सेवा रिकॉर्ड में दो साल की समयसीमा के बाद जन्मतिथि नहीं बदली जा सकती: हिमाचल हाईकोर्ट
Amir Ahmad
8 Sept 2026 4:04 PM IST

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारी के सेवा रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि में सुधार के लिए सेवा नियमों में तय समयसीमा का सख्ती से पालन करना होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महज समानता या न्यायसंगत आधार के नाम पर निर्धारित अवधि बीत जाने के बाद जन्मतिथि में सुधार की अनुमति नहीं दी जा सकती।
जस्टिस राकेश कैन्थला ने कहा कि जन्मतिथि में बदलाव के लिए समयसीमा तय करने वाले नियमों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। यदि नियम में प्रविष्टि सुधारने के लिए दो साल की अवधि निर्धारित है, तो अदालतें किसी भी समानतापूर्ण आधार पर इस अवधि को बढ़ाकर दो साल के बाद सुधार की अनुमति नहीं दे सकतीं।
मामला प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक सुरेश कुमार से जुड़ा था। उन्होंने दीवानी अदालत में याचिका दायर कर अपने स्कूल और सेवा रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि 30 अगस्त 1968 के स्थान पर 1 सितंबर 1969 दर्ज करने की मांग की। उनका दावा था कि जन्मतिथि गलत तरीके से दर्ज हो गई और बाद में अधिकारियों से प्राप्त जन्म प्रमाणपत्र में सही जन्मतिथि 1 सितंबर 1969 सामने आई।
राज्य सरकार ने दावे का विरोध करते हुए कहा कि सुरेश कुमार की जन्मतिथि 30 अगस्त 1968 उनके मैट्रिक प्रमाणपत्र, स्कूल छोड़ने के प्रमाणपत्र और सेवा रिकॉर्ड में दर्ज थी। उनके पिता ने भी संबंधित समय पर यही जन्मतिथि बताई। ट्रायल कोर्ट ने सुरेश कुमार का दावा खारिज किया, लेकिन प्रथम अपीलीय अदालत ने उनके पक्ष में फैसला दिया। इसके बाद राज्य ने हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने हिमाचल प्रदेश वित्तीय नियम, 1971 के नियम 7.1 का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारी को सरकारी सेवा में प्रवेश करने के दो साल के भीतर जन्मतिथि में सुधार की मांग करनी होती है। सुरेश कुमार ने 1 सितंबर 2001 को सरकारी सेवा ज्वाइन की, जबकि उन्होंने पहली बार जन्मतिथि सुधारने के लिए 13 मई 2003 को आवेदन दिया। यानी निर्धारित दो साल की अवधि समाप्त होने के बाद दावा किया गया।
कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि देरी केवल कुछ महीनों की थी और नियम का उद्देश्य मुख्य रूप से सेवा के अंतिम चरण में जन्मतिथि बदलने के दावों को रोकना है। कोर्ट ने कहा कि एक बार नियम ने स्पष्ट समयसीमा तय कर दी तो अदालत उसके पीछे के उद्देश्य की अलग से जांच कर उस अवधि में छूट नहीं दे सकती।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जन्मतिथि में देरी से बदलाव का असर अन्य कर्मचारियों पर पड़ सकता है। इससे उनकी वरिष्ठता और पदोन्नति के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए अदालतें केवल समानता या न्यायसंगत विचार के आधार पर वैधानिक नियम में छूट नहीं दे सकतीं।
सीमा अवधि के संबंध में कोर्ट ने कहा कि विवादित जन्मतिथि 1985 में जारी मैट्रिक प्रमाणपत्र में पहले से दर्ज थी। ऐसे में 2004 में दायर किया गया मुकदमा अत्यधिक विलंबित था। कोर्ट ने यह तर्क भी स्वीकार नहीं किया कि बाद में ज्योतिषी के माध्यम से कथित सही जन्मतिथि का पता चलने से मुकदमा दायर करने की अवधि बाद में शुरू मानी जाए।
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रथम अपीलीय अदालत ने निर्धारित दो साल की अवधि के बाद जन्मतिथि में सुधार की अनुमति देकर गलती की। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसला बहाल किया, जिसमें सुरेश कुमार का मुकदमा खारिज किया गया।


