना करनी चाहिए, लिखावट से जुड़े विवादों में हर बार एक्सपर्ट की राय नहीं मांगी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब अदालत खुद हस्ताक्षर या लिखावट की तुलना करके किसी नतीजे पर पहुंच सकती है तो विवादित लिखावट/हस्ताक्षर/अंगूठे के निशान वाले हर मामले को एक्सपर्ट की जांच के लिए भेजना सही नहीं है।जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा कि सिर्फ़ इस आधार पर एक्सपर्ट की राय नहीं मांगी जा सकती कि अदालतें लिखावट/हस्ताक्षर/अंगूठे के निशान की असलियत का पता लगाने में एक्सपर्ट नहीं हैं। कोर्ट ने साफ़ किया कि जब उसे कोई शक हो, या लिखावट/निशान धुंधला, अस्पष्ट या बहुत हल्का हो,...

टैक्स क्लासिफिकेशन सामान के बिक्री के समय के रूप पर आधारित होना चाहिए, न कि उसके अंतिम इस्तेमाल पर: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पाउडर या बिस्किट के रूप में बेचे जाने वाले सामान को सिर्फ़ इसलिए "नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक्स और बेवरेज" (बिना शराब वाले पेय पदार्थ) के तौर पर क्लासिफ़ाई नहीं किया जा सकता, क्योंकि बाद में उन्हें दूध या पानी में मिलाकर पेय पदार्थ बनाया जा सकता है।जस्टिस मनमोहन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने इस मुद्दे पर विचार किया कि क्या सामान को उनके अंतिम इस्तेमाल के आधार पर क्लासिफ़ाई किया जाना चाहिए (यानी, उन्हें दूध या पानी में मिलाकर पेय पदार्थ बनाया जा सकता है) या बिक्री के समय उनके...

जांच अधिकारी को सबूत नहीं बनाने चाहिए: गवाहों को सेट अप किए जाने का पता चलने पर सुप्रीम कोर्ट ने बरी करने का फैसला बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी का काम सबूत इकट्ठा करना है, न कि उन्हें बनाना। कोर्ट ने एक महिला को दो लोगों की हत्या के मामले में बरी किया, क्योंकि यह पाया गया कि जांच एजेंसी ने सबूत बनाने के लिए गवाहों को "सेट अप" किया था और यह नहीं बता पाई कि जांच के दौरान उनके बयान क्यों दर्ज किए गए।जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। अभियोजन पक्ष ने एक टैक्सी ड्राइवर और होटल के कर्मचारी के बयानों के आधार पर आरोपी का अपराध साबित करने की कोशिश की थी। लेकिन जांच में...

चुने हुए प्रतिनिधि पुलिस या कोर्ट की भूमिका नहीं निभा सकते, जनता का जनादेश बेरोकटोक ताकत का ज़रिया नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुने हुए प्रतिनिधि पुलिस, एडमिनिस्ट्रेटर या कोर्ट की भूमिका नहीं निभा सकते। कोर्ट ने ज़ोर दिया कि जनता के जनादेश को निजी अधिकार या दूसरों को आदेश देने या डराने-धमकाने की बेरोकटोक ताकत का ज़रिया नहीं माना जा सकता।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,"लोकतंत्र वोट के ज़रिए ताकत देता है, लेकिन उस ताकत का इस्तेमाल कानून के दायरे में रहकर ही किया जा सकता है।" बेंच ने कल्याण डोंबिवली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के एक कॉर्पोरेटर और तीन अन्य लोगों की ज़मानत रद्द...

मेडिकल प्रोफेशनल्स को डराने या उन पर हमला करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि शारीरिक हिंसा, डराने-धमकाने या ज़बरदस्ती के डर के बीच डॉक्टरों से सही और स्वतंत्र पेशेवर फ़ैसला लेने की उम्मीद नहीं की जा सकती। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मेडिकल प्रोफेशनल्स की सुरक्षा और सम्मान, सही तरीके से हेल्थकेयर देने के लिए ज़रूरी सुरक्षा उपाय हैं।कोर्ट ने यह भी कहा कि इलाज को लेकर शिकायतें, चाहे कितनी भी सही क्यों न हों, हिंसा का सहारा लेने को सही नहीं ठहरा सकतीं। कोर्ट ने ज़ोर दिया कि ऐसे व्यवहार की इजाज़त देने से उन हालात पर बुरा असर पड़ेगा,...

सिर्फ़ कागज़ात न होने से यह नहीं माना जा सकता कि मवेशियों को काटने के लिए ले जाया जा रहा है: सुप्रीम कोर्ट ने की सज़ा रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ ट्रांसपोर्ट के कागज़ात न होने से यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि मवेशियों को काटने के लिए ले जाया जा रहा है।जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने छत्तीसगढ़ कृषि पशु संरक्षण अधिनियम, 2004 के तहत एक व्यक्ति की सज़ा रद्द की। उस पर 32 बैलों को काटने के लिए ले जाने का आरोप है। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी कागज़ात के मवेशियों को ले जाने से यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि उन्हें सिर्फ़ काटने के मकसद से ले जाया जा रहा था।कोर्ट ने कहा,"सिर्फ़ इस बात से...

दादा की जगह पोता भी पा सकता है अनुकंपा नियुक्ति: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में दख़ल देने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश में दखल देने से इनकार किया, जिसमें रेलवे अधिकारियों को एक मृत रेलवे कर्मचारी के पोते को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने का निर्देश दिया गया।जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने भारत सरकार और रेलवे की उस याचिका को खारिज किया, जिसमें हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें रेलवे को प्रतिवादी (रेस्पॉन्डेंट) के अनुकंपा नियुक्ति के मामले पर विचार करने के लिए कहा गया।यह मामला प्रतिवादी-जितेंद्र वर्मा से जुड़ा है, जिनके दादा की 2002...

S. 313 CrPC | आरोपी के बयान का इस्तेमाल हालात की अधूरी कड़ी को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

अपनी छह साल की भांजी के रेप और मर्डर के आरोप में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (1 अक्टूबर) को कहा कि अगर अभियोजन पक्ष आरोपी का अपराध बिना किसी शक के साबित करने में नाकाम रहता है तो सिर्फ़ CrPC की धारा 313 / BNSS की धारा 351 के तहत बचाव पक्ष के बयानों के आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।दूसरे शब्दों में, CrPC की धारा 313 के तहत पूछे गए सवालों के जवाब में आरोपी ने जो कहा, उसका इस्तेमाल अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में रह गई कमियों को पूरा करने के लिए...

23,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा का ट्रैफिक जुर्माना बकाया: सुप्रीम कोर्ट का बिना भुगतान ई-चालान वाले वाहनों को ज़ब्त करने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ट्रैफिक का बकाया जुर्माना वसूलने के लिए कड़े कदम उठाने का निर्देश दिया। इन कदमों में रैंडम चेकिंग के दौरान बिना भुगतान वाले ई-चालान वाले वाहनों को ज़ब्त करना और बकाया राशि का भुगतान होने तक वाहनों से जुड़ी ऑनलाइन सेवाओं को रोकना शामिल है।कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ हज़ारों ई-चालान जारी करने से कोई खास फ़ायदा नहीं होगा, जब तक कि अधिकारी जुर्माने की वसूली सुनिश्चित न करें। कोर्ट को बताया गया कि देश भर में जारी ई-चालान के तहत लगभग 49,194.05 करोड़...

पूर्व सांसद सुभाषिनी अली ने संसदीय विशेषाधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट के 7-जज रेफरेंस में हस्तक्षेप की अनुमति मांगी

पूर्व लोकसभा सांसद और CPI(M) पोलित ब्यूरो की पूर्व सदस्य सुभाषिनी अली ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दाखिल कर संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 के तहत संसदीय/विधायी विशेषाधिकारों के दायरे और सीमाओं से जुड़े लंबित संवैधानिक रेफरेंस में हस्तक्षेप करने की अनुमति मांगी है। अली ने कहा है कि एक पूर्व सांसद के रूप में उनका व्यक्तिगत विधायी अनुभव इस संवैधानिक सवाल पर अदालत की सहायता कर सकता है। वह 1989 में कानपुर से लोकसभा सदस्य रही हैं और 2014 से 2024 तक CPI(M) पोलित ब्यूरो की सदस्य थीं। गैर-सदस्यों...

S. 138 NI Act | चेक बाउंस होने पर ड्रॉअर के पते पर भेजा गया नोटिस, परिवार के सदस्य को मिलने पर भी वैध माना जाएगा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (30 सितंबर) को कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) के तहत कानूनी डिमांड नोटिस को सिर्फ़ इसलिए अमान्य नहीं माना जा सकता कि वह ड्रॉअर के परिवार के किसी सदस्य को मिला था, जबकि नोटिस ड्रॉअर के सही पते पर रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजा गया।जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने केरल हाईकोर्ट का वह फ़ैसला पलट दिया, जिसमें ड्रॉअर की सज़ा को सिर्फ़ इस आधार पर रद्द कर दिया गया कि कानूनी डिमांड नोटिस उसे व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि उसकी माँ को मिला था,...

ज़मानत अर्ज़ी या आपराधिक मुक़दमे की सुनवाई के दौरान जजों को नैतिकता पर अपनी निजी राय से बचना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ज़मानत अर्ज़ी या आपराधिक मुक़दमे की सुनवाई के दौरान, पीठासीन जज को नैतिकता पर अपनी निजी राय या मूल्यों के आधार पर फ़ैसला देने से बचना चाहिए।जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने कहा,"हमारा मानना ​​है कि ज़मानत या किसी आरोपी के आपराधिक मुक़दमे से जुड़े मामले की सुनवाई करते समय अदालतों को पीठासीन जज की नैतिकता या अन्य मामलों पर निजी राय या मूल्यों के आधार पर फ़ैसला थोपने से बचना चाहिए।" बेंच ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें ज़मानत...

BNSS लागू होने के बाद संज्ञान लेने पर आरोपी की बात सुनना ज़रूरी, भले ही शिकायत पहले दर्ज की गई हो: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि जहां मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के लागू होने के बाद ही न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किया और प्रथम दृष्टया मामला पाया तो उस तारीख को ही संज्ञान लिया हुआ माना जाएगा। इसलिए आरोपी की बात पहले सुनी जानी चाहिए थी, जैसा कि BNSS की धारा 223 के प्रावधान में ज़रूरी है।जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने स्पेशल जज का वह आदेश रद्द किया, जिसमें प्रथम दृष्टया मामला पाया गया और संज्ञान लिया गया।कोर्ट ने इस मुद्दे को इस तरह तय...

आरोपी ट्रायल के सही स्टेज पर प्रॉसिक्यूशन के उन डॉक्युमेंट्स को पेश करने की मांग कर सकता है, जिनका इस्तेमाल प्रॉसिक्यूशन ने नहीं किया: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि कोई आरोपी जांच के दौरान ज़ब्त किए गए उन डॉक्युमेंट्स को कैसे मांग सकता है, जिनका इस्तेमाल प्रॉसिक्यूशन ने नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि हालांकि आरोपी को अपना बचाव तैयार करने के लिए प्रॉसिक्यूशन एजेंसी के पास मौजूद डॉक्युमेंट्स पाने का अधिकार है, लेकिन ऐसे डॉक्युमेंट्स की मांग किस स्टेज पर की जा सकती है, यह उन डॉक्युमेंट्स की प्रकृति पर निर्भर करेगा।कोर्ट ने यह बात स्पेशल कोर्ट और हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द करते हुए कही, जिनमें सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI)...

संभल हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज की रासुका के तहत हिरासत रद्द की, यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को संभल हिंसा मामले में आरोपी मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 (NSA) के तहत की गई निवारक हिरासत रद्द की। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को भी निरस्त किया, जिसमें हिरासत आदेश बरकरार रखा गया था।जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की खंडपीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार पुलिस हिरासत में कथित तौर पर दिए गए कबूलनामे के आधार पर निवारक हिरासत का आदेश पारित नहीं कर सकती थी। कोर्ट ने हिरासत का आदेश गैरकानूनी पाए जाने पर उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये...

सिर्फ़ कस्टडी में दिए गए कबूलनामे के आधार पर प्रिवेंटिव डिटेंशन नहीं हो सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकारी सिर्फ़ आरोपी के कबूलनामे के आधार पर प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) का आदेश जारी नहीं कर सकते। कोर्ट ने नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, 1980 के तहत मुल्ला अफ़रोज़ की हिरासत रद्द की, जिस पर 2024 की संभल हिंसा का मास्टरमाइंड होने का आरोप है।"इसलिए हमारी राय है कि पुलिस अधिकारी के सामने दिया गया कबूलनामा, अकेले और किसी स्वतंत्र सबूत के समर्थन के बिना प्रिवेंटिव डिटेंशन के आदेश को बनाए रखने के लिए ज़रूरी 'व्यक्तिगत संतुष्टि' (Subjective Satisfaction) का आधार नहीं बन सकता।...

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के 25 साल पुराने कर्मचारियों के बकाया मामले में दिहाड़ी मजदूरों को ₹1 लाख का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (28 सितंबर) को बिहार और झारखंड राज्यों को निर्देश दिया कि वे राज्य के स्वामित्व वाले पांच बंद हो चुके निगमों के हर संबंधित दिहाड़ी कर्मचारी/मज़दूर को एकमुश्त ₹1 लाख का भुगतान करें। साथ ही कोर्ट ने देर से दिए जाने वाले EPF बकाया पर सालाना 12% साधारण ब्याज और देर से दिए जाने वाले वेतन/मज़दूरी और अन्य मौद्रिक बकाया पर 6% ब्याज देने का आदेश दिया।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने आदेश दिया,"...हम बिहार और झारखंड राज्यों को यह निर्देश देना उचित समझते हैं कि वे...