राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल लगाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास, राज्य केवल अन्य सड़कों पर ही टोल लगा सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

4 April 2026 9:06 PM IST

  • राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल लगाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास, राज्य केवल अन्य सड़कों पर ही टोल लगा सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज की। इस याचिका में राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल टैक्स लगाने की केंद्र सरकार की शक्ति को चुनौती दी गई। कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि इस तरह के शुल्क संविधान के तहत 'संघ सूची' (Union List) के दायरे में आते हैं।

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) द्वारा राष्ट्रीय राजमार्गों के उपयोग के लिए वसूला जाने वाला टोल, सूची I (संघ सूची) की प्रविष्टि 23 (संसद द्वारा बनाए गए कानून के तहत राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित किए गए राजमार्ग) और प्रविष्टि 96 (संघ सूची में शामिल किसी भी विषय के संबंध में शुल्क) के तहत आने वाला एक शुल्क है।

    कोर्ट ने कहा,

    "भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची I की प्रविष्टि 23 और प्रविष्टि 96 के मूल तत्व (Pith and Substance) को ध्यान में रखते हुए हम पाते हैं कि कोई भी टोल—जो मूल रूप से भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा राष्ट्रीय राजमार्गों के उपयोग के लिए वसूला जाने वाला एक शुल्क या फीस है—पूरी तरह से 'संघ सूची' के दायरे में आता है।"

    कोर्ट ने कहा कि सूची II (राज्य सूची) की प्रविष्टि 59 के तहत 'टोल' शब्द का दायरा केवल उन शुल्कों तक ही सीमित होना चाहिए, जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा सूची I के तहत नहीं वसूला जाता है। दूसरे शब्दों में, राज्य केवल उन्हीं राजमार्गों या सड़कों पर टोल लगा सकते हैं, जो राष्ट्रीय राजमार्ग नहीं हैं।

    कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका खारिज की। मद्रास हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल वसूली की व्यवस्था की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाकर्ता की अपील को पहले ही खारिज कर दिया था।

    हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता ने यह घोषणा किए जाने की मांग की थी कि 'राष्ट्रीय राजमार्ग शुल्क (दर निर्धारण और वसूली) नियम, 2008' का नियम 8 असंवैधानिक है। याचिकाकर्ता ने इसके पीछे तर्क दिया कि इस नियम को बनाने के लिए विधायी क्षमता का अभाव था और इसमें शक्तियों का अत्यधिक प्रत्यायोजन (Excessive Delegation) किया गया।

    याचिकाकर्ता ने यह तर्क भी दिया कि टोल लगाने की शक्ति विशेष रूप से सूची II की प्रविष्टि 59 के तहत राज्यों के पास निहित है। इसलिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण या उसके रियायतग्राहियों (Concessionaires) द्वारा टोल की वसूली करना असंवैधानिक है।

    7 अगस्त, 2025 को हाईकोर्ट ने इस रिट याचिका को खारिज किया था। इसमें यह माना गया कि एक बार किसी सड़क को राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित कर दिए जाने के बाद सूची I की प्रविष्टि 23 के तहत विधायी अधिकार संघ के पास चला जाता है और संसद को प्रविष्टि 96 के तहत शुल्क लगाने का अधिकार मिल जाता है।

    हाईकोर्ट ने माना कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर लगने वाला टोल, संघ के विषय पर लगने वाला शुल्क है, जबकि सूची II की प्रविष्टि 59, राज्य की सड़कों, पुलों और घाटों पर लगने वाले टोल पर लागू होती है।

    हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की भी जांच की, जिसमें धारा 7, 8A और 9 शामिल हैं। साथ ही 2008 के नियमों को बनाने तथा शुल्क संग्रह को अधिकृत करने के केंद्र सरकार के अधिकार को सही ठहराया—जिसमें रियायत पाने वालों (Concessionaires) के माध्यम से शुल्क संग्रह भी शामिल है। कोर्ट को नियम 8 में कोई कमी नहीं मिली, जो टोल प्लाज़ा के स्थान को विनियमित करता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क की पुष्टि करते हुए SLP खारिज की।

    Case Title – T S R Venkatramana v. Union of India & Ors.

    Next Story