बिना विभागीय जांच सरकारी कर्मचारी को बर्खास्त नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
Praveen Mishra
13 March 2026 1:03 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (12 मार्च) को कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी को बिना विभागीय जांच (Departmental Enquiry) के सेवा से बर्खास्त करने की शक्ति केवल इस आधार पर इस्तेमाल नहीं की जा सकती कि जांच करना “व्यावहारिक रूप से संभव नहीं” है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच को टालने का निर्णय केवल अनुमान या आशंका के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस सामग्री (relevant material) के आधार पर होना चाहिए।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ दिल्ली पुलिस के एक कांस्टेबल की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसे बिना विभागीय जांच के सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (DCP) ने यह कहते हुए उसे बर्खास्त कर दिया था कि उसके खिलाफ आपराधिक मामला लंबित है और विभागीय जांच होने पर वह गवाहों को धमका सकता है या प्रभावित कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कांस्टेबल की सेवा बहाल (reinstatement) करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत सामान्य नियम यह है कि किसी सरकारी कर्मचारी को बर्खास्त करने से पहले विभागीय जांच की जाए और उसे आरोपों का जवाब देने का उचित अवसर दिया जाए। हालांकि अनुच्छेद 311(2) के दूसरे प्रावधान की धारा (b) के तहत, यदि सक्षम प्राधिकारी लिखित रूप में यह संतुष्ट हो जाए कि जांच करना “व्यावहारिक रूप से संभव नहीं” है, तभी बिना जांच के बर्खास्त किया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि इस मामले में डीसीपी की रिपोर्ट में ऐसा कोई ठोस उदाहरण नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने गवाहों को धमकाया या प्रभावित किया। जब बर्खास्तगी का आदेश पारित किया गया, उस समय कांस्टेबल जेल में था और उसके खिलाफ गवाहों को धमकाने का कोई प्रमाण रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं था। इसलिए केवल अनुमान के आधार पर जांच को दरकिनार करना कानूनन स्वीकार्य नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच को टालने का फैसला किसी अधिकारी के मात्र कथन (ipse dixit) पर आधारित नहीं हो सकता। यदि अदालत में उस फैसले को चुनौती दी जाती है, तो संबंधित प्राधिकरण को यह दिखाना होगा कि उसका निर्णय वस्तुनिष्ठ तथ्यों पर आधारित था, न कि किसी मनमानी या व्यक्तिगत अनुमान पर।
मामले की पृष्ठभूमि में बताया गया कि याचिकाकर्ता दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल में कांस्टेबल के रूप में कार्यरत था। उसके खिलाफ डकैती और आपराधिक साजिश जैसे अपराधों के तहत एफआईआर दर्ज हुई और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के दौरान ही डीसीपी ने अनुच्छेद 311(2)(b) का हवाला देते हुए उसे बिना विभागीय जांच के सेवा से बर्खास्त कर दिया।
कांस्टेबल ने पहले केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) में इस आदेश को चुनौती दी, जहां उसकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने भी उसके खिलाफ फैसला दिया। अंततः वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी आदेशों को रद्द करते हुए कांस्टेबल को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया और कहा कि उसे सेवा की निरंतरता (continuity of service) मिलेगी। हालांकि, चूंकि उसके खिलाफ आपराधिक मामला लंबित है, इसलिए अदालत ने बर्खास्तगी की तारीख से पुनर्नियुक्ति तक की अवधि के लिए केवल 50% बैक वेज (back wages) देने का आदेश दिया।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कांस्टेबल की बहाली से पुलिस विभाग को यह अधिकार बना रहेगा कि वह कानून के अनुसार उसके खिलाफ नियमित विभागीय जांच शुरू कर सके।

