डिफेंस सिक्योरिटी कोर के जवान दूसरी पेंशन के हकदार, एक साल तक की कमी माफ की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

25 March 2026 7:26 PM IST

  • डिफेंस सिक्योरिटी कोर के जवान दूसरी पेंशन के हकदार, एक साल तक की कमी माफ की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च को फैसला सुनाया कि डिफेंस सिक्योरिटी कोर (DSC) के जो जवान पहले से ही सेना में अपनी पिछली सेवा के लिए पेंशन ले रहे हैं, वे DSC में अपनी बाद की सेवा के लिए दूसरी सर्विस पेंशन पाने के हकदार हैं। साथ ही पेंशन नियमों के अनुसार, क्वालिफाइंग सर्विस में एक साल तक की कमी को माफ किया जा सकता है। कोर्ट ने साफ किया कि दूसरी पेंशन देने पर कोई कानूनी रोक नहीं है, सिर्फ इसलिए कि वह व्यक्ति पहले से ही अपनी पहली सेवा अवधि के लिए पेंशन ले रहा है।

    जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने केंद्र सरकार की ओर से DSC जवानों को दूसरी पेंशन देने के खिलाफ दायर अपीलों के समूह को खारिज किया। बेंच ने कहा कि DSC में सेवा से मिलने वाली पेंशन का हक "एक ही सेवा, पद, या रोजगार की लगातार अवधि से नहीं, बल्कि एक अलग और स्वतंत्र नियुक्ति से मिलता है।"

    इसलिए कोर्ट ने कहा कि DSC पेंशन के दावे को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि जवान पहले से ही रेगुलर सेना पेंशन ले रहा था।

    कोर्ट ने केंद्र सरकार की इस दलील को खारिज किया कि DSC जवानों को दूसरी पेंशन के लिए क्वालिफाई करने के लिए अनिवार्य रूप से 15 साल या उससे ज़्यादा की सेवा पूरी करनी होगी। इसके बजाय, कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जहां सेवा में एक साल तक की कमी रह जाती है, वहां सरकार के पास उस कमी को माफ करने और जवान को पेंशन के लिए योग्य मानने का अधिकार है।

    कोर्ट ने 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम सुरेंद्र सिंह परमार, (2015) 3 SCC 404' मामले का हवाला देते हुए कहा,

    "अगर, क्वालिफाइंग सर्विस की अवधि तय करने पर एक साल या उससे कम की कमी रह जाती है तो प्रतिवादी पेंशन की पात्रता के लिए ऐसी कमी को माफ करवाने के हकदार होंगे, जो पेंशन नियम, 1961 के पैराग्राफ 125 या पेंशन नियम, 2008 के पैराग्राफ 44 के अनुसार होगा।"

    मामला

    डिफेंस सिक्योरिटी कोर भारतीय सेना का एक कोर है, जिसका गठन सेना अधिनियम, 1950 के तहत किया गया। इसमें सशस्त्र बलों के ऐसे रिटायर्ड जवान शामिल होते हैं, जिन्हें रक्षा प्रतिष्ठानों को सुरक्षा देने के लिए दोबारा भर्ती किया जाता है। DSC में भर्ती में 75 प्रतिशत पूर्व-सेना, 1 प्रतिशत पूर्व-नौसेना/वायु सेना, और 24 प्रतिशत पूर्व-प्रादेशिक सेना के जवान शामिल होते हैं।

    कोई रिटायर सेना कर्मी जब DSC में शामिल होता है तो उसे दो ऐसे विकल्प दिए जाते हैं, जिन्हें बदला नहीं जा सकता: या तो वह अपनी मौजूदा पेंशन लेना जारी रखे और अपनी DSC सेवा को एक अलग सेवा माने, जिसके लिए दूसरी पेंशन पाने हेतु 15 साल की वास्तविक सेवा ज़रूरी होगी; या फिर वह पेंशन लेना बंद कर दे, अब तक मिली पेंशन लौटा दे और अपनी पिछली सेवा को एक ही संयुक्त पेंशन के लिए गिनाए।

    इस बैच के सभी याचिकाकर्ताओं ने पहला विकल्प चुना था, यानी अपनी नियमित सेना पेंशन लेना जारी रखना। साथ ही अपनी DSC सेवा से एक अलग दूसरी पेंशन की मांग करना। हालांकि, कई लोग DSC की तय 15 साल की सेवा पूरी करने से कुछ दिन से लेकर कई महीनों तक पीछे रह गए।

    याचिकाकर्ताओं ने पेंशन नियमों के तहत सेवा को राउंड-ऑफ करने (3-6 महीनों को आधा साल मानने) और 12 महीनों तक की कमी को माफ़ करने की मांग की।

    भारत सरकार ने इसका विरोध करते हुए तर्क दिया कि DSC नियमों के अनुसार 15 साल की वास्तविक सेवा ज़रूरी है और कमी को माफ़ करने का नियम केवल एक ही पेंशन पर लागू होता है। इसके लिए उन्होंने 2017 और 2022 में जारी किए गए उन सरकारी पत्रों का हवाला दिया जिनमें दूसरी पेंशन के लिए इस तरह के लाभ पर रोक लगाई गई।

    विभिन्न हाईकोर्ट और ट्रिब्यूनलों द्वारा DSC कर्मियों के दावे को सही ठहराने के फ़ैसलों से असंतुष्ट होकर भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

    फ़ैसला

    विवादित फ़ैसलों को सही ठहराते हुए जस्टिस मनमोहन द्वारा लिखे गए फ़ैसले में यह टिप्पणी की गई कि "DSC में सेवा का दूसरा दौर, नियमित सेना में सेवा के पहले दौर से अलग और भिन्न है।" इसलिए दूसरी पेंशन देने के लिए DSC सेवा में कमी को राउंड-ऑफ करने और माफ़ करने के फ़ैसले को सही ठहराया गया।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    "इसलिए DSC सेवा में कमी को माफ़ करना सेना नियमों की योजना के पूरी तरह से अनुरूप है और इससे कोई असंगति पैदा नहीं होती है।"

    कोर्ट ने भारत सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया कि कमी को माफ़ करने का नियम DSC पेंशन पर लागू नहीं होता। इसके बजाय कोर्ट ने यह माना कि पेंशन नियमों के तहत कमी को माफ़ करने के सामान्य प्रावधान DSC सेवा पर पूरी तरह से लागू होते हैं। इसलिए दूसरी पेंशन के दावे को खारिज करने का कोई आधार नहीं है।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “सेवा में कमी की माफ़ी से जुड़े प्रावधानों और DSC सेवा से संबंधित प्रावधानों के बीच किसी भी तरह के विरोधाभास के अभाव में अपीलकर्ताओं के लिए यह तर्क देना उचित नहीं है कि 1961 के विनियमों का पैराग्राफ 125 और 2008 के विनियमों का पैराग्राफ 44—जो स्पष्ट रूप से सेवा में कमी की माफ़ी का प्रावधान करते हैं—DSC कर्मियों पर लागू नहीं होते हैं।”

    तदनुसार, भारत संघ की सभी अपीलें खारिज कर दी गईं, जबकि DSC कर्मियों के दूसरी पेंशन के अधिकार को बरकरार रखा गया और संघ को सेवा की अवधि की पुनर्गणना करने तथा लाभ प्रदान करने के निर्देश दिए गए।

    Cause Title: UNION OF INDIA & ORS. VERSUS BALAKRISHNAN MULLIKOTE (EX HAV 256812 M) (with connected appeals)

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