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राजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 25: राजस्व न्यायालयों और अधिकारियों की शक्तियाँ और कर्तव्य
राजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम, 1956 के अंतर्गत, विभिन्न राजस्व अधिकारियों और न्यायालयों को विशिष्ट शक्तियाँ और कर्तव्य सौंपे गए हैं। धारा 25 विशेष रूप से यह निर्धारित करती है कि कौन-सा अधिकारी अपने क्षेत्र में कौन-कौन से कार्य करेगा, उसकी सीमाएँ क्या होंगी और उसके अधिकार कितने व्यापक होंगे। इस लेख में हम धारा 25 के प्रत्येक उपखंड को विस्तार से सरल भाषा में समझेंगे, ताकि कोई भी व्यक्ति इसे आसानी से समझ सके।धारा 25(1) – संभागीय आयुक्त, कलेक्टर, उपखण्ड अधिकारी और तहसीलदार के अधिकार और कर्तव्यधारा...
क्या मेस्ने प्रॉफिट्स से जुड़े मुकदमों में कोर्ट फीस अलग से देनी पड़ती है? – धारा 42 राजस्थान न्यायालय शुल्क और वाद मूल्यांकन अधिनियम 1961
राजस्थान न्यायालय शुल्क और वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1961 (Rajasthan Court Fees and Suits Valuation Act, 1961) न्यायालय शुल्क (Court Fee) से जुड़े हर पहलू को विस्तार से नियंत्रित करता है। जब संपत्ति के कब्जे से जुड़े विवाद होते हैं, तो केवल कब्जा (Possession) ही नहीं बल्कि उस कब्जे के दौरान उत्पन्न होने वाले आय या लाभ (Mesne Profits) के लिए भी मुकदमे दायर किए जाते हैं। ऐसे मामलों में कोर्ट फीस की गणना कैसे होगी, इसका विस्तृत प्रावधान धारा 42 (Section 42) में दिया गया है।धारा 42 विशेष रूप से उन...
NI Act में किसी चेक बाउंस केस में ट्रायल के शुरू होने के पहले ही प्रतिकर
NI Act में प्रतिकर के संदाय के सम्बन्ध में कोई प्रावधान नहीं था। 2018 में संशोधन के द्वारा इस सम्बन्ध में धारा 143-क अन्तरिम प्रतिकर का प्रावधान किया गया है। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 (3) का सन्दर्भ यहाँ लिया जाता है।धारा 143 - क के प्रावधान दण्ड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों पर अधिभावी प्रभाव रखते हैं। कब अन्तरिम प्रतिकर [ धारा 143 क (1) ] - धारा 138 के अधीन अपराध का विचारण करने वाला कोर्ट चेक के लेखीवाल कोसंक्षिप्त विचारण या समन मामले में जहाँ परिवाद में उसने किए गए अभियोग का दोषी...
NI Act में चेक बाउंस केस की ट्रायल प्रक्रिया
इस एक्ट में यह प्रोसेस है कि चेक बाउंस के केस का समरी ट्रायल किया जाएगा। लेकिन इस समरी ट्रायल केस में भी वर्षों का समय लग जाता है। चेकों के अनादरण को अपराध के रूप में अधिनियम में उपबन्धित करने के बाद चेक अनादरण के मामलों में वृद्धि हुई। धारा 138 के अधीन परिवादों की संख्या में इतनी अधिक संख्या में वृद्धि हो गई कि न्यायालयों को इन्हें युक्तियुक्त समय में सम्भालना असम्भव सा हो गया और इसका न्यायालयों के आपराधिक के सामान्य कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगा। अतः कुछ और अनुतोषीय उपाय को लाना आवश्यक...
धारा 41, राजस्थान न्यायालय शुल्क अधिनियम 1961 के तहत मकान मालिक और किरायेदार के बीच विवाद में न्यायालय शुल्क की गणना
राजस्थान कोर्ट फीस और वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1961 (Rajasthan Court Fees and Suits Valuation Act, 1961) किराया संबंधी मुकदमों में Court Fee (न्यायालय शुल्क) की गणना का स्पष्ट आधार प्रदान करता है। ऐसे मुकदमे, जो मकान मालिक (Landlord) और किरायेदार (Tenant) के बीच होते हैं, आमतौर पर किराए, कब्जे या पट्टे (Lease) के विवाद से जुड़े होते हैं। धारा 41 (Section 41) विशेष रूप से ऐसे ही विवादों में लागू होती है और यह बताती है कि Court Fee किस आधार पर ली जाएगी।इस लेख में हम धारा 41 के अंतर्गत आने वाले...
धारा 434 और 435, BNSS, 2023 : अपीलीय न्यायालय के अंतिम निर्णय और अपील करने वाले की मृत्यु पर अपील का अंत
आपराधिक न्याय व्यवस्था (Criminal Justice System) में अपील (Appeal) का अधिकार एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। जब किसी पक्ष को लगता है कि ट्रायल कोर्ट (Trial Court) में कोई गलती हुई है, तो वह उच्च न्यायालय (Higher Court) से फैसले की समीक्षा (Review) की मांग कर सकता है। लेकिन यह अधिकार भी अनंत नहीं होता। एक समय आता है जब अपीलीय न्यायालय (Appellate Court) का निर्णय अंतिम और बाध्यकारी (Final and Binding) माना जाता है। धारा 434 इसी "Finality" से जुड़ा हुआ है।वहीं दूसरी ओर, धारा 435 एक विशेष...
राजस्व न्यायालयों और नियंत्रण प्रणाली की संरचना: राजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम, 1956 की धाराएँ 20-A से 23
राज्य में भूमि से जुड़े विवादों की संख्या बहुत अधिक होती है, और इनमें निर्णय लेने के लिए एक न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता होती है। राजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम, 1956 में पहले ही राजस्व अधिकारियों की नियुक्ति और उनके अधिकारों का वर्णन किया गया है।अब Sections 20-A से 23 में राजस्व अपीलीय प्राधिकारी, पद के अनुसार की गई नियुक्तियाँ, उनकी अधिसूचना, और न्यायिक तथा गैर-न्यायिक कार्यों पर नियंत्रण से संबंधित प्रावधानों को दर्शाया गया है। Section 20-A – राजस्व अपीलीय प्राधिकारी (Revenue...
क्या बैंक किसी Borrower को Fraud घोषित करने से पहले उसका पक्ष सुने बिना निर्णय ले सकते हैं?
State Bank of India v. Rajesh Agarwal नामक ऐतिहासिक निर्णय में, जो 27 मार्च 2023 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाया गया, एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न पर विचार किया गया कि क्या किसी Borrower (उधारकर्ता) को Fraudulent (धोखाधड़ी करने वाला) घोषित करने से पहले उसे सुनवाई का अवसर (Right to be Heard) देना ज़रूरी है या नहीं।कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि Reserve Bank of India (RBI) की Master Directions on Frauds, 2016 को संविधान की मूल भावना और न्यायसंगत प्रक्रिया (Fair Procedure) के अनुसार पढ़ा जाना चाहिए। ...
NI Act में चेक बाउंस का केस लीगल लिमिटेशन में होना
विधिक अवधि के अन्तर्गत परिवाद-धारा 142 का खण्ड (ख) यह उपबन्धित करता है कि धारा 138 के अधीन अभियोजन के लिए परिवाद एक माह के अन्दर उस तिथि से जब से धारा 138 के खण्ड (ग) के अधीन वाद हेतुक उत्पन्न होता है। इस धारा के सरल पाठन से यह स्पष्ट है कि एक सक्षम कोर्ट धारा 138 के अधीन अपराध का संज्ञान विहित अवधि (एक माह) के अन्दर लिखित परिवाद पर ही ले सकता है।सदानन्द भादरन बनाम माधवन सुनील कुमाएँ, के वाद में सुप्रीम कोर्ट धारा 142 के अधीन खण्ड (ख) के अर्थ को स्पष्ट करने का अवसर मिला। यह ध्यान में रखने के लिए...
NI Act में चेक बाउंस के केस संबंधित प्रक्रिया
NI Act में चेक बाउंस के केस से संबंधित प्रक्रिया दी हुई है। इस एक्ट में तीन तरह के इंस्ट्रूमेंट से संबंधित प्रावधान हैं लेकिन चेक बाउंस से संबंधित प्रक्रिया धारा 142 में विशेष रूप से दी गयी है। यह धारा 142 धारा 138 के अंतर्गत गठित अपराध के संबंध में प्रस्तुत किए गए परिवाद के संज्ञान की शर्तों को निर्धारित कर रही है।किसी परिवाद परपरिवाद विधिक अवधि एक के अन्दरमहानगरीय मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के समक्षकिसी अपराध का संज्ञान लेना किसी अपराधी के विरुद्ध न्यायिक कार्यवाही को साशय प्रारम्भ...
धारा 40 राजस्थान न्यायालय शुल्क मूल्यांकन अधिनियम, 1961 – विशिष्ट निष्पादन के वादों में न्याय शुल्क की गणना
राजस्थान न्यायालय शुल्क और वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1961 (Rajasthan Court Fees and Suits Valuation Act, 1961) का उद्देश्य विभिन्न प्रकार के दीवानी वादों में न्यायालय शुल्क की गणना के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश प्रदान करना है। इस अधिनियम की धारा 40 विशेष रूप से उन वादों से संबंधित है जहाँ वादी किसी अनुबंध के विशिष्ट निष्पादन (Specific Performance) की मांग करता है। इस धारा में यह निर्धारित किया गया है कि ऐसे वादों में न्यायालय शुल्क किस प्रकार से और कितनी राशि पर निर्धारित किया जाएगा।धारा 40 का सारांश ...
राजस्व प्रशासन में अधिकारियों की नियुक्ति: धारा 17 से 20, राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की
राज्य में ज़मीन से जुड़ी व्यवस्था और राजस्व (Revenue) प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक संगठित ढांचा आवश्यक होता है। इस उद्देश्य से राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 के तहत राज्य सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अलग-अलग स्तरों पर विभिन्न प्रकार के राजस्व अधिकारी नियुक्त कर सके।पहले के प्रावधानों जैसे धारा 4 में Board of Revenue की स्थापना और धारा 6 से 14 तक Revenue Officers की श्रेणियों और उनकी शक्तियों को निर्धारित करने के बाद, अब धाराs 17 से 20 तक राज्य सरकार द्वारा किए जाने वाले...
धारा 433 BNSS, 2023 – जब अपीलीय पीठ के न्यायाधीशों की राय समान रूप से विभाजित हो
किसी भी आपराधिक न्याय व्यवस्था (Criminal Justice System) में अपील का अधिकार (Right to Appeal) न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का एक आवश्यक अंग होता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में अध्याय XXX (Chapter XXX) के अंतर्गत अपील से संबंधित विस्तृत प्रक्रियाएं दी गई हैं।इन्हीं प्रावधानों में एक महत्वपूर्ण स्थिति तब आती है जब हाईकोर्ट (High Court) में अपील की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों की राय एक समान नहीं होती—यानी वे विभाजित मत (Equally Divided Opinion) में रहते हैं। ऐसी स्थिति से कैसे...
क्या हाईकोर्ट, आर्म्ड फोर्सेज ट्राइब्यूनल के फैसलों को चुनौती देने वाली रिट याचिकाएं सुन सकता है?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा Union of India बनाम परशोतम दास (Parashotam Dass) [2023] में दिया गया निर्णय एक ऐतिहासिक फ़ैसला है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि क्या देश के हाई कोर्ट्स (High Courts) आर्म्ड फोर्सेज ट्राइब्यूनल (Armed Forces Tribunal – AFT) के निर्णयों को रिट याचिका (Writ Petition) द्वारा चुनौती देने वाले मामलों की सुनवाई कर सकते हैं या नहीं।इस फैसले से पहले Union of India बनाम मेजर जनरल श्रीकांत शर्मा (Shri Kant Sharma) (2015) के मामले में कहा गया था कि हाईकोर्ट ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं...
धारा 15 राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 के तहत प्रशासनिक सीमाओं की संरचना
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956, राज्य में ज़मीन से जुड़े प्रशासन और Revenue व्यवस्था को संचालित करने वाला एक मुख्य कानून है। इस Act की शुरुआत में ज़मीन से जुड़ी संस्थाओं और अधिकारियों की नियुक्ति से लेकर उनके अधिकारों और कार्यों का विवरण दिया गया है। जैसे—Section 4 में Board of Revenue की स्थापना होती है, Section 6 से 8 तक Revenue Officers जैसे Divisional Commissioner, Collector, Tehsildar आदि की नियुक्ति होती है। फिर Section 9 में Board को इन अधिकारियों पर Supervisory (निरीक्षणात्मक) अधिकार...
धारा 432 BNSS 2023 : अपीलीय न्यायालय द्वारा अतिरिक्त साक्ष्य लेना या उसे लेने का निर्देश देना
अदालतों द्वारा दिए गए निर्णय अंतिम माने जाते हैं, लेकिन हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था में अपील का अधिकार एक महत्वपूर्ण अधिकार है, जिससे किसी भी व्यक्ति को न्याय पाने का दूसरा मौका मिलता है। जब कोई मामला अपीलीय अदालत में पहुँचता है, तब वहाँ सिर्फ रिकॉर्ड देख कर ही निर्णय नहीं लिया जाता, बल्कि यदि आवश्यक हो, तो अदालत खुद से या अन्य किसी सक्षम अदालत को यह आदेश दे सकती है कि अतिरिक्त साक्ष्य (Additional Evidence) लिया जाए। यही प्रावधान धारा 432 में किया गया है।अपीलीय न्यायालय द्वारा अतिरिक्त साक्ष्य...
धारा 39 राजस्थान कोर्ट फीस मूल्यांकन अधिनियम, 1961 : कुर्की रद्द करने के वादों में न्याय शुल्क की गणना
राजस्थान न्यायालय शुल्क और वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1961 (Rajasthan Court Fees and Suits Valuation Act, 1961) का उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि विभिन्न प्रकार के दीवानी वादों (Civil Suits) में न्यायालय शुल्क (Court Fee) किस प्रकार से लिया जाएगा। यह अधिनियम न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता (Transparency) बनाए रखने में सहायक होता है और सुनिश्चित करता है कि सभी वादी (Plaintiff) या प्रतिवादी (Defendant) समान न्यायिक प्रक्रिया का पालन करें।इस अधिनियम की धारा 39 विशेष रूप से उन मामलों से संबंधित है...
क्या केंद्र सरकार बिना कानून बदले किसी State Administrative Tribunal को खत्म कर सकती है?
Orissa Administrative Tribunal Bar Association v. Union of India नामक मामले में, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 21 मार्च 2023 को निर्णयित किया, यह तय किया गया कि क्या केंद्र सरकार (Union Government) के पास यह अधिकार है कि वह एक बार बनाए गए राज्य प्रशासनिक अधिकरण (State Administrative Tribunal या SAT) को समाप्त (Abolish) कर सकती है, वह भी बिना संसद में किसी नए कानून को पारित किए।इस केस का मुख्य मुद्दा यह था कि जब संविधान के Article 323-A और Administrative Tribunals Act, 1985 के तहत एक Tribunal को स्थापित...
NI Act में बैंक कब किसी चेक को भूनने से इनकार कर सकती है?
चेक के सम्बन्ध में लेखीवाल एवं ऊपरवाल (बैंक) के बीच में संविदात्मक सम्बन्ध होता है। ऐसा सम्बन्ध पाने वाला या धारक एवं बैंक के बीच में नहीं होता है। इस प्रकार पाने वाला/धारक बैंक के विरुद्ध कोई उपचार नहीं रखता है।अतः उक्त (i) एवं (ii) के सम्बन्ध में चेक के बाउंस की आबद्धता चेक के पाने वाला/धारक के प्रति आबद्धता लेखीवाल की होती है न कि बैंक की। जहाँ बैंक किसी ग्राहक के चेक का बाउंस करता है, ग्राहक के खाते में पर्याप्त निधि के बावजूद बिना पर्याप्त कारण के वहाँ बैंक ग्राहक के प्रति आबद्ध होता है न...
NI Act में चेक बाउंस का क्राइम
चेक एक इंस्ट्रूमेंट है जिसके बाउंस होने को क्राइम बनाया गया है। अपराध के रूप में चेकों के बाउंस से सम्बन्धित विधि 1988 के संशोधन से मूल रूप में धारा 138 से 142 तक थी। धारा 143-147, 2002 के संशोधन से प्रभावी 2003 से एवं धारा 148, 2018 में जोड़ी गयी। अब इस सम्बन्ध में विधि धारा 138 से 142 तक है। खातों में अपर्याप्त निधियों के कारण (चेक के लेखीवाल के खाते में) कतिपय चेकों के बाउंस की दशा में शास्तियों के सम्बन्ध में उक्त उपबन्ध अपने आप में सम्पूर्ण संहिता है।अध्याय 8 की धारा 91 से 104 तक के...




















