सुप्रीम कोर्ट मंथली राउंड अप : मार्च, 2026

Shahadat

5 April 2026 7:22 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट मंथली राउंड अप : मार्च, 2026

    सुप्रीम कोर्ट में मार्च, 2026 में क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट मंथली राउंड अप। मार्च महीने के सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल लगाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास, राज्य केवल अन्य सड़कों पर ही टोल लगा सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज की। इस याचिका में राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल टैक्स लगाने की केंद्र सरकार की शक्ति को चुनौती दी गई। कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि इस तरह के शुल्क संविधान के तहत 'संघ सूची' (Union List) के दायरे में आते हैं।

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) द्वारा राष्ट्रीय राजमार्गों के उपयोग के लिए वसूला जाने वाला टोल, सूची I (संघ सूची) की प्रविष्टि 23 (संसद द्वारा बनाए गए कानून के तहत राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित किए गए राजमार्ग) और प्रविष्टि 96 (संघ सूची में शामिल किसी भी विषय के संबंध में शुल्क) के तहत आने वाला एक शुल्क है।

    Case Title – T S R Venkatramana v. Union of India & Ors.

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    S.133 Contract Act | बिना सहमति के लोन लिमिट में बदलाव के बाद कर्जदार के पैसे निकालने पर श्योरिटी ज़िम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि गारंटर की सहमति के बिना कर्जदार द्वारा मंज़ूर लिमिट से ज़्यादा निकाले गए लोन अमाउंट के लिए गारंटर ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि, गारंटर शुरू में गारंटी वाले लोन अमाउंट के लिए ज़िम्मेदार रहेगा।

    जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की बेंच ने गुजरात हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें कहा गया कि लोन एग्रीमेंट में अंतर होने पर श्योरिटी पूरी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाएगी।

    Cause Title: BHAGYALAXMI CO-OPERATIVE BANK LTD. VERSUS BABALDAS AMTHARAM PATEL (D) THROUGH LEGAL REPRESENTATIVES & OTHERS

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    विवाद सुलझाने की कोशिश पुलिस को अपराध का संज्ञान लेने से नहीं रोक सकती: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपस में झगड़ रहे गुटों के बीच विवाद सुलझाने की पुलिस की कोशिश उन्हें आपराधिक कृत्यों के लिए FIR दर्ज करने से नहीं रोक सकती। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा, "सिर्फ़ सुलह की कोशिश पुलिस को आपराधिक कृत्यों का संज्ञान लेने से नहीं रोक सकती।"

    यह मामला पंजाब के एक इलाके में दो गुटों के बीच हुए विवाद से जुड़ा है। अपीलकर्ता अनुसूचित जाति समुदाय से है, जबकि प्रतिवादी उच्च जाति के गुट से है। बताया जाता है कि यह विवाद इस आरोप पर शुरू हुआ कि नाली का पानी मोड़कर अपीलकर्ताओं के घरों में डाला जा रहा है।

    Cause Title: Kuldeep Singh and Anr. Versus State of Punjab and Anr. (with connected appeal)

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    '3 साल की प्रैक्टिस शर्त बनी रहेगी, सिर्फ लागू करने का तरीका तय करना है': सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को निचली न्यायिक सेवा (सिविल जज जूनियर डिवीजन) में नियुक्ति के लिए अनिवार्य 3 वर्ष के प्रैक्टिस नियम की समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सभी हाईकोर्टों को निर्देश दिया कि आवेदन की अंतिम तिथि 30 अप्रैल 2026 तक बढ़ाई जाए।

    चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने आदेश दिया कि जिन हाईकोर्टों ने पहले ही सिविल जज (जूनियर डिवीजन) पदों के लिए विज्ञापन जारी कर दिया है, वे आवेदन की अंतिम तिथि 30 अप्रैल 2026 तक बढ़ाएं। साथ ही भविष्य में जारी होने वाले नए विज्ञापनों में भी यही अंतिम तिथि निर्धारित की जाए।

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    बिना विभागीय जांच सरकारी कर्मचारी को बर्खास्त नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (12 मार्च) को कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी को बिना विभागीय जांच (Departmental Enquiry) के सेवा से बर्खास्त करने की शक्ति केवल इस आधार पर इस्तेमाल नहीं की जा सकती कि जांच करना “व्यावहारिक रूप से संभव नहीं” है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच को टालने का निर्णय केवल अनुमान या आशंका के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस सामग्री (relevant material) के आधार पर होना चाहिए।

    जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ दिल्ली पुलिस के एक कांस्टेबल की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसे बिना विभागीय जांच के सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (DCP) ने यह कहते हुए उसे बर्खास्त कर दिया था कि उसके खिलाफ आपराधिक मामला लंबित है और विभागीय जांच होने पर वह गवाहों को धमका सकता है या प्रभावित कर सकता है।

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    गंभीर अपराध में 'संदेह का लाभ' मिलने पर बरी हुए व्यक्ति को पुलिस भर्ती से रोका जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'संदेह का लाभ' (Benefit of Doubt) मिलने के आधार पर बरी होने से किसी उम्मीदवार को सरकारी नौकरी में नियुक्ति का अपने-आप अधिकार नहीं मिल जाता।

    जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने कहा, "...किसी व्यक्ति का किसी अपराध में या ऐसे आचरण में शामिल होना, जिसे 'नैतिक पतन' (Moral Turpitude) माना जा सकता है—भले ही इसके अलावा और कुछ न हो—उस पद के लिए उसकी योग्यता और उसे नौकरी पर रखने के लिए उसकी साख (Credentials) जांचने में एक अहम आधार बन सकता है।" Also Read - '3 साल की प्रैक्टिस शर्त बनी रहेगी, सिर्फ लागू करने का तरीका तय करना है': सुप्रीम कोर्ट

    Cause Title: THE STATE OF MADHYA PRADESH & ORS. VERSUS RAJKUMAR YADAV

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    रेलवे यात्रा बीमा सिर्फ़ ऑनलाइन टिकट तक सीमित नहीं हो सकता, यह काउंटर टिकट वाले यात्रियों के लिए भी उपलब्ध होना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो यात्री रेलवे टिकट काउंटर से खरीदते हैं, उन्हें यात्रा बीमा का फ़ायदा देने से मना नहीं किया जा सकता, जबकि यही सुविधा उन लोगों के लिए उपलब्ध है जो टिकट ऑनलाइन बुक करते हैं।

    जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि जो यात्री रेलवे टिकट ऑनलाइन बुक करते हैं, वे बहुत कम अतिरिक्त कीमत पर बीमा का विकल्प चुन सकते हैं, जबकि यही विकल्प अभी उन यात्रियों के लिए उपलब्ध नहीं है जो रेलवे काउंटर पर जाकर टिकट खरीदते हैं।

    Case Title: Union of India v. Radha Yadav, Miscellaneous Application No.741-742/2019

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    साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 के सर्टिफिकेट के बिना कॉल डिटेल रिकॉर्ड मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी किया। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) को सबूत के तौर पर तब तक नहीं माना जा सकता, जब तक उनके साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 65-B के तहत अनिवार्य सर्टिफिकेट न हो।

    जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने कहा, "...साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B [BSA की धारा 63] के तहत सर्टिफिकेट को अभियोजन पक्ष साबित नहीं कर पाया। साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B [BSA की धारा 63] के तहत अनिवार्य रूप से ज़रूरी सर्टिफिकेट के अभाव में कॉल डिटेल रिकॉर्ड सबूत के तौर पर अमान्य हो जाते हैं और अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन करने के लिए उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।"

    Cause Title: POORANMAL VERSUS THE STATE OF RAJASTHAN & ANR.

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    सिर्फ ₹1 मुआवज़े पर संपत्ति अधिग्रहण मनमाना: सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक लाइब्रेरी अधिग्रहण वाला बिहार कानून रद्द किया

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (10 मार्च) को बिहार के उस कानून को रद्द कर दिया, जिसके तहत राज्य सरकार को एक ऐतिहासिक पुस्तकालय को केवल एक रुपये के प्रतीकात्मक मुआवज़े पर अपने नियंत्रण में लेने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने कहा कि ऐसा प्रावधान “जब्ती जैसा (confiscatory)” है और संविधान की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत राज्य कानून के आधार पर संपत्ति से वंचित कर सकता है, लेकिन ऐसा कानून न्यायसंगत, निष्पक्ष और तर्कसंगत होना चाहिए। यदि किसी कानून के तहत संपत्ति अधिग्रहण के बदले केवल प्रतीकात्मक मुआवज़ा दिया जाता है, तो उसमें निष्पक्षता के मूल तत्व ही नहीं रहते और वह मनमाना तथा जब्ती जैसा हो जाता है।

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    13 साल से कोमा में पड़े युवक को सम्मानजनक मृत्यु की अनुमति: सुप्रीम कोर्ट ने जीवनरक्षक उपचार हटाने की दी इजाजत

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दी। अदालत ने 13 वर्षों से स्थायी वनस्पति अवस्था में पड़े 32 वर्षीय युवक के जीवनरक्षक उपचार हटाने की इजाजत दी।

    जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह आदेश युवक के पिता की उस याचिका पर दिया, जिसमें उन्होंने अपने बेटे के सभी जीवनरक्षक उपचार बंद करने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने कहा कि गरिमा के साथ मृत्यु भी व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।

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    बहू से झगड़ा करना अपने आपमें क्रूरता या दहेज उत्पीड़न का अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (9 मार्च) को दहेज उत्पीड़न के मामले में महिला के सास-ससुर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप अस्पष्ट और एक जैसे हैं।

    कोर्ट ने कहा कि अपील करने वालों (सास-ससुर) के खिलाफ एकमात्र आरोप यह है कि वे महिला से झगड़ा करते थे। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ झगड़ा करना अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत घरेलू क्रूरता या दहेज उत्पीड़न का अपराध नहीं माना जाएगा।

    Cause Title: DR. SUSHIL KUMAR PURBEY & ANR. VERSUS THE STATE OF BIHAR AND ORS.

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    Bihar Special Courts Act | अवैध संपत्ति वाले सरकारी कर्मचारी की मौत के बाद भी पत्नी के खिलाफ ज़ब्ती की कार्रवाई जारी रह सकती है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस सरकारी अधिकारी ने अपनी आय से ज़्यादा संपत्ति जमा की हो, उसकी मौत के बाद भी बिहार स्पेशल कोर्ट एक्ट, 2009 के तहत उसकी पत्नी (जो सरकारी कर्मचारी नहीं है) के खिलाफ ज़ब्ती की कार्रवाई जारी रखी जा सकती है।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने पटना हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें कहा गया कि आरोपी अधिकारी की मौत के बाद बिहार स्पेशल कोर्ट एक्ट, 2009 के तहत उसकी पत्नी के खिलाफ ज़ब्ती की कार्रवाई खत्म हो गई।

    Cause Title: THE STATE OF BIHAR THR. VIGILANCE Versus SUDHA SINGH (with connected case)

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    2 उम्मीदवारों वाला चुनाव रद्द हो जाए तो नए चुनाव की ज़रूरत नहीं, दूसरे नंबर पर रहे उम्मीदवार को विजेता घोषित किया जाए: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जहां किसी चुनाव में सिर्फ़ दो उम्मीदवारों ने हिस्सा लिया हो, वहां जीतने वाले उम्मीदवार का चुनाव रद्द होने पर नए चुनाव की ज़रूरत नहीं होती; इसके बजाय, दूसरे नंबर पर रहे उम्मीदवार को ही विजेता घोषित किया जाना चाहिए।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने ओडिशा हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया, जिसमें जीतने वाले उम्मीदवार का पंचायत समिति अध्यक्ष के तौर पर चुनाव रद्द होने के बाद नए चुनाव का आदेश दिया गया था।

    Cause Title: RAMADEBI RAUTRAY VERSUS STATE OF ODISHA AND ORS. (and connected case)

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    गोद लेना भी प्रजनन अधिकार का हिस्सा: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मातृत्व केवल जैविक नहीं

    सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि गोद लेना (अडॉप्शन) भी व्यक्ति के प्रजनन और निर्णय लेने की स्वतंत्रता का हिस्सा है, जो अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि परिवार बनाने का अधिकार केवल जैविक तरीके तक सीमित नहीं है, बल्कि गोद लेना भी उसी अधिकार का समान और वैध रूप है।

    अदालत ने कहा, “प्रजनन स्वतंत्रता केवल बच्चे को जन्म देने तक सीमित नहीं है। गोद लेना भी परिवार बनाने और माता-पिता बनने के अधिकार का समान रूप से महत्वपूर्ण हिस्सा है।”

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    NGT, नगर निगम कानूनों का उल्लंघन करके किए गए अतिक्रमण को हटाने का आदेश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के पास ऐसे कथित अतिक्रमण को हटाने का आदेश देने का अधिकार क्षेत्र नहीं है, जो नगर निगम कानूनों का उल्लंघन करके किया गया हो।

    जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने नई दिल्ली NGT का फैसला रद्द किया, जिसमें एक मंदिर को हटाने का आदेश दिया गया। यह मंदिर गाजियाबाद जिले के वसुंधरा, सेक्टर-16A में 'खुली जगह/पार्क' के तौर पर दिखाई गई ज़मीन पर अवैध रूप से बनाया गया था।

    Cause Title: NARENDER BHARDWAJ VERSUS M/S 108 SUPER COMPLEX R.W.A. & ORS.

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    तीन महीने से ज़्यादा उम्र के बच्चों को गोद लेने वाली माताओं को मातृत्व लाभ से वंचित करना असंवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (17 मार्च) को फैसला सुनाया कि सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60(4), जो किसी गोद लेने वाली माँ को मातृत्व लाभ तभी देती है, जब गोद लिए गए बच्चे की उम्र 3 महीने से कम हो, असंवैधानिक है। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि गोद लेने वाली माँ 12 हफ़्ते की मातृत्व छुट्टी की हकदार होनी चाहिए, चाहे गोद लिए गए बच्चे की उम्र कुछ भी हो।

    कोर्ट ने इस प्रावधान की व्याख्या इस तरह की: "कोई भी महिला जो कानूनी तौर पर किसी बच्चे को गोद लेती है, या कोई कमीशनिंग माँ, उस तारीख से 12 हफ़्ते की अवधि के लिए मातृत्व लाभ की हकदार होगी, जिस तारीख को बच्चा गोद लेने वाली माँ या कमीशनिंग माँ को सौंपा जाता है, जैसा भी मामला हो।"

    Case Title – Hamsaanandini Nanduri v. Union of India

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    एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य': सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी को संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' माना है, जिस पर रिट क्षेत्राधिकार लागू होता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट का फ़ैसला पलट दिया, जिसमें एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी (सोसाइटी) को 'राज्य' मानने से इनकार किया गया। बेंच ने कहा कि चूंकि सोसाइटी एक सार्वजनिक कार्य करती है, जो भारतीय वायु सेना के सदस्यों के प्रति राज्य के दायित्वों से गहराई से जुड़ा है, इसलिए यह 'राज्य' की श्रेणी में आती है।

    Cause Title: RAVI KHOKHAR & ORS Versus UNION OF INDIA & ORS.

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    अनुच्छेद 25 में धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश मांगने का अधिकार शामिल नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार में यह मांग करने का अधिकार शामिल नहीं है कि राज्य किसी धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करे। साथ ही कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक विकासशील राष्ट्र के तौर पर भारत को उत्पादकता और काम की निरंतरता को प्राथमिकता देनी चाहिए।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने 'ऑल इंडिया शिरोमणि सिंह सभा' द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) खारिज की। इस याचिका में गुरु गोबिंद सिंह की जयंती (प्रकाश पर्व) को पूरे देश में 'राजपत्रित अवकाश' (Gazetted Holiday) घोषित करने और पूरे देश में सार्वजनिक अवकाश घोषित करने के लिए एक समान दिशानिर्देश बनाने की मांग की गई थी।

    Case :All India Shiromani Singh Sabha v. Union of India and others | W.P.(C) No. 1474/2020

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    डिफेंस सिक्योरिटी कोर के जवान दूसरी पेंशन के हकदार, एक साल तक की कमी माफ की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च को फैसला सुनाया कि डिफेंस सिक्योरिटी कोर (DSC) के जो जवान पहले से ही सेना में अपनी पिछली सेवा के लिए पेंशन ले रहे हैं, वे DSC में अपनी बाद की सेवा के लिए दूसरी सर्विस पेंशन पाने के हकदार हैं। साथ ही पेंशन नियमों के अनुसार, क्वालिफाइंग सर्विस में एक साल तक की कमी को माफ किया जा सकता है। कोर्ट ने साफ किया कि दूसरी पेंशन देने पर कोई कानूनी रोक नहीं है, सिर्फ इसलिए कि वह व्यक्ति पहले से ही अपनी पहली सेवा अवधि के लिए पेंशन ले रहा है।

    जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने केंद्र सरकार की ओर से DSC जवानों को दूसरी पेंशन देने के खिलाफ दायर अपीलों के समूह को खारिज किया। बेंच ने कहा कि DSC में सेवा से मिलने वाली पेंशन का हक "एक ही सेवा, पद, या रोजगार की लगातार अवधि से नहीं, बल्कि एक अलग और स्वतंत्र नियुक्ति से मिलता है।"

    Cause Title: UNION OF INDIA & ORS. VERSUS BALAKRISHNAN MULLIKOTE (EX HAV 256812 M) (with connected appeals)

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    हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म या सिख धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करने पर अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाता है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें कहा गया कि एक बार जब कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है और सक्रिय रूप से उसका पालन करता है तो वह अनुसूचित जाति समुदाय का सदस्य नहीं रह सकता। कोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति जो हिंदू धर्म, सिख धर्म या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म का पालन करता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता।

    कोर्ट ने आगे कहा कि किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करने पर अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाता है। कोर्ट ने गौर किया कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में यह बात स्पष्ट की गई और इस आदेश के तहत लगा प्रतिबंध पूर्ण है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1950 के आदेश के खंड 3 में निर्दिष्ट न किए गए किसी भी धर्म में धर्मांतरण करने पर, जन्म की स्थिति चाहे जो भी हो, अनुसूचित जाति का दर्जा तत्काल समाप्त हो जाता है।

    Case Details: CHINTHADA ANAND v STATE OF ANDHRA PRADESH AND ORS.|SLP(Crl) No. 9231/2025

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    राज्य के अधिकारियों द्वारा अधिग्रहित वाहन से हुए हादसे के लिए निजी बीमा कंपनी ज़िम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (23 मार्च) को यह फ़ैसला दिया कि जब किसी निजी वाहन को राज्य द्वारा चुनावों जैसे सार्वजनिक कार्यों के लिए अधिग्रहित किया जाता है तो दुर्घटनाओं की ज़िम्मेदारी अधिग्रहित करने वाले प्राधिकरण की होती है, न कि बीमा कंपनी की।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने कहा, "...जहां किसी वाहन को सार्वजनिक कार्यों के लिए अधिग्रहित किया जाता है और अधिग्रहण की उस अवधि के दौरान कोई घटना घटित होती है तो उसकी ज़िम्मेदारी सही तौर पर अधिग्रहित करने वाले प्राधिकरण की होनी चाहिए, न कि उस बीमा कंपनी की जिसे वाहन के नियमित और स्वैच्छिक उपयोग के लिए मालिक ने नियुक्त किया था।"

    Cause Title: DISTRICT MAGISTRATE AND DISTRICT ELECTION OFFICER AND COLLECTOR, GWALIOR, M.P. VERSUS NATIONAL INSURANCE COMPANY LIMITED & ORS.

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    पे कमीशन के फ़ायदे अतिरिक्त शर्तें लगाकर नहीं रोके जा सकते: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल को यह टिप्पणी की कि सेंट्रल पे कमीशन की सिफ़ारिशों की मनमानी व्याख्या करके किसी कर्मचारी को पे कमीशन के फ़ायदों से वंचित करने के लिए कोई अतिरिक्त शर्त नहीं लगाई जा सकती।

    जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। यह मामला उन याचिकाकर्ताओं से जुड़ा था, जिन्होंने शुरू में बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइज़ेशन में जूनियर इंजीनियरिंग कैडर में नौकरी शुरू की थी। बाद में कैडर के विलय के बाद उन्हें 'जूनियर इंजीनियर' के तौर पर नया पदनाम दिया गया।

    Cause Title: UNION OF INDIA & OTHERS VERSUS SUNIL KUMAR RAI & OTHERS

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    Karnataka Stamp Act | कोर्ट के पास कम पड़ी ड्यूटी के दस गुना से कम जुर्माना लगाने का कोई विवेकाधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि जब अदालतें 'कर्नाटक स्टाम्प अधिनियम, 1957' के तहत स्टाम्प ड्यूटी में किसी कमी का निर्धारण करती हैं तो उनके पास कम पड़ी ड्यूटी के दस गुना से कम जुर्माना लगाने का कोई विवेकाधिकार नहीं होता है।

    जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने यह टिप्पणी की, “जब किसी दस्तावेज़ को डिस्ट्रिक्ट कमिश्नर के पास भेजे बिना कोर्ट में सबूत के तौर पर पेश करने की कोशिश की जाती है, तो जुर्माने की रकम तय करने में कोई छूट नहीं होती।”

    Cause Title: Krishnavathi Sharma Versus Bhagwandas Sharma and Ors.

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    सरकार को जनहित में उद्योगों को दी गई टैक्स छूट वापस लेने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार द्वारा दी गई टैक्स छूट से पाने वाले का कोई ऐसा पक्का अधिकार नहीं बन जाता कि वह हमेशा के लिए उस छूट का दावा करता रहे, और सरकार जनहित में ऐसी छूट वापस ले सकती है।

    जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने महाराष्ट्र सरकार की अपील को मंज़ूर करते हुए यह बात कही। यह अपील कैप्टिव पावर जेनरेटरों के खिलाफ थी। बेंच ने सरकार के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें उसने कैप्टिव पावर (वह बिजली जो उद्योग अपनी ज़रूरत के लिए खुद बनाते हैं, बिना ग्रिड सप्लाई पर निर्भर रहे) बनाने के लिए उन्हें मिलने वाले टैक्स फायदों को वापस ले लिया था।

    Cause Title: THE STATE OF MAHARASHTRA & OTHERS VERSUS RELIANCE INDUSTRIES LTD. & OTHERS

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    Land Acquisition | जिस व्यक्ति ने S.28A के तहत मुआवज़ा स्वीकार किया, वह अपील के आधार पर बढ़ोतरी के लिए दूसरा आवेदन दायर कर सकता है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 28A के तहत दूसरा आवेदन दायर किया जा सकता है, ताकि अन्य मामलों में हाई कोर्ट द्वारा दी गई बढ़ोतरी के आधार पर मुआवज़े का फिर से निर्धारण किया जा सके। कोर्ट ने फैसला दिया कि भूमि अधिग्रहण का मुआवज़ा स्वीकार कर लेने से कोई ज़मीन मालिक भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 28-A के तहत बढ़ा हुआ मुआवज़ा मांगने से वंचित नहीं हो जाएगा।

    जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच का फैसला रद्द किया, जिसमें अपीलकर्ता की धारा 28-A के तहत बढ़े हुए मुआवज़े की मांग को इस आधार पर खारिज किया गया था कि पहले से ही तय की गई राशि स्वीकार कर लेने के कारण वह अपने जैसे अन्य ज़मीन मालिकों के बराबर और बढ़ोतरी की मांग करने से रोक दिया गया।

    Cause Title: ANDANAYYA AND ORS. VERSUS DEPUTY CHIEF ENGINEER AND ORS.

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