भरण-पोषण न देने पर पति को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
26 May 2026 6:28 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण राशि की वसूली के लिए की जाने वाली गिरफ्तारी केवल पालन सुनिश्चित कराने का माध्यम है, इसे अनिश्चितकालीन दंडात्मक कारावास में नहीं बदला जा सकता।
जस्टिस हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने अक्टूबर 2025 से जेल में बंद एक मजदूर को रिहा करने का आदेश देते हुए कहा कि किसी निर्धन व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रखने से भरण-पोषण कानून का उद्देश्य ही विफल हो सकता है, क्योंकि वह भविष्य में कमाकर भुगतान करने में असमर्थ हो जाता है।
अदालत ने कहा,
“किसी निर्धन व्यक्ति की लगातार हिरासत, जो लंबे कारावास के कारण अपनी असमर्थता जता रहा हो, अंततः भरण-पोषण कानून के उद्देश्य को ही विफल कर सकती है क्योंकि हिरासत में रहने वाला व्यक्ति भविष्य की देनदारियां चुकाने के लिए आर्थिक रूप से अक्षम हो जाता है।”
मामले में पत्नी और दो नाबालिग बच्चों ने पति पर उपेक्षा और भरण-पोषण न देने का आरोप लगाते हुए कार्यवाही शुरू की थी।
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने 17 सितंबर 2024 को आदेश पारित कर पति को पत्नी को 1500 रुपये और दोनों बच्चों को 750-750 रुपये प्रतिमाह देने का निर्देश दिया था। कुल भरण-पोषण राशि 3000 रुपये प्रतिमाह तय की गई थी।
बाद में लगभग 1.38 लाख रुपये के बकाया की वसूली के लिए निष्पादन कार्यवाही शुरू हुई।
अदालत द्वारा जारी वारंट के आधार पर 30 अक्टूबर 2025 को पति को गिरफ्तार कर राहिल जेल भेज दिया गया।जेल में रहते हुए उसने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 48 के तहत रिहाई की मांग की।
उसने अदालत को बताया कि वह मजदूरी कर जीविका चलाता है और लंबे समय तक जेल में रहने के कारण उसकी आय पूरी तरह बंद हो गई। उसने यह भी कहा कि वह पहले ही 1.20 लाख रुपये जमा कर चुका है।
हालांकि, ट्रायल कोर्ट और पुनरीक्षण अदालत ने यह कहते हुए राहत देने से इनकार किया कि अभी भी काफी बकाया राशि बाकी है।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि एक ही निष्पादन कार्यवाही में चार महीने से अधिक समय तक लगातार जेल में रखना कानून की भावना के विपरीत है और यह दंडात्मक स्वरूप ले चुका है।
अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 और BNSS के संबंधित प्रावधानों का उद्देश्य पत्नी, बच्चों और माता-पिता को दरिद्रता और आर्थिक परित्याग से बचाना है। इसलिए इन प्रावधानों के तहत की जाने वाली कार्यवाही न्यायसंगत और संतुलित होनी चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा,
“भरण-पोषण मामलों में कारावास केवल दबाव बनाने का माध्यम है, न कि आपराधिक सजा की तरह दंड देने का तरीका। जब हिरासत प्रभावी दबाव का साधन न रहकर अनिश्चितकालीन दंडात्मक कैद बन जाए तो वह कानून की सीमा से बाहर चली जाती है।”
अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता मजदूर है और उसकी कमाई शारीरिक श्रम पर निर्भर है। ऐसे में लंबे कारावास के कारण उसकी कमाने की क्षमता पूरी तरह समाप्त हो गई।
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण उनका कानूनी अधिकार है और पति इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए याचिकाकर्ता की रिहाई का आदेश दिया। साथ ही निर्देश दिया कि रिहाई के 30 दिनों के भीतर वह 25 हजार रुपये निष्पादन अदालत में जमा करे और भविष्य में नियमित रूप से भरण-पोषण राशि अदा करता रहे।

