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मोटर दुर्घटना दावों में आय की हानि की गणना करते समय फैमिली पेंशन नहीं काटी जा सकती: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
मोटर दुर्घटना दावों में आय की हानि की गणना करते समय फैमिली पेंशन नहीं काटी जा सकती: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना मुआवज़ा मामले में आय की हानि की गणना करते समय मृतक के आश्रितों को मिलने वाली पेंशन राशि में कटौती करना स्वीकार्य नहीं होगा।जस्टिस संजय धर ने रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी द्वारा दायर अपील खारिज करते हुए कहा,"आय की हानि की गणना के लिए पेंशन राशि में कटौती किए बिना मासिक वेतन को स्वीकार किया जाना चाहिए।"मामले की पृष्ठभूमियह मामला सड़क दुर्घटना से उत्पन्न हुआ, जिसमें जम्मू के 54 वर्षीय पूर्व सैनिक विजय कुमार की मृत्यु हो गई। उनकी विधवा संतोष...

पासपोर्ट अपडेट: तलाकशुदा मां को मिली बड़ी राहत, पिता की NOC के बिना बच्चों का पासपोर्ट नवीनीकरण होगा: गुजरात हाईकोर्ट
पासपोर्ट अपडेट: तलाकशुदा मां को मिली बड़ी राहत, पिता की NOC के बिना बच्चों का पासपोर्ट नवीनीकरण होगा: गुजरात हाईकोर्ट

गुजरात हाईकोर्ट ने तलाकशुदा महिला की याचिका को स्वीकार करते हुए उसे बड़ी राहत दी। कोर्ट ने पिता का अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) न होने के कारण पासपोर्ट प्राधिकरण द्वारा नाबालिग बच्चों के पासपोर्ट नवीनीकरण के इनकार को खारिज कर दिया।जस्टिस एलएस पीरजादा ने अपने फैसले में यह महत्वपूर्ण तथ्य नोट किया कि माता-पिता के बीच पहले ही तलाक की डिक्री प्राप्त हो चुकी है और एक समझौता ज्ञापन (MoU) निष्पादित हुआ है, जिसके तहत बच्चों की कस्टडी मां के पास है।कोर्ट ने पासपोर्ट नियम 1980 के प्रावधानों का हवाला देते हुए...

बार काउंसिल चुनाव: 1.25 लाख रजिस्ट्रेशन फीस के खिलाफ याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट का नोटिस
बार काउंसिल चुनाव: 1.25 लाख रजिस्ट्रेशन फीस के खिलाफ याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट का नोटिस

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के उस हालिया फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें राज्य बार काउंसिल चुनाव लड़ने के लिए रजिस्ट्रेशन फीस को बढ़ाकर 1,25,000 कर दिया गया।चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडला की खंडपीठ ने इस संबंध में केंद्र सरकार बार काउंसिल ऑफ इंडिया और बार काउंसिल ऑफ दिल्ली से जवाब मांगा।मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर को सूचीबद्ध की गई।यह याचिका वकील प्रमोद कुमार सिंह ने दायर की। याचिका में दावा किया गया कि 25 सितंबर को...

दिल्ली हाईकोर्ट ने फिल्म द ताज स्टोरी को CBFC प्रमाणपत्र देने के खिलाफ दायर याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार किया
दिल्ली हाईकोर्ट ने फिल्म 'द ताज स्टोरी' को CBFC प्रमाणपत्र देने के खिलाफ दायर याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार किया

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को फिल्म “द ताज स्टोरी” को दिए गए सर्टिफिकेट के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया। यह फिल्म 31 अक्टूबर को रिलीज़ होने वाली है।वकील शकील अब्बास द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि फिल्म में ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है और यह साम्प्रदायिक प्रचार फैलाती है। उन्होंने बताया कि फिल्म का ट्रेलर 16 अक्टूबर को जारी हुआ था और उन्हें इसकी जानकारी 22 अक्टूबर को मिली। चीफ़ जस्टिस देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला...

आपराधिक मुकदमों में आरोप तय करने में देरी पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता, देशभर में दिशा-निर्देश जारी करने पर विचार
आपराधिक मुकदमों में आरोप तय करने में देरी पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता, देशभर में दिशा-निर्देश जारी करने पर विचार

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को आपराधिक मुकदमों में आरोप तय करने में हो रही अत्यधिक देरी पर गहरी चिंता व्यक्त की है। यह देरी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 251(b) के तहत दिए गए स्पष्ट प्रावधान के बावजूद हो रही है, जिसके अनुसार जिन मामलों की सुनवाई केवल सत्र न्यायालय द्वारा की जानी है, उनमें पहली सुनवाई से 60 दिनों के भीतर आरोप तय किए जाने चाहिए।न्यायालय ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोप तय करने में देरी आपराधिक कार्यवाहियों के ठहराव का प्रमुख कारण है। इसलिए, यह “संपूर्ण देश में एक समान...

फ्लाईओवर पर जातिसूचक गाली देना सार्वजनिक दृष्टि के दायरे में आता, भले गवाह न हों: दिल्ली हाईकोर्ट
फ्लाईओवर पर जातिसूचक गाली देना 'सार्वजनिक दृष्टि' के दायरे में आता, भले गवाह न हों: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की है कि किसी महिला पर हमला करना और फ्लाईओवर पर उसके खिलाफ जातिगत टिप्पणी करना “सार्वजनिक दृष्टि” (public view) के अंतर्गत आता है, जिससे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध बनता है।जस्टिस रविंदर दुडेजा ने यह टिप्पणी एक व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए की और कहा कि इस मामले में prima facie (प्रथम दृष्टया) अपराध के सभी आवश्यक तत्व पूरे होते हैं। अदालत ने कहा,“कथित घटना सड़क पर, एक फ्लाईओवर पर हुई थी, जिसे कोई भी...

“साली” शब्द अभद्र गाली है, लेकिन जानबूझकर अपमान नहीं: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने धारा 504 IPC की सजा रद्द की
“साली” शब्द अभद्र गाली है, लेकिन जानबूझकर अपमान नहीं: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने धारा 504 IPC की सजा रद्द की

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि सिर्फ “साली” शब्द का इस्तेमाल, भले ही वह अभद्र गाली हो, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 504 के तहत “जानबूझकर अपमान” नहीं माना जा सकता — जब तक कि वह व्यक्ति को शांति भंग करने के लिए उकसाए या ऐसी संभावना उत्पन्न करे।जस्टिस राकेश कंठला ने टिप्पणी की — “वर्तमान मामले में 'साली' शब्द का प्रयोग अभद्र गाली के रूप में किया गया है। लेकिन पीड़िता या सूचनाकर्ता ने यह नहीं कहा कि इस शब्द या इन गालियों ने उसे शांति भंग करने के लिए उकसाया।” कोर्ट ने कहा, “धारा 504 का...

अगर प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद हों तो हथियार की बरामदगी जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने हत्या की सजा बरकरार रखी
अगर प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद हों तो हथियार की बरामदगी जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने हत्या की सजा बरकरार रखी

सुप्रीम कोर्ट ने 28 अक्टूबर को दोहरे हत्याकांड मामले में चार दोषियों की सजा बरकरार रखते हुए 2011 से लंबित आपराधिक अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि भले ही एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई हो और हथियार बरामद न हुए हों, लेकिन अभियोजन पक्ष का मामला प्रत्यक्षदर्शियों की सुसंगत गवाही और मेडिकल साक्ष्य पर आधारित है, जिससे साबित होता है कि आरोपियों ने जानबूझकर और इरादतन शिकायतकर्ता पक्ष पर घातक हथियारों से हमला किया।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने Nankaunoo बनाम उत्तर प्रदेश...

बैंकों को मानहानि के लिए आरोपी के रूप में समन नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
बैंकों को मानहानि के लिए आरोपी के रूप में समन नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने यह व्यवस्था दी कि बैंकों को मानहानि के लिए आरोपी के रूप में समन नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनमें अपराध के गठन के लिए आवश्यक आपराधिक मनःस्थिति या दुर्भावना की कमी होती है।जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने फैसला सुनाते हुए कहा कि बैंकों द्वारा किसी कंपनी को धोखाधड़ी घोषित करने का कार्य जो उन्होंने अपने बैंकिंग गतिविधियों के निर्वहन और सद्भाव में किया, वह मानहानि नहीं माना जा सकता है।कोर्ट चार बैंकों के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा दायर याचिकाओं के बैच पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें ट्रायल...

अदालत की गरिमा बनाए रखने के लिए वकील को मना करने पर दलीलें रोकना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट
अदालत की गरिमा बनाए रखने के लिए वकील को मना करने पर दलीलें रोकना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि एक बार जब बेंच अपना मन बता दे और वकील से आगे की दलीलें न देने का अनुरोध करे तो उस निर्देश का सम्मान किया जाना चाहिए।कोर्ट ने जोर देते हुए कहा कि इसके बाद लगातार जोर देना किसी उद्देश्य को पूरा नहीं करता और यह अदालती कार्यवाही की गरिमा को प्रभावित करता है।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने 28 अक्टूबर को पारित आदेश में कहा,"एक बार जब कोर्ट अपना मन बता देता है और वकील से आगे की दलीलें देने से परहेज करने का अनुरोध करता है तो इसका...

अगर जूनियर जज केसों की सुनवाई छोड़ जिला जज परीक्षा पर ध्यान देंगे तो निचली न्यायपालिका संकट में पड़ जाएगी: सुप्रीम कोर्ट
अगर जूनियर जज केसों की सुनवाई छोड़ जिला जज परीक्षा पर ध्यान देंगे तो निचली न्यायपालिका संकट में पड़ जाएगी: सुप्रीम कोर्ट

उच्च न्यायिक सेवा में वरिष्ठता और पदोन्नति को लेकर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में सुनवाई शुरूसुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने मंगलवार को उच्च न्यायिक सेवा (Higher Judicial Service) में आपसी वरिष्ठता (inter-se seniority) और जिला जज पदों में पदोन्नति कोटा से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई शुरू की। यह मामला उन निचली अदालत के न्यायिक अधिकारियों की पदोन्नति से जुड़ा है, जो सिविल जज (जूनियर डिवीजन) या न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में सेवा शुरू करते हैं और बाद में पदोन्नति के सीमित अवसरों के कारण कैरियर में...

2013 संशोधन से पहले के मामलों में बलात्कार दोषसिद्धि के लिए पीड़िता की उम्र 16 वर्ष से कम साबित करना जरूरी: दिल्ली हाईकोर्ट
2013 संशोधन से पहले के मामलों में बलात्कार दोषसिद्धि के लिए पीड़िता की उम्र 16 वर्ष से कम साबित करना जरूरी: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि 2013 के आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम लागू होने से पहले दर्ज हुए बलात्कार के मामलों में, अभियोजन पक्ष को यह साबित करना आवश्यक है कि पीड़िता की उम्र 16 वर्ष से कम थी, तभी आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है।जस्टिस स्वर्णा कांत शर्मा की एकल पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए एक व्यक्ति को बरी किया, जिसे वर्ष 2005 में 11 वर्षीय बच्ची के बलात्कार के आरोप में दोषी ठहराया गया था। अदालत ने कहा कि अपराध 2005 में हुआ था, जब भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के तहत सहमति की आयु 16...