अगर तलाकशुदा पत्नी ने दोबारा शादी नहीं की तो वह गुज़ारा-भत्ता का दावा कर सकती है: कलकत्ता हाईकोर्ट
Shahadat
10 Sept 2026 8:15 PM IST

कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि पति द्वारा हासिल किया गया तलाक का एकतरफ़ा आदेश (ex parte decree) अपने आप में उसकी पूर्व पत्नी का भरण-पोषण करने की कानूनी ज़िम्मेदारी को खत्म नहीं करता, बशर्ते पत्नी ने दोबारा शादी न की हो और वह अपना खर्च उठाने में असमर्थ हो।
साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि एक अविवाहित बेटी, जो CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की याचिका दायर करने से पहले ही बालिग हो चुकी है और जिसे कोई शारीरिक या मानसिक अक्षमता नहीं है, वह इस प्रावधान के तहत भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती।
जस्टिस उदय कुमार ने ये टिप्पणियां समर पॉल द्वारा दायर एक क्रिमिनल रिविज़न याचिका आंशिक रूप से मंज़ूर करते हुए कीं। समर पॉल ने अपनी पत्नी ज्योत्सना पॉल द्वारा शुरू की गई भरण-पोषण की कार्यवाही और उसके बाद उल्बेरिया, हावड़ा की ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, पहली अदालत के समक्ष चल रही अमल (execution) की कार्यवाही को चुनौती दी थी।
यह विवाद CrPC की धारा 125 के तहत मिसलेनियस केस नंबर 41/2019 और मिसलेनियस एग्जीक्यूशन केस नंबर 61/2021 से पैदा हुआ था। पति ने 15 अक्टूबर 2019 के अंतरिम भरण-पोषण आदेश, 6 अक्टूबर 2023 के उस आदेश (जिसमें तलाक के बाद कार्यवाही को 'नॉन-मेंटेनेबल' यानी सुनवाई के अयोग्य मानने की उसकी दलील खारिज कर दी गई थी) और 2 मार्च 2024 के आदेश (जिसके कारण आखिरकार 4 अप्रैल 2024 को डिस्ट्रेस वारंट जारी हुआ) को चुनौती दी थी।
इस जोड़े की शादी 11 फरवरी 1995 को हुई और उनके दो बच्चे है - एक बेटा जिसका जन्म 1996 में हुआ और एक बेटी, संगीता पॉल, जिसका जन्म 15 अक्टूबर 1999 को हुआ।
सालों के साथ शादीशुदा रिश्ते में खटास आ गई और कई सिविल और क्रिमिनल मामले दर्ज हुए। 15 जुलाई 2018 की एक घटना के बाद पत्नी ने शारीरिक हमले और एसिड से संबंधित हिंसा का आरोप लगाते हुए FIR दर्ज कराई। इसके बाद पति ने शादी खत्म करने के लिए वैवाहिक कार्यवाही शुरू की।
पति का वैवाहिक मुकदमा एकतरफ़ा (ex parte) चला और 20 जून 2022 को तलाक का आदेश (decree) जारी हुआ। इसके बाद पत्नी ने CPC के ऑर्डर IX नियम 13 के तहत एकतरफ़ा आदेश रद्द करने के लिए अर्ज़ी दायर की, जो लंबित रही। इस बीच पत्नी ने 2019 में अंतरिम भरण-पोषण का आदेश प्राप्त कर लिया था, जिसके तहत कुल 3,500 रुपये प्रति माह का भुगतान करने का निर्देश दिया गया - इसमें 1,500 रुपये उसके अपने लिए और 2,000 रुपये बेटी के लिए शामिल थे।
पति ने हाईकोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि तलाक के आदेश (डिक्री) ने वैवाहिक संबंध को समाप्त कर दिया था। परिणामस्वरूप, अपनी पत्नी को भरण-पोषण का भुगतान करने की उसकी बाध्यता भी खत्म हो गई। उसने यह भी तर्क दिया कि बेटी अक्टूबर 2017 में - यानी धारा 125 के तहत कार्यवाही शुरू होने से पहले ही - बालिग हो चुकी है और वह एक स्वस्थ व्यक्ति है, जो अपनी पढ़ाई कर रही है।
पत्नी के भरण-पोषण के दावे को चुनौती देने वाली दलील खारिज करते हुए जस्टिस कुमार ने CrPC की धारा 125(1) के स्पष्टीकरण (b) का हवाला दिया, जिसमें "पत्नी" की परिभाषा में स्पष्ट रूप से ऐसी महिला को शामिल किया गया, जिसे उसके पति ने तलाक दे दिया हो और जिसने दोबारा शादी न की हो।
कोर्ट ने कहा, "शादी का टूटना, भले ही पति द्वारा प्राप्त आदेश (डिक्री) के माध्यम से हुआ हो, अपनी पूर्व पत्नी के भरण-पोषण की उसकी कानूनी बाध्यता को स्वतः समाप्त नहीं करता है" - यह कानूनी आवश्यकताओं के अधीन है।
कोर्ट ने 'वनमाला बनाम एच.एम. रंगनाथा भट्ट' और 'रोहताश सिंह बनाम श्रीमती रामेंद्री' मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भरोसा किया, जो यह मानते हैं कि तलाकशुदा महिला जिसने दोबारा शादी नहीं की, वह CrPC की धारा 125 के उद्देश्यों के लिए "पत्नी" की कानूनी परिभाषा के दायरे में आती है।
हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 482 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए पक्षों की संबंधित वित्तीय स्थितियों से जुड़े विवादित सवालों पर निर्णय लेने से भी इनकार किया।
Case: SAMAR PAUL VS. THE STATE OF WEST BENGAL AND ANR.


