सिर्फ ₹1 मुआवज़े पर संपत्ति अधिग्रहण मनमाना: सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक लाइब्रेरी अधिग्रहण वाला बिहार कानून रद्द किया

Praveen Mishra

11 March 2026 4:04 PM IST

  • सिर्फ ₹1 मुआवज़े पर संपत्ति अधिग्रहण मनमाना: सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक लाइब्रेरी अधिग्रहण वाला बिहार कानून रद्द किया

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (10 मार्च) को बिहार के उस कानून को रद्द कर दिया, जिसके तहत राज्य सरकार को एक ऐतिहासिक पुस्तकालय को केवल एक रुपये के प्रतीकात्मक मुआवज़े पर अपने नियंत्रण में लेने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने कहा कि ऐसा प्रावधान “जब्ती जैसा (confiscatory)” है और संविधान की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत राज्य कानून के आधार पर संपत्ति से वंचित कर सकता है, लेकिन ऐसा कानून न्यायसंगत, निष्पक्ष और तर्कसंगत होना चाहिए। यदि किसी कानून के तहत संपत्ति अधिग्रहण के बदले केवल प्रतीकात्मक मुआवज़ा दिया जाता है, तो उसमें निष्पक्षता के मूल तत्व ही नहीं रहते और वह मनमाना तथा जब्ती जैसा हो जाता है।

    अदालत ने इस मामले में पटना हाईकोर्ट के उस फैसले को भी रद्द कर दिया, जिसमें इस कानून को वैध माना गया था।

    मामला क्या था

    यह मामला “श्रीमती राधिका सिन्हा इंस्टीट्यूट और सच्चिदानंद सिन्हा लाइब्रेरी (रिक्विज़िशन एंड मैनेजमेंट) अधिनियम, 2015” से जुड़ा है। इस कानून के जरिए बिहार सरकार ने 1924 में स्थापित इस ऐतिहासिक पुस्तकालय के प्रबंधन और संपत्ति को अपने नियंत्रण में ले लिया था।

    यह पुस्तकालय भारत की संविधान सभा के पहले अस्थायी अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा ने अपनी पत्नी श्रीमती राधिका सिन्हा की स्मृति में स्थापित किया था। यह संस्था एक ट्रस्ट के माध्यम से संचालित होती थी और इसमें सिन्हा की निजी पुस्तकों का बड़ा संग्रह भी शामिल था।

    कानून की धारा 7 के तहत राज्य सरकार को अधिकार दिया गया था कि वह इस संस्थान और उसकी संपत्ति के अधिग्रहण के बदले अधिकतम एक रुपये तक का मुआवज़ा दे सकती है।

    सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस कानून में दो प्रमुख समस्याएं हैं—

    सरकार ने बिना किसी जांच के ट्रस्ट और संस्थान का पूरा प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया, जबकि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं था कि संस्था को छोड़ दिया गया था, उसका उद्देश्य विफल हो गया था या उसमें कुप्रबंधन था।

    मुआवज़े के लिए कोई स्पष्ट सिद्धांत या मानदंड तय नहीं किए गए, और भुगतान को केवल एक रुपये तक सीमित कर दिया गया, जो पूरी तरह मनमाना और प्रतीकात्मक है।

    अदालत ने कहा कि इस तरह का प्रावधान सरकार को असीमित और बिना दिशा-निर्देश वाली शक्ति देता है और वास्तविक मुआवज़े को केवल औपचारिकता बना देता है।

    कोर्ट का फैसला

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यद्यपि अनुच्छेद 300A के तहत कानून द्वारा संपत्ति का अधिग्रहण संभव है, लेकिन वह कानून निष्पक्ष, उचित और गैर-जब्ती प्रकृति का होना चाहिए।

    चूंकि बिहार का यह कानून इन संवैधानिक मानकों पर खरा नहीं उतरता, इसलिए अदालत ने इसे असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया।

    साथ ही अदालत ने आदेश दिया कि ट्रस्ट और पुस्तकालय का प्रबंधन तथा प्रशासन उसी स्थिति में बहाल किया जाए, जैसा कि इस कानून के लागू होने से पहले था।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

    Next Story