जानिए हमारा कानून
चेक बाउंस केस में कब मिलता है इंटरिम कंपनसेशन?
चेक बाउंस केस में जब फरियादी द्वारा मुकदमा कोर्ट में लगाया जाता है तब फरियादी को कोर्ट फीस अदालत में जमा करनी होती है तब ही मुकदमा कोर्ट में रजिस्टर्ड होता है। लेकिन फरियादी को भी इंटरिम कंपनसेशन मिलता है। जब अभियुक्त अदालत में उपस्थित होता है तब उससे फरियादी को इंटरिम कंपनसेशन दिलवाए जाने के प्रावधान हैं।चेक लेनदेन के बाद अनेक मामलों में धोखाधड़ी भी देखने को मिलती है। जहां लोग चेक दे देते हैं लेकिन उनके खाते में चेक जितनी रकम उपलब्ध नहीं होती है या फिर वह गलत साइन कर देते हैं या फिर कोई ऐसा चेक...
मेंटेनेंस केस में क्या जटिलताएं हैं?
मेंटेनेंस का केस यूं तो साधारण प्रकरण है और जल्दी से समाप्त भी हो जाता है लेकिन इस केस में कुछ ऐसा भी स्थितियां हैं जब अनेक जटिलताएं उत्पन्न हो जाती हैं और यहाँ तक व्यक्ति को जेल भी जाना पड़ जाता है।पत्नी बच्चे और माता पिता के भरण पोषण नहीं करने पर आश्रित संबंधित मजिस्ट्रेट को एक आवेदन देकर भरण पोषण प्राप्त कर सकते हैं। वर्तमान समय में माता पिता के मामले में भरण पोषण नहीं देने जैसी चीज कम देखने को मिलती है। लेकिन पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण से संबंधित मामले बहुत देखने को मिलते हैं। शादी होती है...
पैरेंट्स किसी स्थिति में वयस्क संतान को घर से निष्कासित कर सकते हैं?
ऐसी बहुत बहुत सी स्थितियां हैं जहां माता-पिता अपनी वयस्क संतान को अपने खरीदे हुए घर से निष्कासित कर देते हैं। जैसे कभी-कभी यह देखने में मिलता है कि संताने माता-पिता के साथ बुरा व्यवहार करती हैं और माता-पिता को अपमानित करती हैं। कई संताने ऐसी हैं जो नशा इत्यादि भी करती हैं और नशे के रुपए माता-पिता से मांगती हैं। कई बार देखने में यह भी आता है कि संतान की वैवाहिक मुकदमेबाजी चल रही हो और संतान अपने माता-पिता के घर में रह रही हो तब माता-पिता ऐसी संतान को भी घर से निष्कासित कर देते हैं। इस प्रकार अनेक...
पितृसत्ता और भेदभाव: कानूनी और संवैधानिक प्रावधान
पितृसत्ता, एक सामाजिक संरचना है जिसमें पुरुषों को महिलाओं पर वर्चस्व (Dominance) प्राप्त होता है। यह व्यवस्था संविधान में निहित समानता और व्यक्तिगत गरिमा (Dignity) के सिद्धांतों के विपरीत है। भारतीय संविधान हर व्यक्ति को समानता (Equality) और भेदभाव रहित व्यवहार का अधिकार देता है। लेकिन उत्पीड़न (Harassment) और मानसिक शोषण जैसी प्रथाएं इन मूल्यों को कमजोर करती हैं।यह लेख इस बात की गहन समीक्षा करता है कि कैसे संविधानिक प्रावधान और न्यायालयों के ऐतिहासिक निर्णय पितृसत्ता और महिलाओं के प्रति भेदभाव...
लोक सेवकों के कर्तव्यों के उल्लंघन के कानूनी परिणाम: भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 255 और 256
भारतीय न्याय संहिता, 2023, जो 1 जुलाई, 2024 से लागू हुई है, ने भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) की जगह ले ली है, और भारत में एक नया कानूनी ढांचा प्रस्तुत किया है।इस संहिता की विभिन्न धाराओं में से, धारा 255 और 256 उन लोक सेवकों (Public Servants) के दुराचार (Misconduct) को संबोधित करती हैं जो जानबूझकर अपनी आधिकारिक कर्तव्यों (Official Duties) का उल्लंघन करते हैं जिससे न्याय को नुकसान पहुंच सकता है या कुछ व्यक्तियों या संपत्ति को अवैध रूप से लाभ हो सकता है। इन धाराओं का उद्देश्य यह...
सेशन कोर्ट को रिकॉर्ड और साक्ष्य भेजना : भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के सेक्शन 232 का विश्लेषण
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023, जो 1 जुलाई, 2024 से लागू हुई, ने भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की जगह ली है। इसका उद्देश्य आपराधिक प्रक्रिया को अधिक कुशल और न्यायसंगत बनाना है।सेक्शन 232 विशेष रूप से उन मामलों से संबंधित है जो सत्र न्यायालय (Court of Session) द्वारा विशेष रूप से सुनवाई योग्य होते हैं। यह प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि गंभीर मामलों को उचित न्यायालय में स्थानांतरित किया जाए और सावधानीपूर्वक निपटारा हो। सेक्शन 232 के तहत आवश्यकताएँ (Requirements Under Section 232) जब किसी...
क्या आत्महत्या के लिए स्पष्ट उकसावे को साबित किए बिना आत्महत्या का अपराध साबित किया जा सकता है?
यह लेख पवन कुमार बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (Pawan Kumar v. State of Himachal Pradesh) के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को समझाता है। इस निर्णय में अदालत ने आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment of Suicide) के तहत दोष सिद्ध करने के लिए आवश्यक कानूनी सिद्धांतों को गहराई से समझाया है।इसमें भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) की धारा 306 और धारा 107 पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जो आत्महत्या के लिए उकसाने की परिभाषा और उसकी सीमा स्पष्ट करती हैं। इस मामले में न्यायालय ने यह भी बताया कि कैसे मानसिक उत्पीड़न...
जानिए दानपत्र से संबंधित कानून
किसी भी संपत्ति का अंतरण अनेक प्रकारों से किया जा सकता है। उन प्रकारों में एक प्रकार दान भी है। दान में बगैर किसी प्रतिफल के संपत्ति का अंतरण कर दिया जाता है। ऐसे व्यवहार में जो दस्तावेज तैयार होता है उसे दानपत्र कहा जाता है। दान की परिभाषा संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 122 के अंतर्गत प्रस्तुत की गई है, जहां पर दान के कुछ तत्व बताए गए हैं।दान में पक्षकारों का सक्षम होना आवश्यक होता है। पक्षकारों का सक्षम होना संविदा अधिनियम के अंतर्गत माना जाता है। संविदा अधिनियम में कोई व्यक्ति संविदा करने हेतु...
एक बेटी के प्रति पिता की कितनी हैं कानूनी जिम्मेदारियां
इंडिया का लॉ सभी नागरिकों और गैर नागरिकों को जीवन के हर क्षेत्र में अधिकारों के साथ जिम्मेदारी भी देता है जिन्हें पूरा करना हर व्यक्ति के लिए ज़रूरी है। इस ही प्रकार पिता को अपनी संतानों के भरण पोषण की भी ज़िम्मेदारी है और एक अविवाहित बेटी के भारत पोषण की ज़िम्मेदारी भी पिता की है। भरण पोषण से संबंधित कानून घरेलू हिंसा अधिनियम में भी मिलते हैं, जहां महिलाओं को भरण-पोषण दिलवाने की व्यवस्था की गई है। इसी के साथ हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत भी भरण-पोषण के प्रावधान मिलते हैं। जहां पर एक पत्नी अपने...
सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस मामलों में त्वरित सुनवाई और राहत पर क्या निर्देश दिए?
Meters and Instruments Pvt. Ltd. बनाम Kanchan Mehta (2017) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) के अंतर्गत चेक बाउंस (Cheque Dishonour) से जुड़े मामलों पर महत्वपूर्ण मुद्दों का विश्लेषण किया।कोर्ट ने चेक बाउंस मामलों के त्वरित निपटान (Speedy Disposal) की आवश्यकता पर जोर दिया और बताया कि अधिभारित न्यायपालिका (Overburdened Judiciary) से निपटने के लिए समय पर न्याय दिलाना क्यों जरूरी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इन अपराधों के प्रतिपूरक और...
क्या विधानसभा की संसदीय सचिवों की नियुक्ति संविधान की सीमाओं का उल्लंघन करती है?
Bimolangshu Roy (Dead) Through LRs बनाम Assam राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संसदीय सचिवों (Parliamentary Secretaries) की नियुक्ति की संवैधानिकता पर विचार किया। यह मामला असम संसदीय सचिव (नियुक्ति, वेतन, भत्ते और अन्य प्रावधान) अधिनियम, 2004 से संबंधित था, जो संसदीय सचिवों की नियुक्ति की अनुमति देता था।इस फैसले में 91वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 (91st Constitutional Amendment Act, 2003) के तहत मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) के आकार पर लगाए गए सीमित प्रावधानों का विश्लेषण किया गया।...
लुटेरों या डकैतों को छिपाने पर दंड: भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 254
भारतीय न्याय संहिता, 2023, जो 1 जुलाई 2024 से लागू हुई है, अपराधों के खिलाफ कड़े प्रावधानों के साथ भारतीय कानून प्रणाली को सशक्त बनाती है। इसी के तहत धारा 254 में लुटेरों या डकैतों को छिपाने पर कठोर दंड का प्रावधान है। यह धारा उन व्यक्तियों पर सख्त कार्रवाई करती है जो जानबूझकर अपराधियों को छिपाने या उन्हें कानूनी दंड से बचाने में मदद करते हैं।धारा 254 का उद्देश्य (Purpose) धारा 254 के तहत, अगर कोई व्यक्ति यह जानता है या उसके पास यह मानने का पर्याप्त कारण है कि कुछ लोग लूट या डकैती करने जा रहे...
धारा 231, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023: अभियुक्त को बयान और दस्तावेज़ों की प्रतियां देने का प्रावधान
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 ने पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code) की जगह ले ली है और 1 जुलाई, 2024 से लागू हो गई है। यह नई संहिता आपराधिक न्याय प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और न्यायपूर्ण बनाने के उद्देश्य से बनाई गई है।इस संहिता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह सुनिश्चित करता है कि अभियुक्त (Accused) को मामले से संबंधित दस्तावेज़ों और बयानों की समय पर पहुँच मिल सके। धारा 231 उन मामलों के लिए यह प्रावधान करती है जो सत्र न्यायालय (Court of Session) द्वारा विशेष रूप से...
क्या कानूनी उत्तराधिकारी शिकायतकर्ता की मृत्यु के बाद आपराधिक कार्यवाही को जारी रख सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने चंदा देवी डागा और अन्य बनाम मंजू के. हुमतानी और अन्य (2017) के मामले में यह महत्वपूर्ण मुद्दा तय किया कि क्या शिकायतकर्ता की मृत्यु के बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारी आपराधिक शिकायत को जारी रख सकते हैं। इस निर्णय में अदालत ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (Criminal Procedure Code, 1973, जिसे CrPC कहा जाता है) के प्रावधानों और इससे संबंधित महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों की व्याख्या की।CrPC के प्रावधान और प्रमुख सिद्धांत (Provisions and Principles) आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973...
अपराधियों को छुपाने पर कानूनी दंड: भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 253
भारतीय न्याय संहिता, 2023, जो 1 जुलाई 2024 को भारतीय दंड संहिता की जगह लागू हुई, में अपराधियों को छुपाने या उन्हें न्याय से बचाने के खिलाफ कड़े प्रावधान शामिल हैं। धारा 253 विशेष रूप से उस स्थिति को कवर करती है जब कोई व्यक्ति किसी अपराधी को जो कानूनी हिरासत से भाग निकला है या जिसके खिलाफ गिरफ्तारी का आदेश है, छुपाने या बचाने का प्रयास करता है। इस धारा के तहत दंड का निर्धारण इस आधार पर किया जाता है कि मूल अपराध कितना गंभीर था।धारा 253 का अर्थ धारा 253 के अनुसार, जो व्यक्ति किसी ऐसे अपराधी को...
आपराधिक कार्यवाही में दस्तावेजों की प्रति प्राप्त करने का अधिकार : BNSS, 2023 की धारा 230
भारत के नए आपराधिक कानून, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023), ने पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code) को बदल दिया है और 1 जुलाई, 2024 से प्रभावी हो गया है। यह संहिता आपराधिक न्याय प्रक्रिया को आधुनिक और सरल बनाने के उद्देश्य से लागू की गई है।धारा 230 इस संहिता का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है, जो पुलिस रिपोर्ट के आधार पर आरंभ किए गए मामलों में अभियुक्त (Accused) और पीड़ित (Victim) को आवश्यक दस्तावेज़ों की प्रतियां प्रदान करने से संबंधित है।...
सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मुकदमों और अंडरट्रायल कैदियों को जमानत देने के मुद्दे को कैसे सुलझाया?
Hussain बनाम Union of India के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मुकदमों (Delayed Trials) और अंडरट्रायल कैदियों (Undertrial Prisoners) को जमानत देने के मुद्दे पर अहम निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत न्याय में देरी (Delayed Justice) से व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) का उल्लंघन होता है।इस फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि बिना दोष सिद्ध हुए किसी व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित...
जानिए आंसेस्टर प्रॉपर्टी से संबंधित कानून
कोई भी ऐसी प्रॉपर्टी जो पूर्वजों से मिलती है उसे ऐंसेस्टर प्रॉपर्टी कहा जाता है। यह ऐंसेस्टर प्रॉपर्टी पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही होती है और वारिसों को उत्तराधिकार में मिलती रहती है। स्वयं द्वारा अर्जित संपत्ति के अलावा पैतृक संपत्ति होती है। ऐसी संपत्ति उसके द्वारा अर्जित नहीं की जाती है या फिर उसे वसीयत नहीं की जाती है, बल्कि कानूनी रूप से उसे उत्तराधिकार में प्राप्त होती है। संपत्ति के मामले में कानून किसी भी व्यक्ति के रिश्तेदारों को संपत्ति का उत्तराधिकारी बनाता है। अगर कोई व्यक्ति बगैर वसीयत...
यदि पुलिस फेयर इन्वेस्टिगेशन नहीं करे तब क्या करे फरियादी
अनेक दफा देखने में आता है कि फरियादी की शिकायत रहती है कि पुलिस द्वारा उसके प्रकरण में फेयर इन्वेस्टिगेशन नहीं किया गया है। इस स्थिति में शिकायतकर्ता व्यथित हो जाता है क्योंकि शिकायतकर्ता अपनी शिकायत लेकर पुलिस के पास जाता है। उसके साथ घटने वाले किसी अपराध की जानकारी उसके द्वारा पुलिस को दी जाती है। उसकी जानकारी के आधार पर पुलिस एफआईआर दर्ज करती हैं। ऐसी एफआईआर के बाद अन्वेषण होता है। हालांकि पुलिस के पास यह अधिकार सुरक्षित है कि यदि अन्वेषण में उसे जिन व्यक्तियों के नाम पर एफआईआर की गई थी उनके...
संविधान के अंतर्गत महिलाओं के विशेष अधिकार और ऐतिहासिक फैसले
Santhini बनाम Vijaya Venketesh मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केवल वैवाहिक विवादों (Matrimonial Disputes) पर नहीं, बल्कि महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव (Discrimination) के मुद्दे पर भी चर्चा की।इस फैसले ने न्यायपालिका के दृष्टिकोण को सामने रखा, जो यह सुनिश्चित करता है कि महिलाओं को न्याय तक समान पहुंच (Equal Access to Justice) मिले, खासकर व्यक्तिगत विवादों में। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि कानूनों की व्याख्या इस तरह से होनी चाहिए, जो महिलाओं की गरिमा (Dignity) और समानता (Equality) को बनाए रखे। ...