मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

ट्विशा शर्मा दहेज मौत मामला: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एम्स दिल्ली की टीम से दोबारा पोस्टमार्टम कराने के दिए निर्देश

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ट्विशा शर्मा दहेज मौत मामले में बड़ा आदेश देते हुए मृतका का दोबारा पोस्टमार्टम कराने की अनुमति दी। अदालत ने निर्देश दिया कि दूसरा पोस्टमार्टम एम्स दिल्ली के विशेषज्ञों की टीम द्वारा भोपाल में किया जाए।जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह ने शुक्रवार को ट्विशा शर्मा के पिता की याचिका पर यह आदेश पारित किया।सुनवाई के दौरान पति पक्ष के वकील ने दोबारा पोस्टमार्टम का विरोध करते हुए कहा कि इससे राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं का अपमान होगा। उन्होंने दलील दी कि पहले पोस्टमार्टम पर संदेह जताने के...

ट्विशा शर्मा दहेज मृत्यु मामला: सास को मिली अग्रिम जमानत रद्द कराने हाईकोर्ट पहुंचे मृतका के पिता

ट्विशा शर्मा की मौत से जुड़े दहेज उत्पीड़न मामले में उसके पिता नवनीधि शर्मा ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर मृतका की सास गिरीबाला सिंह को दी गई अग्रिम जमानत को चुनौती दी।33 वर्षीय ट्विशा शर्मा 12 मई को भोपाल स्थित अपने ससुराल में मृत पाई गई थीं। मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 80(2) के तहत दहेज मृत्यु, धारा 85 के तहत क्रूरता और धारा 3(5) के तहत समान आशय के आरोपों में FIR दर्ज की गई। इसके अलावा दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत भी मामला दर्ज किया गया।ट्विशा के...

ट्विशा शर्मा दहेज मृत्यु मामला: आरोपी वकील-पति समार्थ सिंह ने अग्रिम जमानत के लिए किया मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का रुख

ट्विशा शर्मा की मौत से जुड़े दहेज उत्पीड़न मामले में आरोपी वकील समार्थ सिंह ने अग्रिम जमानत के लिए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। समार्थ सिंह के खिलाफ पत्नी को प्रताड़ित करने और दहेज उत्पीड़न के आरोपों में FIR दर्ज की गई।यह याचिका ऐसे समय दायर की गई जब भोपाल की सेशन कोर्ट ने सोमवार को उनकी अग्रिम जमानत अर्जी खारिज की थी। अदालत ने कहा था कि FIR और व्हाट्सऐप चैट्स के अवलोकन से प्रथम दृष्टया मुख्य आरोप समार्थ सिंह के खिलाफ दिखाई देते हैं।हाईकोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार,...

आदेश में सभी दलीलों का उल्लेख न होने से जज को पक्षपाती नहीं कहा जा सकता : मध्यप्रदेश हाईकोर्ट

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने न्यायिक पक्षपात की आशंका जताते हुए दायर स्थानांतरण आवेदन खारिज करते हुए कहा कि केवल इस आधार पर किसी जज को पक्षपाती नहीं कहा जा सकता कि अदालत के आदेश में किसी पक्ष की कुछ दलीलों का उल्लेख नहीं किया गया।जस्टिस हिमांशु जोशी की पीठ ने कहा कि अदालत हर उस दलील को आदेश में दर्ज करने के लिए बाध्य नहीं होती, जिसका विवाद के मूल मुद्दों से सीधा संबंध न हो।अदालत ने कहा,“न्यायिक आदेशों में केवल महत्वपूर्ण तथ्यों, लागू कानून और उन तर्कों का उल्लेख आवश्यक होता है, जिनका विवाद के निपटारे...

निजी मंदिरों के प्रबंधन में दखल नहीं दे सकती सरकार: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार किसी निजी मंदिर के प्रबंधन में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। अदालत ने राज्य के सभी जिला कलेक्टरों को निर्देश दिया है कि किसी भी मंदिर पर प्रबंधन योजना लागू करने से पहले यह तय किया जाए कि वह मंदिर सार्वजनिक है या निजी।जस्टिस दीपक खोत की पीठ ने यह आदेश डूंडा सिवनी गांव स्थित एक शिव मंदिर के सर्वराकर की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में लोक न्यास रजिस्ट्रार द्वारा मंदिर के प्रबंधन के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित करने के आदेश को चुनौती दी गई।अदालत ने...

अंतरधार्मिक विवाह को अपराध साबित करने के लिए फर्जी जन्म प्रमाणपत्र बनाने का आरोप: हाईकोर्ट पहुंची कुंभ की वायरल गर्ल मोनालिसा

महाकुंभ मेले के दौरान सोशल मीडिया पर वायरल हुईं मोनालिसा भोसले ने अपने पति फरमान के साथ मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का रुख किया। दंपति ने आरोप लगाया कि उनके अंतरधार्मिक विवाह को अपराध साबित करने के लिए मोनालिसा का जन्म प्रमाणपत्र फर्जी तरीके से बदला गया।याचिका में अदालत से मोनालिसा का मूल जन्म प्रमाणपत्र बहाल करने और सरकारी रिकॉर्ड में कथित जालसाजी की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई।मोनालिसा भोसले पिछले वर्ष महाकुंभ के दौरान रुद्राक्ष की माला बेचते हुए सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, जिसके बाद उन्हें...

बिना विभागीय जांच के अवज्ञा के आरोप पर कर्मचारी को नौकरी से निकालना कानूनी तौर पर गलत: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी को अवज्ञा या अनुशासनहीनता के आरोपों पर बिना उसे ठीक से बनी जांच में सबूत पेश करने का मौका दिए, नौकरी से निकालना कानूनी तौर पर गलत है; इसलिए ऐसी बर्खास्तगी मान्य नहीं है।जस्टिस जय कुमार पिल्लई की बेंच ने कहा कि प्रतिवादियों ने याचिकाकर्ता को सिर्फ़ एक 'कारण बताओ नोटिस' जारी करके और उसके जवाब को असंतोषजनक बताकर खारिज करके, बिना कोई औपचारिक विभागीय जांच किए उसकी सेवाएं समाप्त कर दी थीं।कोर्ट ने कानून की स्थापित स्थिति को दोहराते हुए कहा कि भले ही कोई...

उधार लेने वाला विभाग, बिना पूरी विभागीय जांच किए अनुपयुक्तता के आधार पर प्रतिनियुक्ति पर आए कर्मचारी को वापस भेज सकता है: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक सरकारी कर्मचारी की याचिका खारिज करते हुए, जिसमें उसने अपने मूल विभाग में समय से पहले वापस भेजे जाने को चुनौती दी थी, यह टिप्पणी की कि किसी सरकारी कर्मचारी को उसके मूल विभाग में वापस भेजना, केवल सक्षम अधिकारी की संतुष्टि के आधार पर भी वैध है।जस्टिस जय कुमार पिल्लई की बेंच इस बात पर विचार कर रही थी कि क्या याचिकाकर्ता के निर्धारित विस्तारित कार्यकाल को समय से पहले खत्म करना एक 'कलंकपूर्ण दंड' (Stigmatic Punishment) माना जाएगा, जिसके लिए एक पूरी तरह से विभागीय जाँच की...

रक्षा और सुरक्षा परियोजनाओं के लिए पेड़ काटने पर पूर्व अनुमति जरूरी नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भारतीय सेना को राहत देते हुए स्पष्ट किया कि रक्षा और सुरक्षा संबंधी अधोसंरचना परियोजनाओं पर पेड़ काटने के लिए पूर्व अनुमति संबंधी उसका पुराना आदेश लागू नहीं होगा, यदि संबंधित भूमि वन संरक्षण अधिनियम की धारा 1ए के तहत छूट प्राप्त श्रेणी में आती है।चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने कहा कि वन संरक्षण अधिनियम, 1980 में संशोधन के बाद सुरक्षा संबंधी परियोजनाओं को विशेष छूट दी गई। इसलिए 26 नवंबर 2025 को पारित आदेश को उसी सीमा तक लागू माना जाएगा, जहां...

BREAKING| मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भोजशाला स्थल को घोषित किया मंदिर, नमाज़ पढ़ने की अनुमति वाला सर्कुलर रद्द किया

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने घोषणा की कि भोजशाला का विवादित ऐतिहासिक स्थल देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर है।'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' और अन्य लोगों द्वारा दायर रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने कहा:"हमने इस स्थल पर हिंदू पूजा-अर्चना की निरंतरता को नोट किया। हालांकि समय के साथ इसे विनियमित किया गया... हम यह निष्कर्ष दर्ज करते हैं कि इस जगह का ऐतिहासिक साहित्य इसे राजा भोज से जुड़े संस्कृत सीखने के केंद्र के रूप में स्थापित करता है... यह धार...

शराब कारोबारी की आत्महत्या मामले में CBI जांच के आदेश, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने FIR में देरी पर पुलिस को फटकार

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शराब कारोबारी की आत्महत्या मामले में बड़ा आदेश देते हुए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को FIR दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि स्थानीय पुलिस और वरिष्ठ अधिकारी FIR दर्ज करने में जानबूझकर देरी करते दिखे और ऐसा प्रतीत होता है कि वे आबकारी अधिकारी के प्रभाव में काम कर रहे थे।जस्टिस सुबोध अभ्यंकर की पीठ ने कहा कि मृतक द्वारा छोड़े गए वीडियो सुसाइड नोट में जिन रकमों का उल्लेख किया गया, वे बेहद बड़ी हैं और आत्महत्या से पहले वीडियो रिकॉर्ड किया जाना मामले को...

बुजुर्ग माता-पिता को संपत्ति बेचने से यूं ही नहीं रोका जा सकता, बच्चों को पहले साबित करने होंगे अधिकार: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि बच्चे मामूली आधार पर अदालत पहुंचकर अपने बुजुर्ग माता-पिता को संपत्ति का उपयोग करने या उसे बेचने से नहीं रोक सकते। अदालत ने कहा कि ऐसा करने से पहले बच्चों को यह प्रथम दृष्टया साबित करना होगा कि संपत्ति संयुक्त पारिवारिक संपत्ति है और उसमें उनका जन्मसिद्ध अधिकार मौजूद है।जस्टिस विवेक जैन की सिंगल बेंच ने निचली अपीलीय अदालत के आदेश को सही ठहराते हुए पिता की चार में से दो संपत्तियों को संयुक्त पारिवारिक संपत्ति माना जबकि बाकी दो...

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सड़क दुर्घटना में लापरवाह जांच के लिए पुलिस को फटकारा, सबूतों की कमी के कारण ड्राइवर को दी ज़मानत

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक ऐसे व्यक्ति को ज़मानत दी, जिस पर एक गाड़ी चलाने का आरोप था, जिससे एक कंस्ट्रक्शन साइट पर 5 मज़दूरों की जान चली गई और 11 घायल हो गए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जांच "लापरवाह तरीके से" की गई और पहली नज़र में ऐसा कोई सीधा सबूत नहीं मिला जो उस व्यक्ति को दोषी ठहराता हो।जस्टिस संजीव एस. कलगांवकर की बेंच ने यह टिप्पणी की:"यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतनी भयानक घटना में इतनी लापरवाही से जांच की गई। पहली नज़र में केस डायरी में मौजूदा आवेदक के खिलाफ कोई सीधा दोषी ठहराने वाला सबूत नहीं...

काले हिरणों की मौत का मामला | ज़मानत खारिज होने के बाद बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार्य नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दोहराया

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका खारिज की। इस व्यक्ति ने दो काले हिरणों की मौत से जुड़े मामले में अपनी अवैध हिरासत का आरोप लगाया था। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ऐसी याचिका तब स्वीकार्य नहीं है, जब याचिकाकर्ता की ज़मानत अर्जी पहले ही इस कोर्ट द्वारा खारिज की जा चुकी हो।जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीज़न बेंच ने यह टिप्पणी की:"मौजूदा मामले में भी, जैसा कि ऊपर बताया गया, याचिकाकर्ता की ज़मानत अर्जी (यानी M.Cr.C. No.5598 of...

भोजशाला विवाद: 1935 में नमाज की अनुमति देने का अधिकार धार रियासत को था: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में हस्तक्षेपकर्ता की दलील; फैसला सुरक्षित

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद विवाद से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान हस्तक्षेपकर्ता ने दलील दी कि वर्ष 1935 में धार रियासत सक्षम प्राधिकारी थी, इसलिए मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति देने वाली व्यवस्था वैध मानी जानी चाहिए।यह दलील केंद्र सरकार के उस तर्क के जवाब में दी गई, जिसमें कहा गया कि धार रियासत द्वारा 1935 में जारी अधिसूचना, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय...

अपनी ACR मांगने का कर्मचारी को अधिकार, निजता का हवाला देकर जानकारी नहीं रोक सकता राज्य: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी सरकारी कर्मचारी सूचना का अधिकार कानून के तहत अपनी वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ACR) की प्रतियां मांग सकता है और राज्य सरकार निजता का हवाला देकर ऐसी जानकारी देने से इनकार नहीं कर सकती।जस्टिस दीपक खोत की पीठ ने कहा कि जब किसी कर्मचारी के पास जानकारी प्राप्त करने का कोई अन्य प्रभावी उपाय नहीं बचता, तब वह RTI कानून के तहत आवेदन करने के लिए बाध्य होता है। ऐसे मामलों में केवल इस आधार पर आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता कि सार्वजनिक हित और निजता के बीच संतुलन को लेकर अलग...

आरोपियों को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन: पुलिस द्वारा कथित जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण परेड की जांच के आदेश

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने रायसेन के पुलिस अधीक्षक को उन आरोपों की प्रारंभिक जांच करने का निर्देश दिया कि पुलिस कर्मियों ने 'जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से' याचिकाकर्ता और अन्य सह-आरोपियों को सार्वजनिक परेड के लिए मजबूर किया।जस्टिस हिमांशु जोशी की बेंच ने टिप्पणी की कि अनुच्छेद 21 के तहत उल्लंघन साबित करने के लिए याचिकाकर्ता को यह साबित करना होगा कि पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई 'जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण थी। उसका मकसद याचिकाकर्ता को अपमानित करना या नीचा दिखाना था।'हालांकि, बेंच ने यह भी कहा...