13 साल से कोमा में पड़े युवक को सम्मानजनक मृत्यु की अनुमति: सुप्रीम कोर्ट ने जीवनरक्षक उपचार हटाने की दी इजाजत
Amir Ahmad
11 March 2026 12:17 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दी। अदालत ने 13 वर्षों से स्थायी वनस्पति अवस्था में पड़े 32 वर्षीय युवक के जीवनरक्षक उपचार हटाने की इजाजत दी।
जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह आदेश युवक के पिता की उस याचिका पर दिया, जिसमें उन्होंने अपने बेटे के सभी जीवनरक्षक उपचार बंद करने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने कहा कि गरिमा के साथ मृत्यु भी व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि हरीश राणा कभी एक होनहार युवक था लेकिन चार मंजिला इमारत से गिरने के बाद उसे गंभीर मस्तिष्क चोट लगी और वह पिछले 13 साल से स्थायी वनस्पति अवस्था में है। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार उसकी स्थिति में इतने वर्षों में कोई सुधार नहीं हुआ।
अदालत ने कहा कि वह केवल मेडिकल रूप से दी जाने वाली पोषण व्यवस्था के सहारे जीवित है, जो पेट में डाली गई नली के जरिए दी जा रही है। पीठ ने माना कि यह भी एक मेडिकल उपचार है, जिसे उचित परिस्थितियों में हटाया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि मरीज की स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं है और उपचार जारी रखने से केवल उसकी जैविक मौजूदगी लंबी हो रही है जबकि कोई मेडिकल लाभ नहीं मिल रहा। प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड तथा माता-पिता सभी इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि यह उपचार जारी रखना मरीज के हित में नहीं है।
खंडपीठ ने निर्देश दिया कि जीवनरक्षक उपचार और मेडिकल पोषण व्यवस्था को हटाया जाए। इसके लिए 30 दिन की पुनर्विचार अवधि भी समाप्त कर दी गई। अदालत ने यह भी कहा कि मरीज को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के उपशामक देखभाल केंद्र में भर्ती कराया जाएगा, जहां गरिमा के साथ जीवनरक्षक प्रणाली हटाने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
अदालत ने सभी राज्यों के हाइकोर्ट से कहा कि वे अपने-अपने क्षेत्राधिकार में न्यायिक मजिस्ट्रेटों को निर्देश जारी करें कि अस्पतालों से मिलने वाली सूचनाओं को स्वीकार करें जब प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड जीवनरक्षक उपचार हटाने पर सहमत हों। साथ ही केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया कि हर जिले के मुख्य मेडिकल अधिकारी ऐसे डॉक्टरों का पैनल तैयार रखें, जिन्हें द्वितीयक मेडिकल बोर्ड में शामिल किया जा सके।
पीठ ने केंद्र सरकार से इस विषय पर व्यापक कानून बनाने की भी सिफारिश की।
जस्टिस पारदीवाला ने अपने फैसले में युवक के माता-पिता की सराहना करते हुए कहा,
“उसका परिवार कभी उसके साथ से नहीं हटा। किसी से प्रेम करना सबसे कठिन समय में भी उसकी देखभाल करना है।”
यह फैसला 2018 के कॉमन कॉज बनाम भारत संघ मामला में दिए गए दिशा-निर्देशों के आधार पर दिया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को मान्यता दी थी और निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए प्रक्रिया तय की थी।
इस मामले में पहले 2024 में दिल्ली हाइकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज की थी कि मरीज अंतिम अवस्था की बीमारी से ग्रस्त नहीं है। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और विस्तृत मेडिकल जांच के बाद अब यह ऐतिहासिक आदेश दिया गया।

