दो साल बाद बिना किसी धोखाधड़ी सबूत के भवन निर्माण की अनुमति रद्द नहीं कर सकता निगम: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

  • दो साल बाद बिना किसी धोखाधड़ी सबूत के भवन निर्माण की अनुमति रद्द नहीं कर सकता निगम: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इंदौर नगर निगम द्वारा जारी भवन निर्माण अनुमति निरस्तीकरण और ध्वस्तीकरण (डिमोलिशन) नोटिस को रद्द करते हुए कहा कि एक बार सक्षम प्राधिकारी द्वारा वैध रूप से भवन निर्माण की अनुमति दिए जाने और उसके आधार पर निर्माण कार्य हो जाने के बाद, धोखाधड़ी या तथ्य छिपाने का कोई प्रमाण न होने पर अनुमति वापस नहीं ली जा सकती।

    जस्टिस जय कुमार पिल्लई की पीठ ने कहा कि बिना किसी धोखाधड़ी के सबूत के, नागरिक द्वारा भारी निवेश कर निर्माण किए जाने के बाद अनुमति रद्द करना मनमाना, अनुचित और संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन है।

    मामले में याचिकाकर्ताओं को वर्ष 2017 में इंदौर स्थित अपनी संपत्ति पर निर्माण की अनुमति मिली थी। आवश्यक जांच और सार्वजनिक आपत्तियों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद निगम ने भवन योजना मंजूर की थी। इसके आधार पर याचिकाकर्ताओं ने तीन मंजिला भवन का निर्माण कर लिया।

    करीब दो वर्ष बाद निगम ने यह कहते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया कि स्वीकृत नक्शे में सड़क की चौड़ाई 18 मीटर दर्शाई गई थी, जबकि मास्टर प्लान में 30 मीटर चौड़ी सड़क प्रस्तावित थी। इसके बाद निगम ने भवन अनुमति रद्द कर दी और ध्वस्तीकरण नोटिस जारी कर दिया।

    हाईकोर्ट ने पाया कि निर्माण अनुमति देने से पहले निगम के भवन निरीक्षक ने स्वयं स्थल का निरीक्षण किया था और 18 मीटर चौड़ी सड़क की स्थिति दर्ज की थी। अदालत ने कहा कि ऐसे में बाद में अनुमति को याचिकाकर्ताओं द्वारा किए गए किसी कथित छल या गलत प्रस्तुतीकरण का परिणाम नहीं माना जा सकता।

    अदालत ने यह भी कहा कि निगम अपने अधिकारियों की गलती पर चुप्पी साधे हुए है और उसका भार याचिकाकर्ताओं पर डालने का प्रयास कर रहा है। चूंकि याचिकाकर्ताओं द्वारा किसी तथ्य को छिपाने या गलत जानकारी देने का कोई प्रमाण नहीं था, इसलिए अनुमति निरस्त करने की कार्रवाई कानूनन टिक नहीं सकती।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने भवन अनुमति निरस्तीकरण आदेश और ध्वस्तीकरण नोटिस दोनों को रद्द कर दिया।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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