यूपी सरकार 'दमन के हथियार' के तौर पर इस्तेमाल कर रही है 'गुंडा एक्ट': इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shahadat

12 Sept 2026 9:29 AM IST

  • यूपी सरकार दमन के हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है गुंडा एक्ट: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 'गुंडा एक्ट' के इस्तेमाल की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि उसके सामने आए कई मामलों से पता चलता है कि राज्य सरकार 'गुंडा एक्ट' का इस्तेमाल 'दमन के हथियार' के तौर पर करने की अपनी नीति पर अड़ी हुई।

    जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने गोंडा के निवासी के खिलाफ जारी आदेशों को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। इन आदेशों में उसे 'यूपी कंट्रोल ऑफ़ गुंडाज़ एक्ट, 1970' के तहत 'गुंडा' घोषित किया गया और छह महीने के लिए गोंडा जिले से बाहर रहने का आदेश दिया गया।

    कोर्ट ने कहा कि उसने बार-बार यह माना कि 'गुंडा एक्ट' 'गुंडों' को नियंत्रित करने और दबाने का एक शक्तिशाली हथियार है, लेकिन इसका इस्तेमाल 'सार्वजनिक अव्यवस्था' के बहुत स्पष्ट मामलों में या 'कानून-व्यवस्था' बनाए रखने के लिए 'बहुत सोच-समझकर' किया जाना चाहिए।

    जस्टिस विद्यार्थी ने फिर से कहा कि इस कानून का इस्तेमाल 'बेगुनाह लोगों के दमन के हथियार' के तौर पर नहीं होने दिया जाना चाहिए। इसका मकसद किसी व्यक्ति को किसी गंभीर अपराध के लिए दोषी ठहराए बिना सजा दिलाना नहीं है।

    इस संदर्भ में, कोर्ट ने कहा:

    "इस कोर्ट के सामने कई ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनसे पता चलता है कि राज्य सरकार 'गुंडा एक्ट' का इस्तेमाल 'दमन के हथियार' के तौर पर करने की अपनी नीति पर अड़ी हुई है। यह मामला उस कानून के गलत इस्तेमाल का एक बड़ा उदाहरण है।"

    मामले का संक्षिप्त विवरण

    याचिकाकर्ता (ज़ाहिद अली) ने गोंडा के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट द्वारा 'गुंडा एक्ट' की धारा 3(1) के तहत 11 मई, 2026 को जारी उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उसे 'गुंडा' घोषित किया गया और 6 महीने के लिए गोंडा जिले की सीमा से बाहर रहने का आदेश दिया गया।

    उसने 12 अगस्त, 2026 के उस आदेश को भी चुनौती दी, जिसके तहत देवी पाटन मंडल, गोंडा के कमिश्नर ने 'गुंडा एक्ट' की धारा 6 के तहत उसकी अपील खारिज कर दी थी।

    डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट का आदेश याचिकाकर्ता के कथित तौर पर 2 आपराधिक मामलों में शामिल होने और एक 'बीट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट' पर आधारित था। एक मामला 2010 का था, जबकि दूसरा 2020 में दर्ज किया गया।

    हालांकि, याचिकाकर्ता को गोंडा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 26 अगस्त 2017 के फैसले के ज़रिए 2010 के आपराधिक मामले में बरी कर दिया।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    इसे देखते हुए हाईकोर्ट ने साफ तौर पर कहा:

    "किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मामले में उसकी भागीदारी को उस मामले में बरी होने के बाद उसे 'गुंडा' घोषित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।"

    कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा कोई आरोप नहीं है कि याचिकाकर्ता से सार्वजनिक व्यवस्था को कोई खतरा है। 2010 के मामले में बरी होने के बाद, वह केवल एक आपराधिक मामले (जो 2020 की FIR से जुड़ा था) में मुकदमे का सामना कर रहा है।

    कोर्ट ने 2020 की कथित घटनाओं और 2026 में याचिकाकर्ता को 'गुंडा' घोषित करने व ज़िले से बाहर निकालने (एक्सटर्नमेंट) के बीच काफी समय का अंतर भी पाया। कोर्ट ने माना कि 2020 के आपराधिक मामले के दर्ज होने और छह साल बाद उसे 'गुंडा' घोषित करने के बीच "कोई उचित संबंध" नहीं है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि ज़िला मजिस्ट्रेट के आदेश में 2010 के मामले में याचिकाकर्ता की भागीदारी का ज़िक्र है, लेकिन पुलिस को यह पता होना चाहिए कि उसे 2017 में ही उस मामले में बरी कर दिया गया।

    कोर्ट ने कहा कि पुलिस रिपोर्ट में बरी हो चुके मामले का बार-बार ज़िक्र करना "यह दिखाता है कि पुलिस ने ज़िला मजिस्ट्रेट के सामने जानबूझकर याचिकाकर्ता की गलत तस्वीर पेश की"।

    बेंच ने अपील पर दिए गए आदेश पर भी आपत्ति जताई। हालांकि कमिश्नर को बताया गया कि याचिकाकर्ता 2010 के मामले में बरी हो चुका है। फिर भी कमिश्नर ने अपने रिकॉर्ड में लिखा कि वह दो आपराधिक मामलों में शामिल था, जिसमें वह मामला भी शामिल था जिसमें वह पहले ही बरी हो चुका है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि इससे पता चलता है कि मामले पर ठीक से विचार नहीं किया गया, जिससे अपील पर दिया गया आदेश कानूनी रूप से टिकने लायक नहीं रह गया।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि 2020 के एकमात्र आपराधिक मामले में याचिकाकर्ता की भूमिका से यह साबित नहीं होता कि वह गुंडा एक्ट की धारा 2(b)(i) के तहत आने वाले अपराधों को "आदतन करता है, करने की कोशिश करता है या करने में मदद करता है"।

    हाईकोर्ट ने 'बीट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट' पर भरोसा करने को भी खारिज किया। हालांकि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और कमिश्नर ने दर्ज किया कि बीट की जानकारी सही पाई गई, लेकिन कोर्ट ने गौर किया कि उस रिपोर्ट के आधार पर कोई मामला दर्ज नहीं किया गया और याचिकाकर्ता को इस संबंध में अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया।

    कोर्ट ने माना कि ऐसी रिपोर्ट के आधार पर की गई जांच, जिसमें प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का मौका न दिया गया हो, "उसे गुंडा घोषित करने का आधार नहीं बन सकती, क्योंकि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा"।

    आखिरकार, हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता को गुंडा घोषित करने और उसे छह महीने के लिए शहर से बाहर भेजने का डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट का आदेश। साथ ही कमिश्नर का अपील पर दिया गया आदेश, दोनों ही "कानूनी रूप से टिकने लायक नहीं" थे।

    इसके बाद रिट याचिका को मंज़ूरी दी गई और दोनों आदेश रद्द कर दिए गए।

    Case Title - Zahid Ali vs. State Of U.P. Thru. Prin. Secy./Addl. Chief Secy. Deptt. Of Home Lko. And 4 Others 2026 LiveLaw (AB) 698

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