बार एसोसिएशन की सदस्यता का विवाद निजी मामला, रिट क्षेत्राधिकार में नहीं आता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
11 Sept 2026 5:29 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बार एसोसिएशन की सदस्यता, निलंबन या किसी सदस्य को संगठन से बाहर करने से जुड़े विवाद मूल रूप से निजी प्रकृति के होते हैं और ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दाखिल नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बार एसोसिएशन और उसके सदस्यों के बीच ऐसे विवाद में कोई सार्वजनिक कानून का तत्व शामिल नहीं होता।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अब्देश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी लखीमपुर खीरी जिले की तहसील गोला गोकर्णनाथ स्थित सेंट्रल बार एसोसिएशन के एक वकील सदस्य की याचिका खारिज करते हुए की।
याचिकाकर्ता लाल बिहारी वर्मा ने एसोसिएशन की सदस्यता से एक साल के लिए किए गए डिबारमेंट को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और जनवरी 2026 में हुए चुनाव के मुख्य निर्वाचन अधिकारी रहे थे। उनका आरोप है कि चुनाव कराने के बाद उन्होंने नवनिर्वाचित पदाधिकारियों की कथित अवैध गतिविधियों को लेकर शिकायत की थी।
इसके बाद उनके खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें एक साल के लिए एसोसिएशन की सदस्यता से बाहर कर दिया गया।
याचिकाकर्ता ने इसे बदले की कार्रवाई और मनमाना कदम बताते हुए 12 जून 2026 को जारी उस प्रेस विज्ञप्ति को रद्द करने की मांग की, जिसके जरिए डिबारमेंट की घोषणा की गई थी।
एसोसिएशन की ओर से याचिका की सुनवाई योग्य होने पर ही सवाल उठाया गया। उसका कहना था कि विवाद एक निजी बार एसोसिएशन के आंतरिक सदस्यता संबंधी मामले से जुड़ा है और इसमें कोई सार्वजनिक अधिकार या सार्वजनिक दायित्व शामिल नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में सबसे पहले यह तय करना जरूरी है कि किसी बार एसोसिएशन के खिलाफ उसकी आंतरिक सदस्यता या डिबारमेंट से जुड़े विवाद में अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका सुनवाई योग्य है या नहीं।
अदालत ने कहा कि किसी संस्था को केवल इस आधार पर रिट क्षेत्राधिकार के अधीन नहीं माना जा सकता कि वह सार्वजनिक है या निजी। इसके लिए यह देखना होगा कि जिस कार्रवाई को चुनौती दी गई, क्या उसमें सार्वजनिक कर्तव्य या सार्वजनिक कार्य का निर्वहन शामिल है या वह संस्था का निजी और आंतरिक मामला है।
सुप्रीम कोर्ट के फेडरल बैंक लिमिटेड बनाम सागर थॉमस और एस. शोभा बनाम मुथूट फाइनेंस लिमिटेड जैसे फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी निजी संस्थाएं जिनके दायित्व मुख्य रूप से अपने सदस्यों तक सीमित हैं और जिनके फैसलों का आम जनता पर बाध्यकारी प्रभाव नहीं पड़ता, सामान्य तौर पर अनुच्छेद 226 के दायरे में नहीं आतीं।
अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के संगीता राय बनाम न्यू दिल्ली बार एसोसिएशन मामले में दिए फैसले का भी उल्लेख किया।
उस मामले में कहा गया था कि सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत बार एसोसिएशन वकीलों की निजी संस्था है और अपने सामान्य कामकाज में कोई सार्वजनिक कार्य नहीं करती। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार किया था।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल निजी संस्था होने के कारण हर संस्था को रिट क्षेत्राधिकार से पूरी तरह बाहर नहीं किया जा सकता। यदि कोई निजी संस्था किसी पूरे क्षेत्र में नियामक या सार्वजनिक प्रकृति की भूमिका निभा रही हो तो उसके खिलाफ रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल संभव हो सकता है। लेकिन अदालत ने कहा कि यह सिद्धांत जिला स्तर पर काम करने वाली स्वैच्छिक बार एसोसिएशन पर लागू नहीं होता, जिसकी गतिविधियां उसके सदस्यों के कल्याण और आंतरिक नियमन तक सीमित हैं।
मौजूदा मामले पर इस सिद्धांत को लागू करते हुए खंडपीठ ने कहा कि सेंट्रल बार एसोसिएशन सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत संस्था है और मौजूदा विवाद मूल रूप से सदस्यता से जुड़ा है।
अदालत ने कहा कि यह तर्क दिया जा सकता है कि संपूर्ण कानूनी पेशे का सार्वजनिक चरित्र है, लेकिन स्वैच्छिक बार एसोसिएशन और उसके सदस्यों के बीच आपसी संबंध उसके नियमों के तहत मूल रूप से संविदात्मक और नियामक प्रकृति का है।
हाईकोर्ट ने कहा कि बार एसोसिएशन की सदस्यता या डिबारमेंट से जुड़े विवादों को सक्षम दीवानी अदालत, सोसायटी के रजिस्ट्रार या एसोसिएशन के उपनियमों में निर्धारित सक्षम प्राधिकारी के समक्ष उठाया जा सकता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बार एसोसिएशन की सदस्यता का विवाद एसोसिएशन का सार्वजनिक कार्य नहीं कहा जा सकता और न ही ऐसा विवाद सार्वजनिक प्रकृति का है, जिससे वह हाईकोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार के दायरे में आ जाए।
खंडपीठ ने कहा कि किसी सोसायटी के आंतरिक प्रशासन से जुड़े मामले, जिनमें सदस्यता, प्रवेश, निलंबन और डिबारमेंट शामिल हैं, उसके उपनियमों से नियंत्रित होते हैं और इनमें सार्वजनिक कानून का कोई तत्व नहीं होता।
इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 226 के तहत दायर याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना और उसे खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी है। वह दीवानी मुकदमा दाखिल कर सकता है, सोसायटी के रजिस्ट्रार से संपर्क कर सकता है या बार एसोसिएशन के उपनियमों के तहत निर्धारित प्राधिकारी के समक्ष अपनी शिकायत रख सकता है।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता एक सप्ताह के भीतर ऐसा आवेदन दाखिल करता है तो संबंधित प्राधिकारी उसे याचिकाकर्ता और अन्य संबंधित पक्षों को सुनने के बाद चार सप्ताह के भीतर तय करेगा।


