सरकारी कर्मचारी ने दूसरी शादी की तो दूसरी पत्नी को अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार नहीं: झारखंड हाईकोर्ट
Amir Ahmad
8 Sept 2026 11:56 AM IST

झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति का दावा नहीं कर सकती यदि कर्मचारी ने सेवा में रहते हुए दूसरी शादी के लिए आचरण नियमों के तहत सरकार से अनुमति नहीं ली थी। दूसरी शादी संबंधित समुदाय की प्रथा के तहत वैध मानी जाती हो तब भी सेवा नियमों में निर्धारित अनुमति की अनिवार्यता खत्म नहीं होती।
चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने दूसरी पत्नी की ओर से दायर अपील खारिज करते हुए सिंगल जज का फैसला बरकरार रखा।
मामला एक पंचायत सेवक की मृत्यु से जुड़ा है, जिसकी 11 जुलाई 2011 को सेवा में रहते हुए मृत्यु हुई। अपीलकर्ता ने खुद को उसकी दूसरी पत्नी बताते हुए अपने और अपने बेटे के लिए अनुकंपा नियुक्ति तथा सेवानिवृत्ति संबंधी लाभ मांगे थे। विभाग ने उसका दावा खारिज किया, जिसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया।
मामले में कर्मचारी की पहली पत्नी ने भी समान लाभ का दावा किया। दोनों मामलों के निपटारे के बाद पहली पत्नी ने अपील की। अपीलीय अदालत ने आदेश में बदलाव करते हुए पहली पत्नी और दूसरी पत्नी के नाबालिग बेटे के बीच उपदान की राशि बांटने का निर्देश दिया। हालांकि, दूसरी पत्नी को खुद कोई लाभ नहीं दिया गया। दोनों महिलाओं के अनुकंपा नियुक्ति के दावों पर पुनर्विचार का निर्देश जरूर दिया गया लेकिन बाद में दूसरी पत्नी का दावा फिर खारिज कर दिया गया।
इसके खिलाफ दायर याचिका को सिंगल जज ने खारिज किया। इसके बाद दूसरी पत्नी ने खंडपीठ में अपील की।
अपीलकर्ता की दलील थी कि वह और उसका दिवंगत पति संथाल जनजाति से थे और उनके समुदाय की प्रथा में दूसरी शादी की अनुमति है। इसलिए उसके विवाह को अवैध नहीं माना जा सकता। उसने यह भी कहा कि पहले अदालत ने पहली पत्नी और उसके नाबालिग बेटे के बीच कुछ पेंशन एवं उपदान संबंधी लाभ बांटने का आदेश दिया। इससे स्पष्ट है कि उसके विवाह की वैधता पर सवाल नहीं उठाया गया।
राज्य की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि बिहार सरकारी सेवक आचरण नियम, 1976 का नियम 23 दूसरी शादी के लिए स्पष्ट रूप से सरकारी अनुमति की मांग करता है। कर्मचारी ने ऐसी कोई अनुमति नहीं ली थी। इसलिए दूसरी पत्नी सेवा नियमों के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार नहीं मांग सकती।
हाईकोर्ट ने नियम 23 का उल्लेख करते हुए कहा कि कोई सरकारी कर्मचारी ऐसे व्यक्ति से विवाह नहीं कर सकता, जिसका पति या पत्नी जीवित हो। इसी तरह, जीवित पति या पत्नी वाला सरकारी कर्मचारी किसी अन्य व्यक्ति से विवाह नहीं कर सकता। हालांकि, सरकार विशेष परिस्थितियों में अनुमति दे सकती है, बशर्ते संबंधित व्यक्तिगत कानून में ऐसा विवाह स्वीकार्य हो और अनुमति देने के अन्य आधार मौजूद हों।
खंडपीठ ने पाया कि दिवंगत कर्मचारी ने सेवा में रहते हुए दूसरी पत्नी से विवाह करने से पहले सरकार से ऐसी कोई अनुमति नहीं ली थी। इसलिए एकल जज का यह निष्कर्ष सही था कि पहली पत्नी के साथ विवाह कायम रहते हुए दूसरी शादी के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति का दावा नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने संथाल समुदाय की प्रथा का हवाला देने वाली दलील को भी निर्णायक नहीं माना। उसने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि दूसरी शादी से पहले आचरण नियमों के तहत सरकार से अनुमति ली गई।
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के रमेश्वरी देवी बनाम बिहार राज्य मामले को भी अलग माना। उस मामले में सवाल यह था कि पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी से पैदा हुए बच्चों को फैमिली पेंशन और अन्य रिटायरमेंट लाभ मिल सकते हैं या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि विवाह शून्य होने के बावजूद ऐसी शादी से पैदा हुए बच्चों को नाजायज नहीं माना जा सकता। हालांकि, दूसरी पत्नी खुद इन लाभों की हकदार नहीं होगी।
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में दूसरी पत्नी के नाबालिग बेटे को कुछ लाभ पहले ही दिए जा चुके हैं। लेकिन इससे दूसरी पत्नी को अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार नहीं मिल जाता।
खंडपीठ ने सिंगल जज का आदेश बरकरार रखते हुए दूसरी पत्नी की अपील खारिज की।


