अनुच्छेद 25 में धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश मांगने का अधिकार शामिल नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

25 March 2026 8:45 PM IST

  • अनुच्छेद 25 में धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश मांगने का अधिकार शामिल नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार में यह मांग करने का अधिकार शामिल नहीं है कि राज्य किसी धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करे। साथ ही कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक विकासशील राष्ट्र के तौर पर भारत को उत्पादकता और काम की निरंतरता को प्राथमिकता देनी चाहिए।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने 'ऑल इंडिया शिरोमणि सिंह सभा' ​​द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) खारिज की। इस याचिका में गुरु गोबिंद सिंह की जयंती (प्रकाश पर्व) को पूरे देश में 'राजपत्रित अवकाश' (Gazetted Holiday) घोषित करने और पूरे देश में सार्वजनिक अवकाश घोषित करने के लिए एक समान दिशानिर्देश बनाने की मांग की गई थी।

    कोर्ट ने पिछले हफ़्ते (17 मार्च) उक्त मामला खारिज किया था।

    शुरुआत में कोर्ट ने गुरु गोबिंद सिंह के प्रति गहरी श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी शिक्षाएं ईमानदार मेहनत और निस्वार्थ सेवा पर ज़ोर देती हैं। कोर्ट ने कहा कि उनकी विरासत का सबसे अच्छा सम्मान काम से दूर रहने के बजाय अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभाकर किया जा सकता है।

    कोर्ट ने कहा था,

    "शुरुआत में, यह ज़रूर कहा जाना चाहिए कि सिख धर्म के सिद्धांत ईश्वर को याद करने, ईमानदार मेहनत और निस्वार्थ सेवा पर सबसे ज़्यादा ज़ोर देते हैं। गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन साहस, अनुशासन और कर्तव्य के प्रति अटूट समर्पण का एक जीता-जागता प्रमाण है। फिर चाहे कितनी भी बड़ी मुसीबत क्यों न आई हो। उनकी शिक्षाएं, जो 'किरत करो' (ईमानदारी से रोज़ी कमाओ) और 'वंड छको' (जो कमाओ उसे दूसरों के साथ बांटो) के सिद्धांतों पर आधारित हैं। हमें अपनी ज़िम्मेदारियों से दूर भागने के बजाय उन्हें पूरी सक्रियता से निभाने का रास्ता दिखाती हैं। यह कोर्ट दसवें गुरु के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा व्यक्त करता है, जिनका पूरा जीवन न्याय के लिए और अपने सांसारिक कर्तव्यों को पूरा करने के लिए एक अथक संघर्ष था। इस नज़रिए से उनकी विरासत का सबसे अच्छा सम्मान शायद समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभाकर ही किया जा सकता है, न कि सिर्फ़ सम्मान दिखाने के लिए छुट्टी की मांग करके।"

    मुख्य मुद्दे पर आते हुए कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सार्वजनिक अवकाश घोषित करना नीतिगत फ़ैसला है, जिसमें प्रशासनिक दक्षता, आर्थिक प्रभाव और शासन से जुड़े पहलुओं पर विचार करना शामिल होता है। कोर्ट ने कहा कि राजपत्रित अवकाशों में बिना सोचे-समझे की गई किसी भी तरह की बढ़ोतरी का शासन-प्रशासन और सार्वजनिक उत्पादकता पर बुरा असर पड़ सकता है। खास बात यह है कि बेंच ने देश के विकास के संदर्भ पर ज़ोर देते हुए कहा कि सार्वजनिक छुट्टियों से जुड़े नीतिगत फ़ैसलों में काम की गरिमा और काम की निरंतरता मुख्य बातें होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक आदेश से काम न होने वाले दिनों को बढ़ाना एक ऐसा काम होगा जिसमें सीमा तय करनी पड़ेगी, जो मूल रूप से नीति से जुड़ा है और जिस पर न्यायिक फ़ैसला नहीं दिया जा सकता।

    आगे कहा गया,

    "इस संदर्भ में, हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि देश के अलग-अलग समुदायों को पहले से ही धार्मिक मान्यताओं के आधार पर कई तरह की छुट्टियां मिलती हैं। हमारे राष्ट्रीय और क्षेत्रीय कैलेंडर ऐसे त्योहारों से भरे पड़े हैं, जो हमारी समृद्ध विविधता को दिखाते हैं। सरकारी छुट्टियों की सूची को बढ़ाना एक प्रशासनिक तालमेल का मामला है। इसमें बिना सोचे-समझे कोई भी बढ़ोतरी शासन और सार्वजनिक उत्पादकता पर बुरा असर डालेगी। एक विकासशील देश होने के नाते हमारा ध्यान काम की गरिमा और काम की निरंतरता पर ही रहना चाहिए। काम न होने वाले दिनों को बढ़ाने का कोई भी न्यायिक आदेश एक ऐसा काम है, जिसमें सीमा तय करनी पड़ती है, जो मूल रूप से नीति से जुड़ा है और जिस पर न्यायिक फ़ैसला नहीं दिया जा सकता।"

    अनुच्छेद 25 पर निर्भरता खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहाँ संविधान हर व्यक्ति को धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है, वहीं यह अधिकार किसी धार्मिक अवसर को पूरे देश में अनिवार्य सार्वजनिक अवकाश घोषित करके राज्य से मान्यता दिलाने तक नहीं फैलता है। कोर्ट ने माना कि इस तरह के दावे के लिए अनुच्छेद 25 का हवाला देना गलत था।

    कोर्ट ने कहा,

    "इसी तरह भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 पर निर्भरता पूरी तरह से गलत है। जहां धर्म की स्वतंत्रता हर व्यक्ति को धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देती है, वहीं यह अधिकार किसी धार्मिक अवसर को पूरे देश में अनिवार्य सार्वजनिक अवकाश के रूप में राज्य से मान्यता दिलाने तक नहीं फैलता है।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि भारत की संघीय संरचना के लिए यह ज़रूरी है कि राज्यों में कार्यकारी फ़ैसले क्षेत्रीय सामाजिक-सांस्कृतिक बातों के आधार पर अलग-अलग हों, और सार्वजनिक अवकाशों को लेकर अलग-अलग नज़रिए का होना अपने आप में अनुच्छेद 14 के तहत मनमानी या भेदभाव नहीं माना जाएगा।

    न्यायिक अतिरेक के प्रति आगाह करते हुए बेंच ने चेतावनी दी कि इस तरह की राहत देने से अलग-अलग समूहों से इसी तरह की मांगों की बाढ़ आ सकती है, जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक अवकाशों का अव्यावहारिक विस्तार होगा और शासन तथा प्रशासनिक कामकाज पर बुरा असर पड़ेगा।

    तदनुसार, यह मानते हुए कि मांगी गई राहत में अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों का कोई ऐसा उल्लंघन नहीं दिखा, जिस पर कोर्ट सुनवाई कर सके, सुप्रीम कोर्ट ने रिट याचिका खारिज की।

    Case :All India Shiromani Singh Sabha v. Union of India and others | W.P.(C) No. 1474/2020

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