Bihar Special Courts Act | अवैध संपत्ति वाले सरकारी कर्मचारी की मौत के बाद भी पत्नी के खिलाफ ज़ब्ती की कार्रवाई जारी रह सकती है: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

21 March 2026 9:19 PM IST

  • Bihar Special Courts Act | अवैध संपत्ति वाले सरकारी कर्मचारी की मौत के बाद भी पत्नी के खिलाफ ज़ब्ती की कार्रवाई जारी रह सकती है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस सरकारी अधिकारी ने अपनी आय से ज़्यादा संपत्ति जमा की हो, उसकी मौत के बाद भी बिहार स्पेशल कोर्ट एक्ट, 2009 के तहत उसकी पत्नी (जो सरकारी कर्मचारी नहीं है) के खिलाफ ज़ब्ती की कार्रवाई जारी रखी जा सकती है।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने पटना हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें कहा गया कि आरोपी अधिकारी की मौत के बाद बिहार स्पेशल कोर्ट एक्ट, 2009 के तहत उसकी पत्नी के खिलाफ ज़ब्ती की कार्रवाई खत्म हो गई।

    हाईकोर्ट की टिप्पणी से असहमति जताते हुए बेंच ने कहा कि जब शुरुआती मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13 और IPC की धारा 107 (अपराध में मदद करना) के तहत दर्ज किया जाता है तो आरोपी अधिकारी की मौत के बाद भी उसकी पत्नी (जो सरकारी कर्मचारी नहीं है) के खिलाफ ज़ब्ती की कार्रवाई जारी रखी जा सकती है।

    कोर्ट ने P. Nallammal बनाम State, (1999) 6 SCC 559 मामले का हवाला देते हुए कहा,

    "(आरोपी अधिकारी की) मौत से उसकी पत्नी (प्रतिवादी) को 'छूट' नहीं मिलेगी, क्योंकि अधिकारियों को जब से अधिकारी के कथित गलत कामों के बारे में पता चला, तभी से उसकी कथित तौर पर अवैध रूप से अर्जित संपत्ति रखने के आरोप में पत्नी के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू कर दी गई। इसके अलावा, हम यह भी कहना चाहेंगे कि कानून में यह बात तय है कि जब शुरुआती मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 के तहत IPC की धारा 107 के आधार पर दर्ज किया जाता है तो सरकारी कर्मचारी न होने पर भी किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।"

    मामले की पृष्ठभूमि

    यह मामला बिहार सरकार द्वारा रविंद्र प्रसाद सिंह नाम के सरकारी अधिकारी के खिलाफ शुरू की गई सतर्कता जांच से जुड़ा है। रविंद्र प्रसाद सिंह पर 1975 से 2009 के बीच अपनी आय से ज़्यादा संपत्ति जमा करने का आरोप था। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 और भारतीय दंड संहिता के तहत दो FIR दर्ज की गईं। इन FIR में आरोप लगाया गया कि उन्होंने ₹12.96 लाख से ज़्यादा की अवैध संपत्ति जमा की, जिसमें कई अचल संपत्तियां और वित्तीय निवेश भी शामिल थे। जांच के बाद 2009 में एक चार्जशीट दायर की गई। इसके बाद बिहार स्पेशल कोर्ट एक्ट, 2009 के तहत संपत्तियों की ज़ब्ती की कार्यवाही शुरू की गई। न केवल आरोपी अधिकारी को, बल्कि उनकी पत्नी सुधा सिंह को भी नोटिस जारी किए गए, जिनके नाम पर कई संपत्तियां थीं।

    2013 में अधिकृत अधिकारी ने विभिन्न चल और अचल संपत्तियों को ज़ब्त करने का यह पाते हुए आदेश दिया कि पत्नी द्वारा दावा की गई आय और निवेश—जो कथित तौर पर सिलाई और टेलरिंग के काम से हुई—के समर्थन में कोई विश्वसनीय सबूत नहीं थे। प्राधिकरण ने सेवा नियमों के पालन न होने का भी संज्ञान लिया, जिनके तहत सरकारी कर्मचारी के लिए अपनी संपत्तियों का खुलासा करना अनिवार्य होता है।

    ज़ब्ती की इस कार्यवाही को दिवंगत दोषी अधिकारी और उनकी पत्नी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। अपील के लंबित रहने के दौरान, दोषी अधिकारी का निधन हो गया, जिसके परिणामस्वरूप हाईकोर्ट द्वारा पत्नी के खिलाफ ज़ब्ती की कार्यवाही समाप्त (Abated) कर दी गई।

    हाईकोर्ट के इस निर्णय से व्यथित होकर बिहार राज्य ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

    निर्णय

    विवादास्पद निर्णय रद्द करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में यह टिप्पणी की गई कि चूंकि प्रतिवादी-पत्नी को भी शुरुआत में ही दोषी अधिकारी के साथ नोटिस जारी किया गया। इसके अलावा, बिहार स्पेशल कोर्ट एक्ट किसी भी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने से नहीं रोकता है, जिसके पास कथित तौर पर भ्रष्ट साधनों से अर्जित संपत्ति हो—जिसमें परिवार के सदस्य भी शामिल हैं—अतः प्रतिवादी के खिलाफ ज़ब्ती की कार्यवाही जारी रखी जा सकती है।

    न्यायालय ने टिप्पणी की,

    "BSCA की धारा 15 स्वयं यह प्रावधान करती है कि ज़ब्ती का आदेश दोषी अधिकारी, या किसी अन्य ऐसे व्यक्ति को सुनने के बाद ही दिया जाएगा, जिसके पास विचाराधीन संपत्ति या धन मौजूद है। जब यह प्रावधान है कि इस समीकरण में शामिल 'अन्य व्यक्ति' पर भी तब तक मुकदमा चलाया जा सकता है, जब तक कि अवैध रूप से अर्जित संपत्ति या धन को वापस न ले लिया जाए तो इसकी स्पष्ट आवश्यकता केवल इतनी है कि कार्यवाही शुरू करते समय, जिस व्यक्ति के खिलाफ PC Act की धारा 13 के तहत कार्यवाही शुरू की जानी है, वह जीवित होना चाहिए और उसे ऐसी कार्यवाही के बारे में नोटिस दिया गया होना चाहिए। ऐसे व्यक्ति की मृत्यु इस तथ्य को समाप्त नहीं कर देती कि ज़ब्ती का आदेश पक्षों को सुनने के बाद ही दिया गया।"

    प्रतिवादी ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए यह तर्क दिया कि चूंकि BSCA के तहत किसी 'विधिक प्रतिनिधि' (Legal Representative) को प्रतिस्थापित करने की अनुमति नहीं है, इसलिए उनके खिलाफ ज़ब्ती की कार्यवाही समाप्त मानी जानी चाहिए।

    इस तर्क को खारिज करते हुए न्यायालय ने टिप्पणी की,

    “यह दलील पूरी तरह से भ्रामक है, क्योंकि कार्यवाही की शुरुआत में ही, दोषी अधिकारी के साथ-साथ प्रतिवादी को भी नोटिस जारी किया गया।”

    तदनुसार, अपील स्वीकार की गई और प्रतिवादी की अपील को गुण-दोष के आधार पर निर्णय हेतु हाईकोर्ट की पत्रावली में पुनः शामिल कर लिया गया।

    Cause Title: THE STATE OF BIHAR THR. VIGILANCE Versus SUDHA SINGH (with connected case)

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