RTE Act | नियुक्ति के समय TET नहीं था 31 मार्च 2015 से पहले पास किया तो नहीं जाएगी नौकरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
12 Sept 2026 12:46 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE Act) के तहत महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि नियुक्ति के समय शिक्षक के पास शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की योग्यता नहीं थी लेकिन उसने कानून में दी गई समय-सीमा के भीतर TET पास कर लिया तो उसकी नियुक्ति को केवल इस आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने कहा कि RTE Act 2009 की धारा 23 में दी गई सुरक्षा को नजरअंदाज करके राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की अधिसूचना के आधार पर शिक्षक की सेवा समाप्त नहीं की जा सकती। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता ने 31 मार्च 2015 की निर्धारित समय-सीमा से पहले वर्ष 2014 में TET पास कर लिया था इसलिए उसकी नियुक्ति कानून के तहत सुरक्षित है।
मामला कुशीनगर के बाल बारी जूनियर हाईस्कूल से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की नियुक्ति सरकारी सेवक की मृत्यु के बाद आश्रित नियुक्ति से संबंधित 1974 के नियमों के तहत सहायक शिक्षक के पद पर हुई। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, कुशीनगर ने 30 जुलाई 2011 को नियुक्ति को मंजूरी दी थी और शिक्षक ने 10 अगस्त 2011 को कार्यभार ग्रहण किया।
इसके बाद 2 अगस्त 2014 को प्रबंधन समिति के प्रबंधक ने शिक्षक की सेवा समाप्त की। आरोप लगाया गया कि नियुक्ति के दौरान तथ्यों को छिपाया गया और जालसाजी की गई। हालांकि सेवा समाप्ति आदेश में कथित जालसाजी से संबंधित किसी दस्तावेज या ठोस आधार का उल्लेख नहीं किया गया।
जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 28 नवंबर 2014 को सेवा समाप्ति को मंजूरी देने से इनकार किया। 1978 के नियमों के तहत सहायक शिक्षक की सेवा समाप्त करने के लिए जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की पूर्व लिखित मंजूरी जरूरी थी। प्रबंधन ने इस आदेश को चुनौती भी नहीं दी। इसके बावजूद शिक्षक को दोबारा काम पर नहीं लिया गया और वेतन भी नहीं दिया गया।
इसके बाद शिक्षक ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर सेवा में बनाए रखने और बकाया वेतन दिलाने की मांग की। सुनवाई के दौरान प्रबंधन ने पहली बार यह दलील दी कि नियुक्ति के समय शिक्षक के पास TET प्रमाणपत्र नहीं था इसलिए उनकी नियुक्ति ही वैध नहीं है।
सिंगल बेंच ने 23 अप्रैल 2015 को याचिका खारिज करते हुए माना था कि 23 अगस्त 2010 की राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की अधिसूचना के बाद TET आवश्यक योग्यता थी। बाद में TET पास करने से नियुक्ति वैध नहीं हो सकती। इसके बाद शिक्षक ने विशेष अपील दाखिल की।
अपील पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने कहा कि किसी आदेश की वैधता उसी में दिए गए कारणों के आधार पर तय होती है। बाद में शपथपत्र के जरिए नया कारण जोड़कर पुराने आदेश को सही नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि सेवा समाप्ति के समय TET का अभाव कारण ही नहीं था इसलिए बाद में इस आधार को सामने लाना स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि यदि किसी आदेश को नए-नए कारण जोड़कर बाद में बचाने की अनुमति दी जाए तो न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।
पीठ ने 5 दिसंबर 2012 के शासनादेश को भी महत्वपूर्ण माना। शासनादेश में पहले से कार्यरत उन शिक्षकों को 31 मार्च 2015 तक TET हासिल करने का समय दिया गया था, जिनके पास उस समय यह योग्यता नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि एक अप्रैल 2010 से लागू कानून के तहत पांच साल की अवधि 31 मार्च 2015 तक थी।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि जब याचिकाकर्ता की नियुक्ति हुई, तब 1978 के नियमों में TET को नियुक्ति की अनिवार्य योग्यता के रूप में शामिल नहीं किया गया। बाद में नियमों में TET की आवश्यकता जोड़ी गई लेकिन कानून और शासनादेश के तहत दी गई सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि सरकार और प्रबंधन राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की अधिसूचना को सेवा समाप्ति के लिए बाध्यकारी मानकर शिक्षक के खिलाफ इस्तेमाल नहीं कर सकते और उसी केंद्रीय कानून में दी गई सुरक्षा से उन्हें वंचित नहीं कर सकते।
चूंकि शिक्षक ने 2014 में ही TET पास कर लिया था यानी 31 मार्च 2015 की अंतिम समय-सीमा से पहले इसलिए हाईकोर्ट ने उनकी नियुक्ति को सुरक्षित माना।
पीठ ने कहा कि शिक्षक को सेवा समाप्ति के खिलाफ जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की मंजूरी न मिलने के बावजूद काम से दूर रखा गया। यह महज गलत तरीके से सेवा समाप्त करने का मामला नहीं था बल्कि सक्षम अधिकारी के आदेश की जानबूझकर अवहेलना करते हुए शिक्षक को काम से वंचित रखा गया।
वेतन के बकाये को लेकर कोर्ट ने कहा कि करीब 12 साल तक शिक्षक के काम से बाहर रहने के दौरान वह किसी अन्य रोजगार में थे या नहीं, इस बारे में दोनों पक्षों ने पर्याप्त तथ्य नहीं रखे थे। इसलिए केवल पिछले वेतन के सिद्धांतों के आधार पर बकाया तय करना उचित नहीं होगा।
हालांकि कोर्ट ने परिस्थितियों को सामान्य सेवा समाप्ति के मामले से अलग माना। खंडपीठ के अनुसार शिक्षक को सक्षम अधिकारी द्वारा सेवा समाप्ति को मंजूरी न दिए जाने के बाद भी जानबूझकर काम नहीं करने दिया गया। इसलिए उसे काम करने से रोकने की जिम्मेदारी प्रबंधन की थी और इस अवधि के वेतन से उसे वंचित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने विशेष अपील मंजूर करते हुए सिंगल बेंच का आदेश रद्द किया। कोर्ट ने शिक्षक को तत्काल सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया और सभी परिणामी आर्थिक लाभ देने को कहा। बकाया वेतन पर छह प्रतिशत साधारण ब्याज भी देने का आदेश दिया गया।


