श्यामला हिल्स अतिक्रमण मामला: हाईकोर्ट ने बेदखली पर रोक से किया इनकार, कहा- सरकारी जमीन पर कोई कानूनी अधिकार साबित नहीं

Amir Ahmad

2 Jun 2026 5:40 PM IST

  • श्यामला हिल्स अतिक्रमण मामला: हाईकोर्ट ने बेदखली पर रोक से किया इनकार, कहा- सरकारी जमीन पर कोई कानूनी अधिकार साबित नहीं

    भोपाल के श्यामला हिल्स क्षेत्र में सरकारी भूमि पर रह रहे लोगों को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा। हाईकोर्ट ने बेदखली की कार्रवाई पर आगे किसी भी प्रकार की रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता विवादित भूमि पर अपना कोई कानूनी, स्वामित्व, पट्टाधिकार, किरायेदारी या वनाधिकार स्थापित करने में असफल रहे हैं। ऐसे में उनके पक्ष में कोई न्यायसंगत आधार नहीं बनता, जिसके आधार पर अदालत हस्तक्षेप करे।

    जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस विवेक जैन की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता न तो भूमि के आवंटित धारक हैं और न ही उनके पास उस पर किसी प्रकार का वैध अधिकार है।

    अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता स्वयं स्वीकार कर चुके हैं कि वे अपना दावा खुर्शीद अहमद के माध्यम से कर रहे हैं, जबकि संबंधित दीवानी वाद में उनका पक्ष पहले ही निचली अदालत में खारिज हो चुका है। वर्ष 1997 से इस संबंध में अपील लंबित है, लेकिन पिछले 29 वर्षों में भी उनके पक्ष में कोई राहत नहीं दी गई।

    अदालत ने कहा कि जब याचिकाकर्ता भूमि पर अपने किसी मौलिक या कानूनी अधिकार को साबित नहीं कर सके, तब उनके पक्ष में कोई ऐसी समानता या न्यायोचित आधार नहीं बनता, जिसके चलते बेदखली की कार्रवाई पर रोक लगाई जाए।

    हालांकि, अदालत ने राज्य सरकार को यह भी याद दिलाया कि विस्थापित होने वाले लोगों के पुनर्वास की जिम्मेदारी सरकार की है।

    खंडपीठ ने कहा कि निष्पक्षता और मानवीय दृष्टिकोण की मांग है कि जिन लोगों को हटाया जा रहा है, उन्हें सरकार की नीति के अनुसार मूलभूत सुविधाएं और पुनर्वास सहायता उपलब्ध कराई जाए।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि बेदखली जिस दिन भी हो, उसी दिन से सरकार पुनर्वास संबंधी सभी आवश्यक सहायता सुनिश्चित करे। इस संबंध में महाधिवक्ता द्वारा भी सहमति जताई गई।

    मामले की शुरुआत अगस्त 2025 में हुई थी, जब भोपाल के नायब तहसीलदार ने श्यामला हिल्स की भूमि पर रहने वाले लोगों को अतिक्रमणकारी मानते हुए उन्हें हटाने का आदेश जारी किया था।

    इस आदेश के खिलाफ निवासियों ने अनुविभागीय अधिकारी के समक्ष अपील दायर की, लेकिन दिसंबर 2025 में वह भी खारिज की गई। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

    याचिकाकर्ताओं का दावा था कि उनके परिवार लगभग सात दशक से इस क्षेत्र में रह रहे हैं और उनमें से कई अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित हैं। उनका कहना था कि भूमि राजस्व अभिलेखों में "छोटे झाड़ का जंगल" के रूप में दर्ज है, इसलिए उसे वन भूमि माना जाना चाहिए। उन्होंने वनाधिकार कानून, 2006 के तहत पारंपरिक वनवासी होने का दावा करते हुए अपने अधिकारों की मान्यता के लिए आवेदन भी दिए।

    हालांकि, अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ताओं का विवादित सर्वे नंबर पर वैध कब्जा या अधिकार है।

    अदालत ने वन विभाग के उस पत्र का भी उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट किया गया कि यह भूमि न तो आरक्षित वन है और न ही संरक्षित वन तथा यह वन विभाग के नियंत्रण में भी नहीं आती।

    खंडपीठ ने कहा कि बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद याचिकाकर्ता स्वामित्व, पट्टा, आवंटन, किरायेदारी या किसी अन्य वैधानिक अधिकार से संबंधित कोई ठोस दस्तावेज पेश नहीं कर सके। इसलिए उनके पक्ष में बेदखली से संरक्षण जारी रखने का कोई आधार नहीं है।

    इसी के साथ हाईकोर्ट ने अंतरिम राहत की मांग खारिज करते हुए अपील का निपटारा किया। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मूल रिट याचिका अभी लंबित है और उस पर सुनवाई जारी रहेगी।

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