सिर्फ आपराधिक मुकदमा दर्ज होना पुलिस सेवा के लिए अयोग्य नहीं बनाता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

9 Sept 2026 6:19 PM IST

  • सिर्फ आपराधिक मुकदमा दर्ज होना पुलिस सेवा के लिए अयोग्य नहीं बनाता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी उम्मीदवार के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज होने मात्र से उसे पुलिस सेवा में नियुक्ति के लिए स्वतः अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। उम्मीदवार की योग्यता का आकलन मामले की प्रकृति और उससे जुड़ी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

    जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने राज्य सरकार की विशेष अपील खारिज करते हुए कहा कि केवल मुकदमा दर्ज होने के आधार पर उम्मीदवार को यांत्रिक ढंग से सेवा से बाहर नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने कहा,

    “ऐसा कोई कानून नहीं है, जिसके तहत किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज होते ही उसे स्वतः अयोग्य ठहरा दिया जाए। अपराध की प्रकृति और सभी परिस्थितियों पर विचार करना होगा। गैर-गंभीर अपराधों में केवल मुकदमा दर्ज होना पुलिस बल में नियुक्ति के लिए अयोग्यता नहीं बन सकता।”

    मामला एक उम्मीदवार से जुड़ा है, जिसका चयन अलीगढ़ में नागरिक पुलिस के कांस्टेबल के रूप में हुआ था। बाद में उसे प्रशिक्षण के लिए फिरोजाबाद भेजा गया, जहां उसने आठ अक्टूबर 1997 को कार्यभार संभाला। इसके करीब 20 दिन बाद उसे इस आधार पर सेवा से हटा दिया गया कि चयन से पहले उसके खिलाफ आपराधिक मामला लंबित है, जिसकी जानकारी उसने नहीं दी।

    उम्मीदवार को बाद में 19 सितंबर 1997 को समझौते के आधार पर बरी कर दिया गया था। उसका कहना था कि 24 जुलाई 1997 को जब उसने किसी आपराधिक मामले में शामिल न होने संबंधी शपथपत्र दिया, तब उसे इस मुकदमे की जानकारी नहीं थी। उसे समझौते से दो या तीन दिन पहले ही मामले का पता चला।

    राज्य सरकार ने दलील दी कि उम्मीदवार का शपथपत्र गलत था, क्योंकि उसके खिलाफ 1994 में बलवा, मारपीट और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज था और यह चयन के समय लंबित था।

    एकल जस्टिस ने पहले इस मामले में सेवा से हटाने का आदेश रद्द किया और बिना पिछला वेतन दिए सेवा की निरंतरता के साथ बहाली का निर्देश दिया। इसके खिलाफ राज्य सरकार ने विशेष अपील दाखिल की।

    खंडपीठ ने उम्मीदवार को मुकदमे की जानकारी होने के सवाल पर भी गौर किया। कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड से FIR दर्ज होने की तारीख स्पष्ट नहीं थी। ऐसे में यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उस समय उम्मीदवार की उम्र क्या थी।

    कोर्ट ने कहा कि यह साबित करना नियोक्ता की जिम्मेदारी थी कि उम्मीदवार ने जमानत के लिए आवेदन किया, जांच में हिस्सा लिया या मुकदमे की कार्यवाही में शामिल हुआ, जिससे यह माना जा सके कि उसे मामले की जानकारी थी। राज्य की ओर से ऐसा कोई ठोस आधार नहीं रखा गया।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संबंधित अपराध समझौता योग्य थे और उनमें नैतिक पतन या हत्या, डकैती अथवा बलात्कार जैसे जघन्य अपराध शामिल नहीं है।

    कोर्ट ने कहा कि यदि यह मान भी लिया जाए कि उम्मीदवार को मामले की जानकारी थी, तब भी केवल इस आधार पर उसकी उम्मीदवारी रद्द नहीं की जा सकती।

    राज्य की इस दलील को खारिज करते हुए कि आपराधिक मामले में आरोपी किसी भी उम्मीदवार को सरकारी सेवा के लिए अयोग्य मान लिया जाना चाहिए, कोर्ट ने कहा कि ऐसा रुख किसी भी उम्मीदवार को बिना उचित मूल्यांकन के सीधे विचार से बाहर करने जैसा होगा।

    पीठ ने कहा कि पुलिस मुख्यालय और फिरोजाबाद के पुलिस अधीक्षक ने मामले में यांत्रिक तरीके से कार्रवाई की और उम्मीदवार की व्यक्तिगत परिस्थितियों तथा आरोपों की प्रकृति का उचित आकलन नहीं किया।

    कोर्ट ने एकल जस्टिस के फैसले से सहमति जताते हुए, अतिरिक्त कारणों के साथ राज्य सरकार की विशेष अपील खारिज की।

    अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story