Land Acquisition | जिस व्यक्ति ने S.28A के तहत मुआवज़ा स्वीकार किया, वह अपील के आधार पर बढ़ोतरी के लिए दूसरा आवेदन दायर कर सकता है: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
29 March 2026 1:00 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 28A के तहत दूसरा आवेदन दायर किया जा सकता है, ताकि अन्य मामलों में हाई कोर्ट द्वारा दी गई बढ़ोतरी के आधार पर मुआवज़े का फिर से निर्धारण किया जा सके।
कोर्ट ने फैसला दिया कि भूमि अधिग्रहण का मुआवज़ा स्वीकार कर लेने से कोई ज़मीन मालिक भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 28-A के तहत बढ़ा हुआ मुआवज़ा मांगने से वंचित नहीं हो जाएगा।
जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच का फैसला रद्द किया, जिसमें अपीलकर्ता की धारा 28-A के तहत बढ़े हुए मुआवज़े की मांग को इस आधार पर खारिज किया गया था कि पहले से ही तय की गई राशि स्वीकार कर लेने के कारण वह अपने जैसे अन्य ज़मीन मालिकों के बराबर और बढ़ोतरी की मांग करने से रोक दिया गया।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"अपीलीय फोरम द्वारा पारित अंतिम फैसले के परिणामस्वरूप किसी ज़मीन मालिक को मिले बढ़े हुए मुआवज़े का लाभ उन अन्य ज़मीन मालिकों को भी मिलेगा जो अधिनियम की धारा 28-A के तहत मुआवज़े का फिर से निर्धारण करवाना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, जब 'A' को रेफरेंस कोर्ट से कोई फैसला मिलता है, तो 'B' भी अधिनियम की धारा 28-A का इस्तेमाल करके उसी फैसले का लाभ उठा सकता है। इसी तरह जब 'A' को हाई कोर्ट या इस कोर्ट से मुआवज़े में बढ़ोतरी मिलती है तो 'B' भी उसी बढ़ोतरी का हकदार होता है, भले ही उसने पहले रेफरेंस कोर्ट के फैसले के आधार पर अधिनियम की धारा 28-A के तहत पैसे प्राप्त कर लिए हों।"
यह मामला 2002 में कर्नाटक में एक रेलवे प्रोजेक्ट के लिए शुरू की गई भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही से जुड़ा है। भूमि अधिग्रहण अधिकारी (LAO) ने शुरू में ₹40,000 प्रति एकड़ की दर से मुआवज़ा तय किया था।
कुछ ज़मीन मालिकों ने धारा 18 के तहत इसे चुनौती दी, जिसके परिणामस्वरूप रेफरेंस कोर्ट ने 2006 में मुआवज़ा बढ़ाकर ₹2,00,000 प्रति एकड़ कर दिया। मौजूदा अपीलकर्ताओं ने जिन्होंने रेफरेंस की मांग नहीं की, मुआवज़े के फिर से निर्धारण के लिए धारा 28-A का इस्तेमाल किया और 2013 में उन्हें भी वही बढ़ा हुआ मुआवज़ा दिया गया।
हालांकि, हाईकोर्ट में समानांतर अपीलें लंबित थीं। कुछ ज़मीन मालिकों ने अपील दायर की थी, जिन्हें प्रति एकड़ ₹2,00,000 का मुआवज़ा मिला था; हाईकोर्ट ने इस मुआवज़े को बढ़ाकर प्रति एकड़ ₹3,50,000 कर दिया।
इस बढ़े हुए मुआवज़े के आधार पर अपीलकर्ताओं ने धारा 28-A के तहत नया आवेदन दायर किया, जिसमें मुआवज़े को फिर से तय करने की मांग की गई। भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने उक्त आवेदन खारिज किया। हालांकि, सिंगल जज ने उनकी याचिका स्वीकार की थी, लेकिन हाईकोर्ट की खंडपीठ ने उस फ़ैसले को पलट दिया। खंडपीठ ने यह माना कि दूसरा आवेदन स्वीकार्य नहीं है, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट में अपील के तौर पर पहुंचा।
विवादित निष्कर्षों को रद्द करते हुए जस्टिस सुंदरेश द्वारा लिखे गए फ़ैसले में यह टिप्पणी की गई:
“हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि हाईकोर्ट द्वारा मुआवज़ा तय किए जाने के बाद अधिनियम की धारा 28-A के तहत किया गया दूसरा आवेदन भी स्वीकार्य है और कलेक्टर/LAO द्वारा उस पर विचार किया जाना चाहिए। हमारा मानना है कि, संदर्भ न्यायालय (Reference Court) द्वारा तय किए गए मुआवज़े के आधार पर अधिनियम की धारा 28-A के तहत पहले दायर किए गए आवेदन पर विचार करना—और उसके बाद मुआवज़े की राशि प्राप्त कर लेना—उसी आवेदक के लिए हाईकोर्ट या इस न्यायालय द्वारा तय किए गए मुआवज़े के आधार पर मुआवज़े को फिर से तय करवाने की मांग करने में कोई बाधा नहीं बनेगा।”
न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि धारा 28-A एक कल्याणकारी प्रावधान है, जिसका उद्देश्य एक ही अधिग्रहण से प्रभावित ज़मीन मालिकों के बीच मौजूद असमानता को दूर करना है। यदि 'एस्टोपल' (Estoppel) या 'अधिकार-त्याग' (Waiver) के सिद्धांत को लागू होने दिया जाए तो इस उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो पाएगी।
तदनुसार, अपील स्वीकार कर ली गई और प्रतिवादी अधिकारियों को यह निर्देश दिया गया कि वे हाईकोर्ट द्वारा बढ़ाए गए मुआवज़े के अनुसार—यानी अपीलकर्ता को प्रति एकड़ ₹3,50,000 की दर से—मुआवज़े को फिर से तय करें।
Cause Title: ANDANAYYA AND ORS. VERSUS DEPUTY CHIEF ENGINEER AND ORS.

