तलाकशुदा पुरुष से शादी करने वाली महिला तलाक के आदेश की पुष्टि न करने तक मेंटेनेंस का दावा नहीं कर सकती: कर्नाटक हाईकोर्ट

Shahadat

7 Sept 2026 8:51 PM IST

  • तलाकशुदा पुरुष से शादी करने वाली महिला तलाक के आदेश की पुष्टि न करने तक मेंटेनेंस का दावा नहीं कर सकती: कर्नाटक हाईकोर्ट

    कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ बेंच ने कहा कि जो महिला जानबूझकर किसी ऐसे पुरुष से शादी करती है, जिसे वह तलाकशुदा मानती है, वह CrPC की धारा 125 के तहत गुजारा-भत्ते का दावा नहीं कर सकती, अगर उसने यह पुष्टि नहीं की कि तलाक का आदेश अंतिम हो चुका था या अपील में उस पर रोक (स्टे) लगी हुई।

    जस्टिस गीता के.बी. ने एक महिला की उस रिवीजन याचिका खारिज की, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उसे गुजारा-भत्ता देने से इनकार कर दिया गया।

    कोर्ट ने कहा,

    "जब याचिकाकर्ता को यह पता चल जाता है कि प्रतिवादी तलाकशुदा है, तो एक समझदार व्यक्ति उस बात की सच्चाई की पुष्टि करने की कोशिश करेगा; कि क्या उस आदेश के खिलाफ कोई अपील दायर की गई, लंबित है या नहीं। इसके अलावा, प्रतिवादी द्वारा यह तर्क दिए जाने के बाद भी कि MFA No.101347/2015 लंबित है, याचिकाकर्ता ने यह कहने की कोई कोशिश नहीं की कि प्रतिवादी ने उस अपील के लंबित होने या उस MFA में पारित स्टे ऑर्डर को छिपाकर उससे शादी की। न तो याचिका में और न ही उसके हलफनामे के सबूतों में ऐसा कोई दावा किया गया; और न ही उसने जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) के दौरान ऐसा कोई बयान दिया। इन परिस्थितियों में, जब प्रतिवादी की पहली पत्नी के साथ शादी अभी भी कायम है तो प्रतिवादी को याचिकाकर्ता से शादी नहीं करनी चाहिए।"

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "इसके अलावा, अगर दूसरी शादी की बात छिपाई गई हो और प्रतिवादी ने याचिकाकर्ता से शादी की हो, तभी वह गुजारा-भत्ते की हकदार होती है। लेकिन मौजूदा मामले में ऐसा नहीं है।"

    याचिकाकर्ता की शैक्षिक पृष्ठभूमि पर ध्यान देते हुए कोर्ट ने कहा कि वह "दुनियादारी की समझ रखने वाली" है और तलाक की कार्यवाही की कानूनी स्थिति को समझने में सक्षम है।

    कोर्ट ने कहा,

    "याचिकाकर्ता कन्नड़ दर्शनशास्त्र में Ph.D. धारक है। इसलिए वह कोई अनपढ़ व्यक्ति नहीं है, जो यह कहे कि उसे इन पहलुओं के बारे में कुछ नहीं पता। वह 2015 में हुक्केरी कॉलेज में लेक्चरर के तौर पर काम कर रही हैं। इसलिए उन्हें दुनियादारी की समझ है।"

    कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका, हलफनामे या क्रॉस एग्जामिनेशन में ऐसा कोई दावा नहीं किया, जिससे यह साबित हो सके कि प्रतिवादी ने तलाक के आदेश या स्टे ऑर्डर के खिलाफ अपील लंबित होने की बात छिपाई। कोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में नाकाम रही कि प्रतिवादी ने उसे नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया।

    बादशाह बनाम उर्मिला बादशाह गोडसे (2014) 1 SCC 188 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले और श्रीमती मोनिका उर्फ ​​सत्यवती बनाम यूपी राज्य (2024) में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से इस मामले को अलग बताते हुए कोर्ट ने कहा,

    "ऊपर बताए गए दोनों मामलों में पति ने दूसरी शादी के समय पहली शादी की बात धोखे से छिपाई। हालांकि, मौजूदा मामले में ऐसी स्थिति नहीं है।"

    इसके बाद, हाईकोर्ट ने रिवीजन याचिका खारिज की।

    Case: A vs S

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