हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
Shahadat
13 Sept 2026 8:00 AM IST

देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (07 सिंतबर, 2026 से 11 सितंबर, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
RTE Act | नियुक्ति के समय TET नहीं था 31 मार्च 2015 से पहले पास किया तो नहीं जाएगी नौकरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE Act) के तहत महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि नियुक्ति के समय शिक्षक के पास शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की योग्यता नहीं थी लेकिन उसने कानून में दी गई समय-सीमा के भीतर TET पास कर लिया तो उसकी नियुक्ति को केवल इस आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने कहा कि RTE Act 2009 की धारा 23 में दी गई सुरक्षा को नजरअंदाज करके राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की अधिसूचना के आधार पर शिक्षक की सेवा समाप्त नहीं की जा सकती। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता ने 31 मार्च 2015 की निर्धारित समय-सीमा से पहले वर्ष 2014 में TET पास कर लिया था इसलिए उसकी नियुक्ति कानून के तहत सुरक्षित है।
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यूपी सरकार 'दमन के हथियार' के तौर पर इस्तेमाल कर रही है 'गुंडा एक्ट': इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 'गुंडा एक्ट' के इस्तेमाल की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि उसके सामने आए कई मामलों से पता चलता है कि राज्य सरकार 'गुंडा एक्ट' का इस्तेमाल 'दमन के हथियार' के तौर पर करने की अपनी नीति पर अड़ी हुई।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने गोंडा के निवासी के खिलाफ जारी आदेशों को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। इन आदेशों में उसे 'यूपी कंट्रोल ऑफ़ गुंडाज़ एक्ट, 1970' के तहत 'गुंडा' घोषित किया गया और छह महीने के लिए गोंडा जिले से बाहर रहने का आदेश दिया गया।
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बार एसोसिएशन की सदस्यता का विवाद निजी मामला, रिट क्षेत्राधिकार में नहीं आता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बार एसोसिएशन की सदस्यता, निलंबन या किसी सदस्य को संगठन से बाहर करने से जुड़े विवाद मूल रूप से निजी प्रकृति के होते हैं और ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दाखिल नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बार एसोसिएशन और उसके सदस्यों के बीच ऐसे विवाद में कोई सार्वजनिक कानून का तत्व शामिल नहीं होता।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अब्देश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी लखीमपुर खीरी जिले की तहसील गोला गोकर्णनाथ स्थित सेंट्रल बार एसोसिएशन के एक वकील सदस्य की याचिका खारिज करते हुए की।
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सहारनपुर मस्जिद विध्वंस | हाईकोर्ट ने बेदखली के खिलाफ याचिका पर यूपी सरकार से जवाब मांगा, ₹6.41 करोड़ के हर्जाने की वसूली पर रोक लगाई
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहारनपुर में मस्जिद को गिराने और वहां से बेदखल करने के खिलाफ दायर याचिका पर राज्य सरकार से जवाब मांगा। साथ ही कोर्ट ने सहारनपुर के सिटी मजिस्ट्रेट द्वारा लगाए गए ₹6.41 करोड़ के हर्जाने की वसूली पर रोक लगाई।
जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की बेंच ने राज्य सरकार को 3 हफ़्ते के अंदर अपना जवाब (काउंटर-एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता को जवाब का जवाब (रिज़ॉइंडर) दाखिल करने के लिए 1 हफ़्ते का समय दिया गया।
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किराएदार के खिलाफ बेदखली मुकदमे में स्वतंत्र मालिकाना हक जताने वाला तीसरा व्यक्ति जरूरी पक्षकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किराए की संपत्ति पर स्वतंत्र मालिकाना हक का दावा करने वाला तीसरा व्यक्ति केवल इसलिए स्मॉल कॉज कोर्ट में बेदखली के मुकदमे का जरूरी या उचित पक्षकार नहीं बन जाता, क्योंकि उसका दावा मकान मालिक के मालिकाना हक से टकराता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1 नियम 10 के तहत किसी तीसरे व्यक्ति को पक्षकार बनाने की प्रक्रिया का इस्तेमाल सीमित अधिकार क्षेत्र वाली बेदखली कार्यवाही में अलग मालिकाना विवाद लाने के लिए नहीं किया जा सकता।
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विनेश फोगाट को दिल्ली हाईकोर्ट से झटका, वर्ल्ड चैंपियनशिप ट्रायल में शामिल होने की अंतरिम अनुमति नहीं
पहलवान विनेश फोगाट को 2026 सीनियर वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप के भारतीय टीम चयन ट्रायल में शामिल होने के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट से अंतरिम राहत नहीं मिली। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने 14 सितंबर को होने वाले महिला चयन ट्रायल में शामिल होने के लिए पात्रता मानदंड से अंतरिम छूट देने से इनकार किया।
कोर्ट ने कहा कि 7 सितंबर 2026 के भारतीय कुश्ती महासंघ के परिपत्र में तय पात्रता मानदंड सभी खिलाड़ियों पर समान रूप से लागू होते हैं और निर्धारित प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं लेने वाला खिलाड़ी, कारण चाहे जो भी हो, तय पात्रता श्रेणियों में नहीं आता।
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'साफ़ तौर पर अवैध ढांचा': दिल्ली हाईकोर्ट ने नर्सरी स्कूल की ज़मीन पर अवैध रूप से बने मंदिर को हटाने का आदेश दिया
दिल्ली हाईकोर्ट ने नर्सरी स्कूल के लिए तय ज़मीन पर बने मंदिर को रेगुलर करने की मांग वाली याचिका खारिज की। कोर्ट ने कहा कि मंदिर बिना मंज़ूरी के और सरकारी ज़मीन के निपटारे से जुड़े नियमों के खिलाफ बनाया गया। जस्टिस जसमीत सिंह ने कहा कि मंदिर "साफ़ तौर पर एक अवैध ढांचा" था और इसे उस ज़मीन पर बने रहने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।
Case title: Sanmati Sabha (Regd.) v. Delhi Development Authority & Ors.
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अगर तलाकशुदा पत्नी ने दोबारा शादी नहीं की तो वह गुज़ारा-भत्ता का दावा कर सकती है: कलकत्ता हाईकोर्ट
कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि पति द्वारा हासिल किया गया तलाक का एकतरफ़ा आदेश (ex parte decree) अपने आप में उसकी पूर्व पत्नी का भरण-पोषण करने की कानूनी ज़िम्मेदारी को खत्म नहीं करता, बशर्ते पत्नी ने दोबारा शादी न की हो और वह अपना खर्च उठाने में असमर्थ हो।
साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि एक अविवाहित बेटी, जो CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की याचिका दायर करने से पहले ही बालिग हो चुकी है और जिसे कोई शारीरिक या मानसिक अक्षमता नहीं है, वह इस प्रावधान के तहत भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती।
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मुस्लिम व्यक्ति की दूसरी शादी 'अमान्य' नहीं, IPC की धारा 494 के तहत दो शादियां करने का अपराध नहीं बनता: तेलंगाना हाईकोर्ट
तेलंगाना हाईकोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में पक्ष मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आते हैं, वहां किसी व्यक्ति की दूसरी शादी सिर्फ़ इसलिए "अमान्य" नहीं मानी जाएगी कि उसकी पहली शादी अभी भी कायम है। इसलिए IPC की धारा 494 के तहत बिगैमी का अपराध नहीं बनेगा।
जस्टिस एन. तुकारामजी की सिंगल जज बेंच ने मुस्लिम व्यक्ति के खिलाफ बिगैमी की कार्यवाही रद्द की, क्योंकि उन्हें लगा कि IPC की धारा 494 के लिए ज़रूरी शर्तें पूरी नहीं हो रही थीं।
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पति को माता-पिता से अलग रहने के लिए मजबूर करना और बिना वजह बार-बार मायके जाना क्रूरता: मद्रास हाईकोर्ट
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि पत्नी यह जानते हुए भी कि उसका पति अपने माता-पिता का इकलौता बेटा है, उसे संयुक्त परिवार से अलग होकर अलग घर बसाने के लिए मजबूर करती है और बिना उचित कारण बार-बार मायके जाती है, तो यह पति के प्रति वैवाहिक क्रूरता (Cruelty) माना जा सकता है।
जस्टिस पीटी आशा और जस्टिस एन. माला की पीठ ने इसी आधार पर फैमिली कोर्ट द्वारा पति को दिए गए तलाक के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और पत्नी की अपील खारिज कर दी।
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भारत में तलाक-ए-हसन वैध, असम के कानून के तहत कराना होगा रजिस्ट्रेशन: गुवाहाटी हाईकोर्ट
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक-ए-हसन भारत में फिलहाल वैध तलाक का एक रूप है और प्रतिबंधित नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि असम में इस तरह के तलाक का रजिस्ट्रेशन 2024 के असम अनिवार्य मुस्लिम विवाह एवं तलाक पंजीकरण अधिनियम के तहत संबंधित विवाह एवं तलाक रजिस्ट्रार के समक्ष कराया जा सकता है।
जस्टिस अरुण देव चौधरी ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें एक पति ने बारपेटा के उप-पंजीयक-सह-विवाह एवं तलाक रजिस्ट्रार द्वारा तलाक-ए-हसन के पंजीकरण से इनकार किए जाने को चुनौती दी थी।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बुजुर्ग की जान और सुरक्षा बचाने के लिए बच्चों को घर से निकाल सकता है ट्रिब्यूनल
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत गठित ट्रिब्यूनल, बुजुर्ग की जान और सुरक्षा की रक्षा के लिए असाधारण परिस्थितियों में उसके साथ रहने वाले बच्चों या रिश्तेदारों को संपत्ति से बाहर करने का आदेश दे सकता है। हालांकि, यह शक्ति असीमित नहीं है और इसे केवल भरण-पोषण तथा सुरक्षा के अधिकार के हिस्से के तौर पर, बहुत कम और आवश्यक मामलों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
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Facebook India आवश्यक पक्षकार नहीं, Meta ही Facebook को नियंत्रित करती है: गुहाटी हाईकोर्ट
गौहाटी हाईकोर्ट ने कहा है कि Facebook पर कथित मानहानिकारक सामग्री से जुड़े मुकदमे में Facebook India आवश्यक पक्षकार नहीं है, क्योंकि Facebook सेवा को Meta नियंत्रित करती है और Meta पहले से ही मामले में पक्षकार है। जस्टिस सुस्मिता फुकन खौंड ने कहा कि Facebook India न तो Facebook सेवा का संचालन या नियंत्रण करती है, न किसी सर्वर की मालिक या संचालक है और न ही प्लेटफॉर्म पर मौजूद सामग्री को होस्ट करती है।
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पुलिस अधिकारी के बयान के आधार पर खबर छापने वाले रिपोर्टर पर मानहानि का केस नहीं चलेगा: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई रिपोर्टर किसी पुलिस अधिकारी के बयान के आधार पर खबर छापता है, तो उस पर आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता, क्योंकि रिपोर्टर ने बस वही बताया जो अधिकारी ने कहा था। कोर्ट ने माना कि प्रतिवादी "सिर्फ एक रिपोर्टर" है, जिसने SDPO की बात छापी और "खबर छापना रिपोर्टर के अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात है। इसके लिए उस पर कोई आपराधिक जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।"
जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय और जस्टिस अरुण कुमार राय की डिवीजन बेंच, देवघर के सेशन जज के 26.09.2011 के फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई कर रही थी। सेशन जज ने IPC की धारा 500 के तहत प्रतिवादियों की सजा रद्द कर दी थी।
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माता-पिता की आपत्ति के बावजूद वयस्क महिला जैन साध्वी बनने के लिए स्वतंत्र: एमपी हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 20 वर्षीय महिला को राहत देते हुए कहा कि वयस्क होने के नाते वह अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार जीवन जीने के लिए स्वतंत्र है। कोर्ट ने कहा कि भारत की नागरिक और 18 वर्ष से अधिक उम्र की महिला को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार धर्म का पालन करने का अधिकार है और उसके इस फैसले में किसी को भी जबरन हस्तक्षेप की अनुमति नहीं दी जा सकती।
जस्टिस संदीप एन. भट्ट ने यह आदेश उस याचिका पर दिया, जिसमें महिला ने अपने माता-पिता और रिश्तेदारों की कथित दबावपूर्ण कार्रवाई से सुरक्षा मांगी थी। महिला ने कहा था कि वह सांसारिक जीवन त्यागकर जैन साध्वी बनना चाहती है और श्वेतांबर जैन धर्म के अनुसार दीक्षा लेना चाहती है।
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सिर्फ आपराधिक मुकदमा दर्ज होना पुलिस सेवा के लिए अयोग्य नहीं बनाता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी उम्मीदवार के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज होने मात्र से उसे पुलिस सेवा में नियुक्ति के लिए स्वतः अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। उम्मीदवार की योग्यता का आकलन मामले की प्रकृति और उससे जुड़ी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने राज्य सरकार की विशेष अपील खारिज करते हुए कहा कि केवल मुकदमा दर्ज होने के आधार पर उम्मीदवार को यांत्रिक ढंग से सेवा से बाहर नहीं किया जा सकता।
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पत्नी का साथ रहने से इनकार और पति पर झूठा केस करना क्रूरता: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि पत्नी द्वारा पति के साथ सहवास से इनकार करना और उसके खिलाफ झूठा आपराधिक मामला दर्ज कराना वैवाहिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने इसी आधार पर पति को तलाक की डिक्री देते हुए विवाह समाप्त कर दिया। जस्टिस इंदरजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ फैमिली कोर्ट द्वारा पति की तलाक याचिका खारिज किए जाने के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी।
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हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता के दावे पर तलाक के आदेश से रोक नहीं लगती: एमपी हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक का आदेश (डिक्री) पहले ही पारित हो चुका है तो भी यह बात किसी जीवनसाथी को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता मांगने से नहीं रोकती। [2026 LiveLaw (MP) 357] कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक मामलों की सुनवाई करने वाली अदालत तलाक के आदेश के बाद भी स्थायी गुजारा भत्ते की अर्जी पर विचार करने के लिए सक्षम है।
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UP Ceiling Act | कानूनी कार्यवाही के दौरान ज़मीन का ट्रांसफर अमान्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अतिरिक्त ज़मीन तय करने की कार्यवाही के दौरान किया गया ज़मीन का ट्रांसफर, U.P. Imposition of Ceiling on Land Holdings Act, 1960 की धारा 5(8) के तहत अमान्य है। कोर्ट ने कहा कि तय अधिकारी (Prescribed Authority) एक्ट की धारा 12-A के तहत ज़मीन के मालिक की पसंद को मानकर ऐसे ट्रांसफर को वैध नहीं ठहरा सकता।
U.P. Imposition of Ceiling on Land Holdings Act, 1960 की धारा 5(6) में कहा गया है कि 24 जनवरी 1971 के बाद किए गए ट्रांसफर को आम तौर पर ज़मीन के मालिक पर लागू होने वाली सीलिंग सीमा तय करते समय नज़रअंदाज़ किया जाना चाहिए, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि ट्रांसफर नेक नीयती से और उचित कीमत पर एक ऐसे दस्तावेज़ के ज़रिए किया गया, जिसे बदला नहीं जा सकता, और यह बेनामी लेन-देन नहीं है या ज़मीन के मालिक या उसके परिवार के सदस्यों के फ़ायदे के लिए नहीं है।
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सेवा रिकॉर्ड में दो साल की समयसीमा के बाद जन्मतिथि नहीं बदली जा सकती: हिमाचल हाईकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारी के सेवा रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि में सुधार के लिए सेवा नियमों में तय समयसीमा का सख्ती से पालन करना होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महज समानता या न्यायसंगत आधार के नाम पर निर्धारित अवधि बीत जाने के बाद जन्मतिथि में सुधार की अनुमति नहीं दी जा सकती।
जस्टिस राकेश कैन्थला ने कहा कि जन्मतिथि में बदलाव के लिए समयसीमा तय करने वाले नियमों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। यदि नियम में प्रविष्टि सुधारने के लिए दो साल की अवधि निर्धारित है, तो अदालतें किसी भी समानतापूर्ण आधार पर इस अवधि को बढ़ाकर दो साल के बाद सुधार की अनुमति नहीं दे सकतीं।
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सरकारी कर्मचारी ने दूसरी शादी की तो दूसरी पत्नी को अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार नहीं: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति का दावा नहीं कर सकती यदि कर्मचारी ने सेवा में रहते हुए दूसरी शादी के लिए आचरण नियमों के तहत सरकार से अनुमति नहीं ली थी। दूसरी शादी संबंधित समुदाय की प्रथा के तहत वैध मानी जाती हो तब भी सेवा नियमों में निर्धारित अनुमति की अनिवार्यता खत्म नहीं होती।
चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने दूसरी पत्नी की ओर से दायर अपील खारिज करते हुए सिंगल जज का फैसला बरकरार रखा।
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तलाकशुदा पुरुष से शादी करने वाली महिला तलाक के आदेश की पुष्टि न करने तक मेंटेनेंस का दावा नहीं कर सकती: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ बेंच ने कहा कि जो महिला जानबूझकर किसी ऐसे पुरुष से शादी करती है, जिसे वह तलाकशुदा मानती है, वह CrPC की धारा 125 के तहत गुजारा-भत्ते का दावा नहीं कर सकती, अगर उसने यह पुष्टि नहीं की कि तलाक का आदेश अंतिम हो चुका था या अपील में उस पर रोक (स्टे) लगी हुई।
जस्टिस गीता के.बी. ने एक महिला की उस रिवीजन याचिका खारिज की, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उसे गुजारा-भत्ता देने से इनकार कर दिया गया।
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'सर तन से जुदा' नारा भारत की संप्रभुता को चुनौती, इसकी तुलना 'अल्लाह-हू-अकबर', 'जय श्री राम' से नहीं की जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
सितंबर 2025 में बरेली में हुई हिंसा के मामले में मौलाना तौकीर रज़ा खान की ज़मानत अर्ज़ी खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि "गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सज़ा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा" नारे की तुलना "नारा-ए-तकबीर, अल्लाह-हू-अकबर", "जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल", "जय श्री राम" या "हर हर महादेव" जैसे धार्मिक नारों से नहीं की जा सकती।
जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव की बेंच ने कहा कि जहां ये नारे संबंधित भगवान या गुरु के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं, वहीं "सर तन से जुदा" नारा "कानून के अधिकार के साथ-साथ भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए एक चुनौती के अलावा और कुछ नहीं" था और इसने लोगों को "हथियारबंद विद्रोह के लिए उकसाया, जो कानून के तहत दंडनीय है"।
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पत्नी की सरकारी नौकरी की जानकारी RTI में नहीं मिलेगी, जब तक सार्वजनिक हित का ठोस आधार न हो: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अलग रह रही पत्नी की सरकारी नौकरी से जुड़ी जानकारी RTI के तहत मांगने वाले व्यक्ति को राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस material नहीं है, जिससे यह साबित हो कि जानकारी के खुलासे में सार्वजनिक हित इतना महत्वपूर्ण है कि वह पत्नी के निजता के अधिकार पर भारी पड़े।
चीफ जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस सुभाष उपाध्याय की डिवीजन बेंच ने अपील खारिज करते हुए कहा कि अपीलकर्ता अपनी पत्नी की सरकारी नियुक्ति में कथित हेरफेर के आरोप को प्रथम दृष्टया साबित करने के लिए भी कोई सबूत पेश नहीं कर सका।


